गोंड रामायनी नाट्य
आलेख - योगेश त्रिपाठी
12/273, गांधीनगर उर्रहट रीवा म.प्र.
जिस प्रकार छत्तीसगढ़ की पंडवानी है उसी तरह वहीं की गोंड
रामायनी भी है। पंडवानी में महाभारत की कथा सुनाई जाती है, जबकि रामायनी में रामायण की कथा। गोंड रामायनी
को 26 जनवरी 2019 को भोपाल के दशहरा मैदान में विहंगम मंच पर
रिकार्डेड साउंड टै्रक पर ‘लोकपर्व’ कार्यक्रम के अंतर्गत प्रस्तुत किया गया था।
इसके मंचीय रूपांतरण का दायित्व मुझे सौंपा गया था। इस प्रदर्शन का निर्देशन सुमन
साहा ने किया था। इस नाट्य को सामान्य रूप से भी प्रस्तुत किया जा सकता है।
किंदरा बाजा हाथ में लिए गाते हुए सूत्रधार के
रूप में परधान आता है। गोँड स्त्रियां और
पुरुष उनको सम्मान देते हुए उच्चासन पर
बिठाते हैं।
परधान अरे किंदरा बाजा जब बजने लगे तो... आतिमा
झनक उठे !
अरे लछमन महराज के नगरी में हो....
किंदरा बाजा बजने लगे ... हो...
किंदरा बाजा बजने लगे हो....
सुधीजनो ! हमारी गोँड रामायनी, वाल्मीकि के
रामायण, और तुलसीदास के ‘रामचरित मानस’ से बहुत अलग है। इसमें रामायण और रामचरितमानस जैसी एकल कथा
नहीं है बल्कि, सात अलग-अलग कथाएँ हैं जो सात अध्यायों के रूप में सामने आती
हैं। और असलियत पूछो तो मैं बताऊं कि ये अध्याय केवल अध्याय नहीं, सप्तचक्रों पर विजय की महान गाथाएं हैं।
किंदरा बाजा बजने लगे हो .....
अब पूछो कि इन सप्तचक्रों पर विजय किसने की थी ? - लक्ष्मण महाराज ने। तभी तो हमारी गोंड रामायनी
में नायक राम नहीं, लक्ष्मण हैं
भैया। बोलो लक्ष्मण महाराज की !
समूह जय
!
परधान गोंड रामायनी की कथा का आरंभ तब से होता है
जब लंकापति रावण के चंगुल से छूटकर सीता माता, अयोद्ध्या नगरी आ गई थीं। तो करें कथारंभ ? सुधीजनो ! अयोद्ध्या नगरी की बात है ......
परधान झिंझरी महल में सीता बसत हैं,
बदन महल में राम।
लछमन डूंडा महल बिराजत,
सकित सुखन के धाम।
अयोद्ध्या के बदन महल में श्रीराम रहते हैं, झिंझरी महल में सीता और डूंडा महल में सत्यधारी
लक्ष्मण ! श्रीराम और सीता माता तो सुख से निवास कर रहे हैं पर लक्ष्मण महाराज कर
रहे हैं तपस्या ! अब पूछोगे कि भैया लक्ष्मण तप क्यों करने लगे ! अरे, स्वयं के विवाह की चिंता न करके, बड़े भाई और भाभी की सेवा में अपने को लीन किए
रहना, तप नहीं तो क्या है ?
तो ऐसे ही एक दिन लक्ष्मण जी को तप करते हुए
विचार आया कि तप करना तो ठीक है, पर गाने-बजाने के
बिना जीवन, भला कोई जीवन है ?
क्यां न एक किंदरा बाजा बनवा लिया जाय !
किंदरा बाजा बजने लगे हो .....
किंदरा बाजा... जैसे ये मेरे हाथ में है। सो, उनकी आज्ञा से छिउलहा बढ़ई ने बड़े ही मनोयोग से
किंदरा बाजा बनाकर लक्ष्मण जी को दे दिया परंतु, तपस्वी लक्ष्मण ने उस बाजे को दीवार पर टांग दिया और बारह
बरस के नींद में सो गए !
सोय गए लछमन रे तपस्वी, डूंडा महल में हो....
काहे बनाए किंदरा बाजा, काहे का ताना-बाना
कौन ये समझे, कौन विचारे, उनके मन का
ज्ञाना
सोय गए लछमन रे तपस्वी, डूंडा महल में हो...
लक्ष्मण जी उधर सो गए और इधर किंदरा बाजा बजने के लिए बेचैन
हो उठा ! एक दिन लक्ष्मण जी के सपने में आया ! लक्ष्मण की नींद टूटी और किंदरा
बाजा अठारह वाद्यों के साथ टिनटिना उठा ! नौ सौ फड़की और कबूतर पैरों में पायल बांध
के नाचने लगे ! डूंडा महल संगीत से गूंज उठा !
