बुधवार, 7 अगस्त 2019

मणि रायपुरी : एक परिचय - लेखक - योगेश त्रिपाठी


बघेलखंड के निराला’ - मणि रायपुरी
आलेख
योगेश त्रिपाठी
12/273 गांधीनगर उर्रहट रीवा म.प्र.
ईमैल – yogeshplays@gmail.com  

         ‘मणि-किरणपुस्तक में मणि रायपुरी ने अपना परिचय अपने ही अंदाज में दिया है - 
धधकी नहीं जो उर में दबी है, चिंगारी नहीं वो आग हूं मैं।
ड़ के मृदु फूल से धूल सना, उड़ता नभ में जो पराग हूं मैं।।
सुन के जिसे झूम उठे दुनिया, वह मादक राग विहाग हूं मैं।
जिसके फिर काटे का मंत्र नहीं, जहरी वो कालिया नाग हूं मैं।।
जलता जिसमें सुख-ईंधन है, उसी क्षारक-आग की आंच हूं मैं।
उलझा झूठ के जाल में जो,सदियों से पड़ा वही सांच हूं मैं।। सदा आंगन टेढ़ा रहा जिसमें, अपने उस भाग्य की नाच हूं मैं।
कहते जिसकोमणिलोग सभी,वही अलौकिक कांचहूं मैं।।
मणि रायपुरी को बघेलखंड का निराला कहा जाता है। मणि रायपुरी यानी शेषमणि शर्मा मणिका जन्म रीवा नगर से 10 किलोमीटर दूर रामनई ग्राम में 17 दिसंबर सन् 1916 को एक सुसंस्कृत सरयूपारी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पितामह पंडित भैरव प्रसाद संस्कृतज्ञ थे। वो कई वर्षों तक रीवा राज्य में नाजिर रहे थे। मणि के पिता पंडित चंद्रशेखर शर्मा पेशे से मिडिल स्कूल के प्रधानाध्यापक थे, परंतु वे कवि भी थे, जो भी लिखते, अधिकार के साथ लिखते। राज-दरबार में उनका काफी सम्मान था। मणि की माता का नाम पार्वती देवी था, और विमाता का नाम  जमुना देवी। उनकी दूसरी मां से तीन पुत्र हुए। उनकी पहली पत्नी का नाम रुक्मिणी था जिन्हें उन्होंने नलिनी नाम दिया था। नलिनी से शैलेंद्र का जन्म हुआ जो मात्र पांच वर्ष की उम्र में ही कालगत हो गया। नलिनी के अलग हो जाने के बाद नौ वर्ष तक वे अकेले रहे, उसके बाद उन्होंने दूसरा विवाह एक बाल विधवा आशा शर्मा से किया। विधवा से विवाह के निर्णय का घर-परिवार में विरोध हुआ परंतु मणि अड़ गए और विवाह किया। इनसे पांच संतानें पैदा हुईं जिनमें दो नहीं रहीं। पहली संतान किरण, दूसरी माया, तीसरी दया शर्मा, चौथी संतान अमन कुमार शर्मा और चौथी संतान बृजेंद्र कुमार शर्मा।
व्यक्तित्व से सुदर्शन मणि जी का स्वभाव बहुत स्वाभिमानी था। पेशे से वे अध्यापक थे। वे कविताएं लिखते थे और गाते भी थे। कैकेयी उनकी प्रसिद्ध रचना है। होनहार मणि को शैशव काल में मातृवियोग सहना पड़ा। पिता ने अधिक ध्यान नहीं दिया। पर्याप्त प्यार व देखरेख के अभाव में वे अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए विवश हो गए। पुत्र शैलेंद्र के वियोग ने मणि को तोड़ दिया था।
    इस अमां की यामिनी में खोजने जाऊं कहां मैं ?
     हाय, मेरे हदय के धन, अब तुझे पाऊं कहां मैं ?
