समीक्षा - "रंग बघेली'' : बघेली
नाट्य-संग्रह
समीक्षक
डॉ. सुधाकर तिवारी
कुछ दिन पहले योगेश त्रिपाठी द्वारा लिखित नाट्य-संग्रह ‘‘रंग बघेली“ पढ़ने को मिला। यह नाट्यसंग्रह, जिसमें चार नाटक हैं, बघेली में लिखा गया है। इस नाट्य-संग्रह के पूर्व भी योगेश
के कई नाटक प्रकाशित हुए हैं, जिनमें प्रमुख
हैं - हस्ताक्षर, कागज पर लिखी मौत,
मुझे अमृता चाहिए और युद्ध आदि। योगेश एक स्थापित
नाटककार तो हैं ही, एक कुशल, सफल, रंगकर्मी भी हैं। रीवानरेश महाराज विश्वनाथ सिंह कृत ‘ध्रुवाष्टक’ के नाट्य
रूपांतरण का जो उन्हीं के द्वारा किया गया था और कई खंडों में आकाशवाणी रीवा से प्रसारित हुआ वह बहुत ही सुंदर रहा। संस्कृत साहित्य के ‘अभिज्ञान शाकुंतल’ को बघेली
में रूपांतरित कर, कालिदास समारोह उज्जैन
में मंचित कर इन्होंने
श्लाघनीय प्रयास किया है। इनके नाटकों का मंचन देश के विभिन्न नगरों, महानगरों में लगातार हो रहे हैं।
मेरी समझ में साहित्य की अनेक विधाओं में नाटक की रचना अधिक
जटिल है। क्योंकि इसमें सपट बयानी नहीं होती - इसमें नाटक के रचयिता को उसके पात्रों को चरित्र के अनुरूप उसकी मानसिकता के अनुरूप ढालना पड़ता है।
एक नाटक लिखते समय नाटककार, पात्रों की विभिन्न
स्थितियों, परिस्थितियों में जीता
है। कभी पात्र क्रोध में है, कभी वैराग्य में
है, कभी प्रेमाभिभूत है तो कभी ईर्ष्या-द्वेष की ज्वाला में जल रहा है
- इन सभी परिस्थितियों में पात्र के रूप को नाटककार अपने में उतारता होगा - तभी तो
उसका नाटक स्पर्शी और हृदयग्राही होता होगा।
‘रंगबघेली’ के चार नाटकों
में पहला नाटक है -‘होइहैं वहि जो
राम रचि राखा’। नाटककार के
अनुसार इसकी मूल अवधारणा, हिंदी साहित्य की
प्रसिद्ध साहित्यकार मृणाल पांडे की रचना ‘ सोइ राम रचि राखा’ से ली गई है। एक प्रकार से यह उनके नाटक का बघेली रूपांतरण
है। इस नाटक में सामाजिक विसंगतियों, विद्रूपताओं पर करारा व्यंग्य
है, गहरी चोट है। धन्ना
(रामलाल) का लड़का मन्ना (श्यामलाल) सामाजिक क्रांति चाहता है, समानता की बात करता है। इसके लिए वह चोरी और
हत्या तक करता है परंतु दीवान जी अपना हफ्ता बचाने के लोभ में उस पर कोई केस नहीं
दर्ज करते। उस पर कोई आंच नहीं आने देते। हद तो तब हो जाती है जब सावित्री अपने
नसेड़ी पति की हत्या, जो धोखे से हुई
है, से प्रसन्न दिखती है, क्योंकि उसकी हत्या के बदले बहुत अधिक हरजाना मिल जाता है।
उस समय का दृश्य तो और भी आश्चर्यचकित कर देने वाला होता है जब मन्ना भरी दरबार
में अपनी तलवार की नोक से राजा की पगड़ी उछाल देता है और उसमें सांप, जो दीवान द्वारा प्रायोजित होता है देखकर राजा
मन्ना को अपना जीवनदाता समझ लेता है। उसको अपना सारा राजपाट सौंप देता है।
इस नाटक में दीवान की भूमिका पर धन्ना सेठ का
यह कथन - ‘अफसर हाकिम होइके तू एंह
मूरुख राजा के गद्दी हथिआबै मां हमार मददि करे, ओकर पूर इनाम मिली। अरे, हम तोंहरे बिना कुछु कइन नहीं सकित रहेन। हमार लरिका चोरी