मणि पुत्र-विछोह से उबरे नहीं थे कि एक और आघात ने उन्हें झकझोर दिया। उनकी अर्द्धांगिनी उनसे अलग हो गईं। वे मृतप्राय हो गए। मानसिक संतुलन डगमगा गया। शेष जीवन ऐसी ही अवस्था में गुजरा।
जिनके पितामह संस्कृतज्ञ हों और पिता कवि हों, वह कवि न हो, कैसे हो सकता है ? मणि में काव्य-प्रतिभा बचपन से ही थी। उनकी पुस्तक के भूमिका-कार चंद्रलिखते हैं - मणि ने अपनी किशोरावस्था से ही, कवि-सम्मेलनों में प्रथम-द्वितीय पुरस्कार जीतते रहने का कांट्रैक्ट-सा ले रखा था। पिता-पुत्र में भी प्रतिद्वंद्विता होती आई। एक सम्मेलन में तो निर्णायकों ने, पिता की प्रतिष्ठा रखने को, एक नंबर से पुत्र को हरा दिया था।
      विक्षिप्त मणि जीते-जी लोगों के उपहास के पात्र हो गए थे, परंतु कहा गया है न, कि प्रतिभा चाहे किसी भी कोठरी में विराजे, पूजी तो जाएगी ही। यह उनकी प्रतिभा थी कि तत्कालीन समय के प्रबुद्ध लोगों में उन्हें सम्मान दिलाती थी। राममित्र चतुर्वेदी, जगदीश चंद्र जोशी आदि प्रसिद्ध विद्धान-समालोचक उनकी कविताओं को अत्यंत गंभीरता के साथ लेते थे।
      मणि क्रांतिकारी थे, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। उनका नाम रीवा जिला गजेटियर में क्रांतिकारियों की सूची में सौवें नंबर पर अंकित है। मणि रायपुरी हिंदी मिडिल परीक्षा पास करने के बाद 14 जुलाई 1936 से शिक्षक हुए। 1942 के स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के कारण 25 नवंबर 1942 को उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं। 1932 में शहीद पद्मधर सिंह उनके सहपाठी थे। प्रसिद्ध उपन्यासकार सिद्ध विनायक द्विवेदी उनके साथ जेल के एक ही बैरक में रहे। इसी समय कप्तान अवधेश प्रताप सिंह, शंभूनाथ शुक्ल, यादवेंद्र सिंह, कुंअर सूर्यबली सिंह आदि भी जेल में थे। जेल में उन्होंने कई पुस्तकों की रचना की। कैकेयी भी उनमें से एक है। स्वतंत्रता-प्राप्ति के दस वर्षों बाद 12 अगस्त 1952 को उन्हें विंध्य प्रदेश शासन ने उन्हें निम्न श्रेणी शिक्षक के रूप में फिर से नौकरी दे दी। 17 दिसंबर 1971 में वे रामनई विद्यालय से सेवानिवृत्त हुए। 
      नैकहाईकाव्य में महारानी कुंदन कुंवरि को क्रांतिकारी महिला की पहचान दिलाने का श्रेय मणि रायपुरी को जाता है। इस काव्य से एक पंक्ति को निकालने के लिए उन पर रीवा महाराज गुलाब सिंह द्वारा दबाव डाला गया परंतु उन्होंने दृढ़ता से मना कर दिया। महाराज ने भी लेखक की दृढ़ता का सम्मान कर स्वयं को सम्मानित ही किया। उनकी प्रकाशित कृतियां हैं - 1942 में कृष्णा प्रेस प्रयाग से मणिकिरण, 1952 में नेशनल प्रेस प्रयाग से कैकेयी और 1952 में देशसेवा प्रेस प्रयाग से द्धितीया। समीक्षकों का मानना है कि उनकी प्रकाशित कृतियों से कहीं अधिक परिपक्व और अधिक अर्थपूर्ण उनकी अप्रकाशित कृतियां हैं। अप्रकाशित कृतियों में अंतर्ध्वनि, बागी की डायरी, नलिनी-वियोग, क्रांति की चिंगारियां और पिंजरे का पंछी हैं। उनकी जग और जीवनकृति को विंध्यप्रदेश शासन द्वारा पुरस्कृत किया गया है। बदलती दुनियामध्यप्रदेश शासन द्वारा पुरस्कृत है। कैकेयीको विंध्यप्रदेश शासन द्वारा व्यास पुरस्कार प्राप्त हुआ था।
      मणि ने अपने क्रांतिकारी व्यक्तित्व से दुनिया को चौंकाया था। यही नहीं, उन्होंने अपने देहत्याग से भी दुनिया को चौंकाया। उनका निधन 29 मई 1975 को रीवा से 22 किलोमीटर दूर बेला में सड़क दुर्घटना में हुआ।
     मणि जी पर रीवा विश्वविद्यालय द्वारा शोधकार्य भी कराया गया है। शोधकर्ता डा. अनिता पांडेय के अनुसार जगदीश चंद्र जोशी की प्रेरणा से उन्होंने मणि पर शोधकार्य किया। उनकी कविताएं जहां वैयक्तिक त्रास और करुणा का महासागर प्रतीत होती हैं, वहीं दूसरी ओर पूंजीवादी व्यवस्था से उपजे दुर्बल, शोषित समुदाय का भी आईना हैं। आवश्यकता है कि मणि रायपुरी की सभी प्रकाशित-अप्रकाशित रचनाओं को एकत्र कर मणि-समग्र के रूप में पुनः प्रकाशित कराया जाय। विंध्य के इस सपूत को यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी, साथ ही हम अपनी धरती, अपनी भाषा और अपनी संस्कृति को भी नमन् कर सकेंगे।
-योगेश त्रिपाठी

गोमती प्रसाद विकल की पुस्तक की समीक्षा


समीक्षा : पुस्तक - बघेली संस्कृति और साहित्य
लेखक – गोमती प्रसाद विकल
समीक्षक – योगेश त्रिपाठी
अवसर - विमर्श-विकल  दिनांक 16 अक्तूबर, 2005

मैं आलेख पढ़ने के पहले त्रुटियों के लिए अपना बचाव यह कहकर करना चाहूंगा कि मैं मूलतः हिंदी साहित्य का विद्यार्थी नहीं रहा हूं। हिंदी में एम.ए.मैंने उसी तरह से किया है जिस प्रकार से आठ घंटे और बारह सी.एल. की नौकरी में रहते हुए कोई कर्मचारी कर सकता है। आशा है त्रुटियों पर ध्यान नहीं देंगे।
                विमर्श-विकल के इस गरिमामयी आयोजन में आदरणीय विकल जी की कृतियों पर विचार किया जा रहा है, यह एक अच्छी बात है। इस आयोजन का नाम विकल-सम्माननहीं रखा गया यह और भी अच्छी बात है। कल के अखबार के बारे में सभी निश्चिंत रहेंगे। इस सिलसिले में मैंने उनकी पुस्तक बघेली संस्कृति और साहित्यपर कुछ लिखने का प्रयास किया है, जो मैं आपके सामने रख रहा हूं। इसके बारे में मैं नहीं कह सकता कि यह अच्छी बात है या नहीं।
                विकल जी की किताब बघेली संस्कृति और साहित्यको राजभाषा और संस्कृति संचालनालय मध्यप्रदेश शासन ने प्रकाशित किया है सन् 1999 में। हो सकता है इसके नये संस्करण भी प्रकाशित हुए हों, मुझे ज्ञात नहीं है।
मैंने यह किताब रीवा के एक बुकस्टाल से खरीदी। एक सौ पचास रुपये में। दो सौ पचास भी कीमत होती तो भी मैं खरीदता, क्योंकि बघेली जन-जीवन के बारे में मुझे बहुत कुछ जानना है। बघेली जीवन सिर्फ उतना ही नहीं है जो मेरे आसपास बीता। मैंने पुस्तक खरीदी, लेकिन मेरे एक भाई ने नहीं खरीदी। वह ले गया और आज तक नहीं लौटाया। एक बार किसी मौके पर मुझे इसकी जरूरत पड़ी और मैंने कुछ दिनों के लिए विकल जी से पुस्तक मांगी। मेरे अति यथार्थवादी अभिनय से उन्हें प्रभावित होना ही था और उन्होंने मुझे अपनी एक लेखकीय प्रति भेंट की। स्नेह उनका, आभार उनका। तब से आज तक यह पुस्तक मेरे काम आ रही है।