करिस, तूं रपोट नहीं लिखै दिहे,
हमार लड़िका हत्या करिस, तूं ओका बरदानी बनाय दिहे, हमार लरिका राजा के ऊपर हमला करिस औ तूं ओका चमत्कार बनाय
दिहे। तूँ त पंगड़ी मां सांप देखाय
केतुअन का गद्दी मां बैठाइ दिहे होबे। जा, एके इनाम मां तोंहका पूर छूट मिली। जी भरिके
जनता का लूटा औ अपने घर के संघे हमरौ घर भरा।’ आज के समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, कदाचरण का खुला चिट्ठा है, और है शासन-तंत्र पर करारा व्यंग्य। इस नाटक का मंचन - रीवा,
सतना, शहडोल और मथुरा में हुआ, जिसे दर्शकों
द्वारा बहुत सराहा गया।
इस संग्रह का दूसरा नाटक ‘छाहुर’ है। छाहुर के नाम से बघेली में अहीर जाति का बिरहा लोकगीत प्रचलित है। इसी ‘छाहुर’ के आधार और
भावभूमि पर इस नाटक की रचना की गई है। मेरी समझ में इसे लोकनाट्य कहना उचित होगा।
इस नाटक का नायक छाहुर नाम का युवक है। वह अपनी मां के साथ रहकर घरेलू पालतू
गाय-भैंसों की रखवाली करता है और उन्हें बहुत प्यार करता है। इस नाटक में नाटककार
ने भले ही कल्पना का सहारा लिया हो परंतु वास्तविकता यही है कि बघेलखंड में कभी,
सामंतों-शासकों का बहुत जोर था। वे अपनी रिआया
के साथ गुलाम जैसा व्यवहार करते थे। ऐसा ही कुछ इस नाटक में देखने को मिलता है।
मैंने स्वयं अपनी आंखों देखा है कि कैसे राजा के रास्ते
में पड़ने पर सुंदर इमारत राजा द्वारा
राजसात कर ली गई और सुंदर फलफूलों का बगीचा तहस-नहस कर दिया गया। कुछ इसी तरह का
चित्रण छाहुर नाटक में देखने को मिला जब राजा द्वारा छाहुर से उसकी दूध देने वाली
भैंस को मांगने पर और उसके मना करने पर राजा के सैनिक जबर्दस्ती
छाहुर की मां की उपस्थिति में हांक ले जाते हैं।
छाहुर दिखने में बकलेल लगता है परंतु है दिमागी
रूप से होशियार। वह वेष बदलकर
राजा के यहां पहुंचता है और छाहुर से चंदना बन जाता है। राजा के यहां चरवाहा यानी
बरेदी का काम करने लगता है। भैंस-गाय दुहते समय अकेले में चंदना की भेंट बबुली नाम
की राजकुमारी से होती रहती है और अनजाने ही प्रेम के अंकुर फूट आते हैं।
एक दिन चंदना यानी छाहुर नाटकीय ढंग से अपने
सारे जानवरों को छुड़ा कर चोरी चोरी घर पहुंच जाता है। मां सारी कथा सुनकर छाहुर को समझाती है कि जाकर राजा के
यहां से पूरे गांव के मवेशियों को लौटा लाओ नहीं तो तुम्हारे माथे पर चोर होने का
कलंक लगेगा। वह मां की इस बात को
मानकर, गांव से जबरन ले जाए गए समस्त जानवरों को लौटा लाने का
संकल्प बताता है। गांव के सभी लोगों को एकत्रकर, उनमें जागृति का भाव भरकर, उनके जबरन ले जाए गए जानवरों को वापस लाने के लिए सबके साथ
लाठी लिए राजा के यहां
पहुंच जाता है। हजारों की भीड़
देखकर राजा भयभीत हो जाता है और जनता की आवाज पर उनके सब जानवर वापस कर देता है।
सबसे रोचक प्रसंग तो यह होता है कि बबुली यानी राजकुमारी की इच्छा से छाहुर का
विवाह उसके साथ हो जाता है। बहू के रूप में बबुली को पाकर छाहुर की मां निहाल हो