                पुस्तक के ऊपर पहली टिप्पणी की कहें तो एक साहित्यकार बंधु की टिप्पणी सामने रखूंगा कि अच्छा जुगाड़ है। जुगाड़ यानी मेल-जोल, भाईचारा, दूरभाष-वार्ता लल्लो-चप्पो आदि-आदि। यानी विकल जी का यह जुगाड़ है जो उनकी पुस्तक सरकारी प्रतिष्ठान से छप गई। कड़वाहट भले हो लेकिन यह एक कटु सत्य है कि हमारे सरकारी संस्थानों ने अपनी विश्वसनीयता इतनी खो दी है कि सरकारी शब्द जुड़ते ही लेखक की पूरी सामर्थ्य, लेखक का समूचा यश, और लेखक की सारी योग्यता तीन अक्षरों के इस भारी-भरकम शब्द जुगाड़के आगे स्वयंमेव दब जाती हैं। लेकिन ऐसी टिप्पणियों का विकल जी जैसे मानस पर कोई असर नहीं पड़ता, और न ही पड़ना चाहिए। यह पुस्तक सरकारी संस्थान से प्रकाशित होने के ही कारण साहित्यिक जगत में कम चर्चित हुई, ऐसा मेरा मानना है।
                किसी भी भाषा और संस्कृति के विकास में रचनाधर्मिता का योगदान तो होता ही है, लेकिन उससे भी ज्यादा बड़ा योगदान होता है उस भाषा और संस्कृति के दस्तावेजीकरण का। पहले-पहल यह योगदान डा. भगवती प्रसाद शुक्ल जी ने दिया था, ‘बघेली भाषा और साहित्यपुस्तक देकर, जिसका कि पहला संस्करण सन् 1971 में प्रकाशित हुआ। इसके पहले एक महत्वपूर्ण योगदान श्री लखन प्रताप सिंह उर्गेश ने दिया था, जब सन् 1953 में उनकी पुस्तक बाघेली लोकगीतप्रकाशित हुई थी। पुस्तकों के रूप में यही दो कार्य मेरी जानकारी में आए है। पत्र-पत्रिकाओं में आलेखों के रूप में यद्यपि कई लोगों ने यह वंदनीय कार्य किया है। विकल जी की यह पुस्तक इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
मेरी दृष्टि में दस्तावेजीकरण का यह कार्य किसी भी भाषा या बोली के विकास के लिए कविता, उपन्यास, या नाटक रचने से कहीं ज्यादा उपयोगी, कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है। त्योंथर में कोलों की एक गढ़ी है, कुछ दिनों पहले मुझे उसके इतिहास के बारे में जानने की इच्छा हुई। कोल जो कभी त्योंथर के राजा थे, उनका पतन कैसे हुआ, यह जानना मुझे दिलचस्प लगा। मुझे ज्यादा उम्मीद तो नहीं थी, लेकिन मैंने विकल जी की पुस्तक देखी। उसमें मुझे मिल गया। उन्होंने इसके बारे में लिखा है। और सबसे अच्छी बात यह है कि जिन स्रोतों से उन्हें यह जानकारी मिली, उन्होंने उन स्रोतों का भी जिक्र किया है।
लेखक ने इस पुस्तक में जो भी सामग्री दी है, लगता है जैसे एक अनभिज्ञ जिज्ञासु की जरूरत के हिसाब से दी है। अगर हमें खैरमाई देवी के बारे में जानना है तो कम से कम इसमे यह तुरंत हमें मालूम हो जाएगा कि खैरमाई देवी सीमाओं की रक्षा करने वाली देवी मानी जाती हैं। अगर हमें नेउरानमय के बारे में जानना है तो विकल जी की इस किताब में मिल जाएगा। इसी तरह अनेक बघेली त्यौहारों की सूची देते हुए लेख्क ने यह भी बताया है कि क्यों मनाया जाता है यह त्यौहार और इसके पीछे की कथा क्या है। बघेलखंड के लोकनाट्य पर भी उन्होंने लिखा है और मेरे लिए छाहुर नाट्य को लिखने और खेलने के पीछे वही आधार रहा है।
एक चीज मैंने और पाई कि विकल जी में किसी भी विषय पर विस्तार से लिखने की अद्भुत कला है। संभवतः इसीलिए वे उपन्यास जैसे व्यापक फलक वाली विधा में सफल हुए। यह पुस्तक मूल रूप से बघेली जन-जीवन का परिचय देने के लिए एक संकलन है। लेकिन विकल जी की ईमानदारी और कठोर श्रम का मैं जिक्र करूंगा कि मामुलिया, चौमासा आदि पत्रिकाओं से टिप्पणियां, वेद-पुराण, महाभारत, गीता, रामचरित मानस से संदर्भ तो उन्होंने लिए ही हैं उनका उल्लेख भी किया है। यही नहीं लउआ सगरा के सीताराम कोल से उन्होंने कोलों के गोत्र पूछे। उर्रहट के गयादीन कोल से सबरी प्रसंग पर रोचक जानकारी ली। सीधी की मूर्ति देवी से टप्पा पाया, लालगांव के सरजुआ गोंड़ से, गढ़बा के बिहरिया कोल से बघेली कथाएं पाईं। इसी तरह हनुमना के मोतीलाल सिंह, पुष्पराजगढ़ के प्रेमलाल, कोतमा के अरविंद लाल जैसे न जाने कितने लोगों से पूछ-पूछ कर सामग्री जुटाई, और सबका उल्लेख भी किया। उक्तियों की भी भरमार है। नेल्सन, पाल रेडिन, हरबर्ट रीड, गोल्डन विजर, डा.वर्कर, ये तो सब विदेशी नाम हो गए, बाबू गुलाबराय, आचार्य चतुरसेन, पं.रामनारायण वाचस्पति, आचार्य सागर नंदी, डा.विद्यानिवास मिश्र, डा.श्यामाचरण दुबे, उसके बाद ले लीजिए डा.कमला प्रसाद, डा.सुधाकर तिवारी, डा. चंद्रिका चंद्र, न जाने कितनों के उल्लेख, न जाने कितनों के नाम। जहां से भी कोई उपयोगी चीज मिली विकल जी ने इस पुस्तक में बाकायदे उनका उल्लेख करते हुए यथास्थान जमा दी।
                पुस्तक में लोककथा, लोकविश्वास, रीति-रिवाजों का विस्तार से वर्णन है। लोकगीतों का भावार्थ सहित समावेश है। अभी मैं यह बताने में असमर्थ हूं कि फला चीज इसमें छूटी हुई है। संक्षेप में कहें तो बघेली भाषा, संस्कृति, और साहित्य का एक नया परिचयात्मक ग्रंथ है यह जो पूर्व में प्रकाशित हुई पुस्तकों से प्रभावित नहीं है, बल्कि उनकी पूरक है। बल्कि एक बात इसमें विशेष यह लगी कि हमें जो जानकारी चाहिए, वह हमें आसानी से तुरंत मिल जाती है, अगर किताब में है तो। जानकारियो का यह समायोजन आसान कार्य नहीं था। इसका मूल्यांकन होना चाहिए।
विकल जी के प्रति इस जुगाड़की भावना के कारण उनकी मेहनत का आकलन हम आज भले ही न करना चाहें या न कर पाएं, लेकिन वैश्विक गांव के निर्माण के बाद, जिसका कि इस समय दौर चल रहा है, उसके कई वर्षों बाद, जब गांव-गांव में खुले हुए नर्सरी और कान्वेंट स्कूलों से निकलकर, अमेरिका का सपना भूल कर, नई पीढ़ी खेतों में हल जोत रही होगी, तब अगर उसके मन में अपनी मिट्टी, अपनी भाषा, और अपने रीति-रिवाजों को जानने की ललक उठी, तो वह जरूर इस किताब के पन्ने पलटेगी और तब उसे महसूस होगा उस पसीने की मूल्य, जो विकल जी ने इस किताब को लिखने में बहाया है। और यकीनन, हम भले उनके इस कार्य के लिए कृतज्ञ न हों पर वह पीढ़ी कृतज्ञ अवश्य होगी।
-          योगेश त्रिपाठी

रंग बघेली पुस्तक की एक समीक्षा


समीक्षा - "रंग बघेली'' :  बघेली नाट्य-संग्रह

समीक्षक 
डॉ. सुधाकर तिवारी

कुछ दिन पहले योगेश त्रिपाठी द्वारा लिखित नाट्य-संग्रह ‘‘रंग बघेलीपढ़ने को मिला। यह नाट्यसंग्रह, जिसमें चार नाटक हैं, बघेली में लिखा गया है। इस नाट्य-संग्रह के पूर्व भी योगेश के कई नाटक प्रकाशित हुए हैं, जिनमें प्रमुख हैं - हस्ताक्षर, कागज पर लिखी मौत, मुझे अमृता चाहिए और युद्ध आदि। योगेश एक स्थापित नाटककार तो हैं ही, एक कुशल, सफल, रंगकर्मी भी हैं। रीवानरेश महाराज विश्वनाथ सिंह कृत ध्रुवाष्टकके नाट्य रूपांतरण का जो उन्हीं के द्वारा किया गया था और कई खंडों में  आकाशवाणी रीवा से प्रसारित हुआ वह बहुत ही सुंदर रहा। संस्कृत साहित्य के अभिज्ञान शाकुंतलको  बघेली में रूपांतरित कर, कालिदास समारोह उज्जैन में मंचित कर इन्होंने श्लाघनीय प्रयास किया है। इनके नाटकों का मंचन देश के विभिन्न नगरों, महानगरों में लगातार हो रहे हैं।