जाती है।
इस प्रकार छाहुर नाटक में सामंतशाही का भयावह
रूप, सामाजिक विद्रोह की शक्ति
और रोमांस का चित्रण एकसाथ देखने को मिलता है। नाटक बहुत रोचक है, जिसका प्रथम मंचन स्वयं योगेश त्रिपाठी ने अपने
निर्देशन में मध्यप्रदेश नाट्यसमारोह के अंतर्गत दमोह मध्यप्रदेश में सन् 2005 में किया। इस मंचन को काफी प्रशंसा मिली।
रंगबघेली पुस्तक का तीसरा नाटक है ‘बइसाखी’। इसमें नाटककार बघेली ग्राम्यजीवन का आकलन करने में पूर्ण सफल है। इसमें
बेटियों की शिक्षा, सूदखोरों का कुत्सित मायाजाल, बेटियों के विवाह का प्रपंच, निरक्षर होने का अभिशाप, सब एकसाथ उजागर हुआ। इस तरह का चित्रांकन वही लेखक कर सकता
है जिसने ग्राम्यजीवन को बहुत बारीकी और नजदीक से देखा हो। इस नाटक के अनेक पात्र
हैं परंतु मुख्य रूप से बिटिया परान और उसके पिता छोटेलाल और और मां बुटुनी हैं।
इनमें भी सबसे महत्वपूर्ण चरित्र परान
का है जो विवाह होने से पूर्व कुएं में गिर जाती है। पैर में चोट लगने के कारण वह
बैसाखी के सहारे हो जाती है। उसका विवाह जो तय था, लंगड़ी हो जाने के कारण मनाही हो जाती है। परान इससे हताश-निराश नहीं होती और अधिक उत्साह के
साथ पढ़ने का संकल्प लेती है। जिसमें उसकी मां का बहुत अधिक सहयोग रहता है।
ग्रामीण जन की मानसिकता का सजीव चित्रण तब
देखने को मिलता है जब छोटेलाल का छोटा भाई गनेशी इस लालच में दिखता है कि बड़े भाई की इकलौती बेटी
का विवाह हो जाने के बाद और
भैया-भाभी की मृत्यु के बाद उनकी सारी जमीन-जायदाद उसी की हो जाएगी। निश्चित
रूप से जिन्होंने गांव को नजदीक से देखा है, इस प्रकार की वहां मानसिकता दिखती है, वे इस हकीकत को नहीं समझते कि अनधिकार प्राप्त
की गई संपत्ति कभी सुखद नहीं होती।
इस नाटक में निरक्षर होने का अभिशाप उस समय बखूबी देखने को मिलता है जब निरक्षर छोटेलाल,
सूदखोर का ब्याज चुकाने के लिए बैंक जाकर
रुपिया निकालने जाता है। कोई भी उसका निकासी फार्म भरने को तैयार नहीं होता। वहां
से वापस आकर वह अपनी बिटिया परान से कहता है कि तुम बैंक चलकर फार्म भर दो,
मैं अंगूठा लगा दूंगा। परान कहती है कि तीन दिन
रुक जाओ, पिता के यह कहने पर कि
उसे ब्यौहर का पैसा आज ही लौटाना है तब वह सूदखोर के पास आकर तीन दिन का समय
मांगती है। इन तीन दिनों में परान अपने निरक्षर पिता को आठ हजार रुपिया निकलवाने
के लिए आवश्यक चीजें लिखना सिखा देती
है। बैंक जाकर अपने पिता से ही फार्म भरवाती है और रुपिया निकलवाती है। मैनेजर यह
देखकर बहुत प्रसन्न होता है और छोटेलाल का अंगूठा निशानी की जगह हस्ताक्षर लेता है।
इस प्रकार बइसाखी नाटक में साक्षरता के प्रति
जागरुकता, बेटियों की शिक्षा के महत्व और सूदखोरों की हृदयहीनता का बहुत
स्वाभाविक-सहज चित्रण करने में नाटककार पूर्णतः सफल है। नाटक हृदयस्पर्शी और सफल
मंचन के लिए पूर्णतः उपयुक्त है।
रंगबघेली पुस्तक का चौथा और अंतिम नाटक है -
फूलमती। इस नाटक में बघेलखंड के पंचायती-राज का सजीव चित्रण है। ऐसा लगता है कि
नाटककार ने महिला सशक्तीकरण के उद्देश्य से पंचायत-चुनावों में महिलाओं की
आरक्षण-सुविधा को बहुत पास से देखा है। तभी तो मातादीन जैसे गांव के दबंग लोग फूलमती
जैसी निरक्षर महिला को सरपंच पद का चुनाव जिता देते हैं। चुनाव जीतने के उपरांत
फूलमती से कोरे कागज पर अंगूठा लगवाकर उससे मनचाहा काम कराना चाहते हैं।
विवशता भले हो, परंतु फूलमती के विद्रोह और अपने अधिकारों के प्रति जागृति होने के कारण सच्चाई एक दिन सामने आती है और फूलमती मातादीन के घपलों का
पर्दाफाश कर देती है। आज भी गांव के पंचायतों की सच्चाई यही है। सरपंच महिला होती
है परंतु पंचायत का संपूर्ण कार्य सरपंच-पति या कोई दूसरा दबंग ही करता
है। कभी-कभी तो मुहर के साथ
अंगूठा या हस्ताक्षर भी टीप दिया करता है। सही अर्थों में सच्चाई यही है। इसका मंचन स्वयं नाटककार ने बहुत सफलता के साथ 17 जनवरी, सन् 2013 को भोपाल के शहीद भवन में सम्पन्न किया है।
कुल मिलाकर ‘रंगबघेली’ के चारों नाटक
बघेली-साहित्य के लिए एक अमूल्य धरोहर हैं। बघेलखंड के ग्राम्यजीवन के यथार्थ को
नाटकों के माध्यम से उजागर करने वाले कुशल चितेरे, नाटककार एवं रंगकर्मी योगेश त्रिपाठी के प्रयास श्लाघनीय
हैं। मेरी अनंत शुभकामनाएं एवं अपेक्षाएं हैं कि योगेश त्रिपाठी इसी प्रकार अपने
नाटकों के माध्यम से बघेली साहित्य को समृद्ध कर उसे गौरवान्वित करते रहेंगे।
‘पंथानः संतुते शिवाः’ के साथ,
डा. सुधाकर तिवारी
सिविल लाइंस, बोदा रोड, रीवा म.प्र.
दिनांक - 1 नवंबर, सन् 2005
(पुस्तक लेखक से प्राप्त की जा सकती है।)
आदरणीय बंधु डॉक्टर सुधाकर जी
जवाब देंहटाएंरंग बघेली पर आप की समीक्षा पढ़ने के बाद इस पुस्तक को पढ़ने की मेरी जिज्ञासा हुई। वस्तुत: मै स्वयं एक रंगकर्मी हूं अतः बघेली लिक नृत्य आधारित नाटक छाहुर और होई है वहीं जो राम रचि राखा को मंचित करने की इच्छा है। क्या पुस्तक प्राप्त कराने में आप मेरी सहायता कर सकते हैं।
सहयोग के लिए आभारी रहूंगा मेरा संपर्क नंबर 6392971607 tatha 8004604634 है। विनीत,
अवधेश कुमार मिश्र,महामना पंडित मदमोहन मालवीय कैंसर हॉस्पिटल डॉक्टर्स रेजिडेंस, फ्लैट नंबर A block 405, Sundarbagiya, near aadi Shankara charya ashram Varanasi Uttar Pradesh
आदरणीय बंधु डॉक्टर सुधाकर जी
जवाब देंहटाएंरंग बघेली पर आप की समीक्षा पढ़ने के बाद इस पुस्तक को पढ़ने की मेरी जिज्ञासा हुई। वस्तुत: मै स्वयं एक रंगकर्मी हूं अतः बघेली लोक नृत्य आधारित नाटक छाहुर और होई है वहीं जो राम रचि राखा को मंचित करने की इच्छा है। क्या पुस्तक प्राप्त कराने में आप मेरी सहायता कर सकते हैं।
सहयोग के लिए आभारी रहूंगा मेरा संपर्क नंबर 6392971607 tatha 8004604634 है। विनीत,
अवधेश कुमार मिश्र,महामना पंडित मदमोहन मालवीय कैंसर हॉस्पिटल डॉक्टर्स रेजिडेंस, फ्लैट नंबर A block 405, Sundarbagiya, near aadi Shankara charya ashram Varanasi Uttar Pradesh