मेरी समझ में साहित्य की अनेक विधाओं में नाटक की रचना अधिक जटिल है। क्योंकि इसमें सपट बयानी नहीं होती - इसमें नाटक के रचयिता को उसके पात्रों को चरित्र के अनुरूप उसकी मानसिकता के अनुरूप ढालना पड़ता है। एक नाटक लिखते समय नाटककार, पात्रों की विभिन्न स्थितियों, परिस्थितियों में जीता है। कभी पात्र क्रोध में है, कभी वैराग्य में है, कभी प्रेमाभिभूत है तो कभी ईर्ष्या-द्वेष की ज्वाला में जल रहा है - इन सभी परिस्थितियों में पात्र के रूप को नाटककार अपने में उतारता होगा - तभी तो उसका नाटक स्पर्शी और हृदयग्राही होता होगा।
रंगबघेलीके चार नाटकों में पहला नाटक है -होइहैं वहि जो राम रचि राखा। नाटककार के अनुसार इसकी मूल अवधारणा, हिंदी साहित्य की प्रसिद्ध साहित्यकार मृणाल पांडे की रचना सोइ राम रचि राखासे ली गई है। एक प्रकार से यह उनके नाटक का बघेली रूपांतरण है। इस नाटक में सामाजिक विसंगतियों, विद्रूपताओं पर करारा व्यंग्य है, गहरी चोट है। धन्ना (रामलाल) का लड़का मन्ना (श्यामलाल) सामाजिक क्रांति चाहता है, समानता की बात करता है। इसके लिए वह चोरी और हत्या तक करता है परंतु दीवान जी अपना हफ्ता बचाने के लोभ में उस पर कोई केस नहीं दर्ज करते। उस पर कोई आंच नहीं आने देते। हद तो तब हो जाती है जब सावित्री अपने नसेड़ी पति की हत्या, जो धोखे से हुई है, से प्रसन्न दिखती है, क्योंकि उसकी हत्या के बदले बहुत अधिक हरजाना मिल जाता है। उस समय का दृश्य तो और भी आश्चर्यचकित कर देने वाला होता है जब मन्ना भरी दरबार में अपनी तलवार की नोक से राजा की पगड़ी उछाल देता है और उसमें सांप, जो दीवान द्वारा प्रायोजित होता है देखकर राजा मन्ना को अपना जीवनदाता समझ लेता है। उसको अपना सारा राजपाट सौंप देता है।
                इस नाटक में दीवान की भूमिका पर धन्ना सेठ का यह कथन - अफसर हाकिम होइके तू एंह मूरुख राजा के गद्दी हथिआबै मां हमार मददि करे, ओकर पूर इनाम मिली। अरे, हम तोंहरे बिना कुछु कइन नहीं सकित रहेन। हमार लरिका चोरी करिस, तूं रपोट नहीं लिखै दिहे, हमार लड़िका हत्या करिस, तूं ओका बरदानी बनाय दिहे, हमार लरिका राजा के ऊपर हमला करिस औ तूं ओका चमत्कार बनाय दिहे। तूँ त पंगड़ी मां सांप देखाय केतुअन का गद्दी मां बैठाइ दिहे होबे। जा, एके इनाम मां तोंहका पूर छूट मिली। जी भरिके जनता का लूटा औ अपने घर के संघे हमरौ घर भरा।आज के समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, कदाचरण का खुला चिट्ठा है, और है शासन-तंत्र पर करारा व्यंग्य। इस नाटक का मंचन - रीवा, सतना, शहडोल और मथुरा में हुआ, जिसे दर्शकों द्वारा बहुत सराहा गया।
                इस संग्रह का दूसरा नाटक छाहुरहै। छाहुर के नाम से बघेली में अहीर जाति का बिरहा लोकगीत प्रचलित है। इसी छाहुर के आधार और भावभूमि पर इस नाटक की रचना की गई है। मेरी समझ में इसे लोकनाट्य कहना उचित होगा। इस नाटक का नायक छाहुर नाम का युवक है। वह अपनी मां के साथ रहकर घरेलू पालतू गाय-भैंसों की रखवाली करता है और उन्हें बहुत प्यार करता है। इस नाटक में नाटककार ने भले ही कल्पना का सहारा लिया हो परंतु वास्तविकता यही है कि बघेलखंड में कभी, सामंतों-शासकों का बहुत जोर था। वे अपनी रिआया के साथ गुलाम जैसा व्यवहार करते थे। ऐसा ही कुछ इस नाटक में देखने को मिलता है। मैंने स्वयं अपनी आंखों देखा है कि कैसे राजा के रास्ते में पड़ने पर सुंदर इमारत  राजा द्वारा राजसात कर ली गई और सुंदर फलफूलों का बगीचा तहस-नहस कर दिया गया। कुछ इसी तरह का चित्रण छाहुर नाटक में देखने को मिला जब राजा द्वारा छाहुर से उसकी दूध देने वाली भैंस को मांगने पर और उसके मना करने पर राजा के सैनिक जबर्दस्ती छाहुर की मां की उपस्थिति में हांक ले जाते हैं।
                छाहुर दिखने में बकलेल लगता है परंतु है दिमागी रूप से होशियार। वह वेष बदलकर राजा के यहां पहुंचता है और छाहुर से चंदना बन जाता है। राजा के यहां चरवाहा यानी बरेदी का काम करने लगता है। भैंस-गाय दुहते समय अकेले में चंदना की भेंट बबुली नाम की राजकुमारी से होती रहती है और अनजाने ही प्रेम के अंकुर फूट आते हैं।
                एक दिन चंदना यानी छाहुर नाटकीय ढंग से अपने सारे जानवरों को छुड़ा कर चोरी चोरी घर पहुंच जाता है। मां सारी कथा सुनकर छाहुर को समझाती है कि जाकर राजा के यहां से पूरे गांव के मवेशियों को लौटा लाओ नहीं तो तुम्हारे माथे पर चोर होने का कलंक लगेगा। वह मां की इस बात को  मानकर, गांव से जबरन ले जाए गए समस्त जानवरों को लौटा लाने का संकल्प बताता है। गांव के सभी  लोगों को एकत्रकर, उनमें जागृति का भाव भरकर, उनके जबरन ले जाए गए जानवरों को वापस लाने के लिए सबके साथ लाठी लिए राजा के यहां पहुंच जाता है। हजारों की भीड़ देखकर राजा भयभीत हो जाता है और जनता की आवाज पर उनके सब जानवर वापस कर देता है। सबसे रोचक प्रसंग तो यह होता है कि बबुली यानी राजकुमारी की इच्छा से छाहुर का विवाह उसके साथ हो जाता है। बहू के रूप में बबुली को पाकर छाहुर की मां निहाल हो जाती है।
                इस प्रकार छाहुर नाटक में सामंतशाही का भयावह रूप, सामाजिक विद्रोह की शक्ति और रोमांस का चित्रण एकसाथ देखने को मिलता है। नाटक बहुत रोचक है, जिसका प्रथम मंचन स्वयं योगेश त्रिपाठी ने अपने निर्देशन में मध्यप्रदेश नाट्यसमारोह के अंतर्गत दमोह मध्यप्रदेश में सन् 2005 में किया। इस मंचन को काफी प्रशंसा मिली।
                रंगबघेली पुस्तक का तीसरा नाटक है बइसाखी। इसमें नाटककार बघेली ग्राम्यजीवन का आकलन करने में पूर्ण सफल है। इसमें बेटियों की शिक्षा, सूदखोरों का कुत्सित मायाजाल, बेटियों के विवाह का प्रपंच, निरक्षर होने का अभिशाप, सब एकसाथ उजागर हुआ। इस तरह का चित्रांकन वही लेखक कर सकता है जिसने ग्राम्यजीवन को बहुत बारीकी और नजदीक से देखा हो। इस नाटक के अनेक पात्र हैं परंतु मुख्य रूप से बिटिया परान और उसके पिता छोटेलाल और और मां बुटुनी हैं। इनमें भी सबसे महत्वपूर्ण चरित्र परान का है जो विवाह होने से पूर्व कुएं में गिर जाती है। पैर में चोट लगने के कारण वह बैसाखी के सहारे हो जाती है। सका विवाह जो तय था, लंगड़ी हो जाने के कारण मनाही हो जाती है। परान इससे हताश-निराश नहीं होती और अधिक उत्साह के साथ पढ़ने का संकल्प लेती है। जिसमें उसकी मां का बहुत अधिक सहयोग रहता है।
                ग्रामीण जन की मानसिकता का सजीव चित्रण तब देखने को मिलता है जब छोटेलाल का छोटा भाई गनेशी इस लालच में दिखता है कि बड़े भाई की इकलौती बेटी का विवाह हो जाने के बाद और  भैया-भाभी की मृत्यु के बाद उनकी सारी जमीन-जायदाद उसी की हो जाएगी। निश्चित रूप से जिन्होंने गांव को नजदीक से देखा है, इस प्रकार की वहां मानसिकता दिखती है, वे इस हकीकत को नहीं समझते कि अनधिकार प्राप्त की गई संपत्ति कभी सुखद नहीं होती।
                इस नाटक में निरक्षर होने का अभिशाप उस समय बखूबी देखने को मिलता है जब निरक्षर छोटेलाल, सूदखोर का ब्याज चुकाने के लिए बैंक जाकर रुपिया निकालने जाता है। कोई भी उसका निकासी फार्म भरने को तैयार नहीं होता। वहां से वापस आकर वह अपनी बिटिया परान से कहता है कि तुम बैंक चलकर फार्म भर दो, मैं अंगूठा लगा दूंगा। परान कहती है कि तीन दिन रुक जाओ, पिता के यह कहने पर कि उसे ब्यौहर का पैसा आज ही लौटाना है तब वह सूदखोर के पास आकर तीन दिन का समय मांगती है। इन तीन दिनों में परान अपने निरक्षर पिता को आठ हजार रुपिया निकलवाने के लिए आवश्यक चीजें लिखना सिखा देती है। बैंक जाकर अपने पिता से ही फार्म भरवाती है और रुपिया निकलवाती है। मैनेजर यह देखकर बहुत प्रसन्न होता है और छोटेलाल का अंगूठा निशानी की जगह  हस्ताक्षर लेता है।
                इस प्रकार बइसाखी नाटक में साक्षरता के प्रति जागरुकता, बेटियों की शिक्षा के महत्व और सूदखोरों की हृदयहीनता का बहुत स्वाभाविक-सहज चित्रण करने में नाटककार पूर्णतः सफल है। नाटक हृदयस्पर्शी और सफल मंचन के लिए पूर्णतः उपयुक्त है।
                रंगबघेली पुस्तक का चौथा और अंतिम नाटक है - फूलमती। इस नाटक में बघेलखंड के पंचायती-राज का सजीव चित्रण है। ऐसा लगता है कि नाटककार ने महिला सशक्तीकरण के उद्देश्य से पंचायत-चुनावों में महिलाओं की आरक्षण-सुविधा को बहुत पास से देखा है। तभी तो मातादीन जैसे गांव के दबंग लोग फूलमती जैसी निरक्षर महिला को सरपंच पद का चुनाव जिता देते हैं। चुनाव जीतने के उपरांत फूलमती से कोरे कागज पर अंगूठा लगवाकर उससे मनचाहा काम कराना चाहते हैं।
                विवशता भले हो, परंतु फूलमती के विद्रोह और अपने अधिकारों के प्रति जागृति होने के कारण सच्चाई एक दिन सामने आती है और फूलमती मातादीन के घपलों का पर्दाफाश कर देती है। आज भी गांव के पंचायतों की सच्चाई यही है। सरपंच महिला होती है परंतु पंचायत का संपूर्ण कार्य सरपंच-पति या कोई दूसरा दबंग ही करता है। कभी-कभी तो मुहर के साथ अंगूठा या हस्ताक्षर भी टीप दिया करता है। सही अर्थों में सच्चाई यही है। इसका मंचन स्वयं नाटककार ने बहुत सफलता के साथ 17 जनवरी, सन् 2013 को भोपाल के शहीद भवन में सम्पन्न किया है।
                कुल मिलाकर रंगबघेलीके चारों नाटक बघेली-साहित्य के लिए एक अमूल्य धरोहर हैं। बघेलखंड के ग्राम्यजीवन के यथार्थ को नाटकों के माध्यम से उजागर करने वाले कुशल चितेरे, नाटककार एवं रंगकर्मी योगेश त्रिपाठी के प्रयास श्लाघनीय हैं। मेरी अनंत शुभकामनाएं एवं अपेक्षाएं हैं कि योगेश त्रिपाठी इसी प्रकार अपने नाटकों के माध्यम से बघेली साहित्य को समृद्ध कर उसे गौरवान्वित करते रहेंगे।
                                            पंथानः संतुते शिवाःके साथ,
डा. सुधाकर तिवारी
सिविल लाइंस, बोदा रोड, रीवा म.प्र.
दिनांक - 1 नवंबर, सन् 2005
(पुस्तक लेखक से प्राप्त की जा सकती है।)