गीत कैसे बाजन ला अंग मा पहर
थैं
कैसे भाई सिंगार बनाय रहे हैं लछमन हो .......
नौ सौ फंड़की परेवा
पहरे हवैं नेवरा परेवा
परवना मा गुथे हुवैं घुंघरू
चोंचन मा दाबे हैं मजीरा
हो... कैसे छन छन छन छन नाच रहे हैं हो.....
संगीत जब पूरे महल में भर गया और बाहर निकलने को बेचैन हो
उठा तो महल का कंगूरा तोड़ के जा पहुंचा इंद्रलोक ! देवी-देवता दंग रह गए ! इंद्र
की कन्या इंद्रकामिनी तो पागल हो उठी और संगीत के सर्जक को देखने के लिए तड़पड़ाने
लगी !
इंद्रकामिनी कौन है ! कौन है ! कौन है जो बजा रहा है इतना
मीठा संगीत ? मैं उसे मिलना
चाहती हूं, मैं उसे देखना चाहती हूं
! ओ री मेरी सहेलियो बताओ वो कौन है कहां है ? मैं कहां उसे ढूंढूं कि वो मुझे मिल जाए ? कोई मेरी सुन क्यों नहीं रहा है ! तो ठीक है,
मैं स्वयं ही उसके पास चली जाऊंगी ! कुर्री बाज
बनकर !
सखियां इंद्रकामिनी ! इंद्रकामिनी !
इंद्रकामिनी चली जाती है ! परधान आता है।
परधान किंदरा बाजा बजने लगे
हो....
जनजातियों के चित्त में पुनरुक्ति है, मूकता नहीं। मन की गति में स्थिरता है, चंचलता नहीं। जिसके मन की गति स्थिर हो जाती है,
वह कामना के संसार में फिर नहीं विचरता। समस्त
धर्मां के मूल में यही बात तो कही गई है। राम-राम, श्याम-श्याम जैसी जाप की परंपराएं पुनरुक्ति की उसी धारा की
बात करती हैं जिसमें जनजातियां सदियों से जीती रही हैं। तो कहानी यहां थी कि
इंद्रलोक से इंद्रकामिनी कुर्री बाज बनकर संगीत की दिशा में उड़ चली और यहां पृथ्वी
पर एक बैगा अपना जाल बिछा रहा था !
परधान जाते हैं, एक बैगा आता है।
बैगा ऊपर रहे महांजाल, तरी रहै विपत जाल। ऊपर फंसे चिरई चुनगुन, खाल्हें फंसे घुटरी साभ्हर। मैंहा नैंया
ठिकाना। रातदिन बैगा खेतला रखाथै हो...... अइसा जाल फैलाया है कि कोई न कोई तो
फंसबै करेगा ! बस, कोई बड़ा पंछी आय
फंसे तो मोरा पेट भर जाय! अरे ! ये अक्कास काहे उमड़ने लगा ! अइसा लगता है जैसे
कउनौ अंधड़ आवै वाला है ! कहीं अइसा न होय कि इस अंधड़ में मोरा जालै उड़ जाए ! एं !
ये क्या ! इतना बड़ा पंछी तो मोयको आज तक नहीं दिखा ! अरे बड़ी गति से इधरै को आ रहा
है ! कहीं ये मोरे मूड़े पर न गिर जाए ! मैं यहैं छुप जाऊं !
कुर्री बाज आता है।
कुर्री बाज आह... संगीत की दिशा में उड़ते-उड़ते यहां
पृथ्वी तक आ गई मैं ! पर अब कहां जाऊं? एं ये क्या ! मैं तो किसी जाल में फंस गई ! अरे आह आह आह !
जाल में फंस जाती है।
बैगा आहाहाहा..... इतना बड़ा पंछी फंसा है तो आज पूरे गांव को न्यौतूंगा
!
इंद्रकामिनी अरे ! यह तो कोई बैगा है ! इसी ने जाल फैलाया
होगा। अब क्या करूं ? इसकी आंखों को
देखकर लग रहा है कि ये तो मुझे मारकर ही खा जाएगा ! हां, मैं अपना रूप बदल लेती हूं !
लड़की बन जाती है।
बैगा एं ! वहां से तो बड़ा भारी बाज दिख रहा था
! पास आया तो स्त्री ! पर है बिकराल सुंदर! अहा... इतनी सुंदर स्त्री तो पहली बार
नजर में आई !
बेहोश होने लगता है।
इंद्रकामिनी ए..... ! सुधि मत खो !
मेरी ओर देखो ! ध्यान से देखो मुझे।
बैगा उसे ध्यान से देखने लगता है।
बैगा अरे तोरे को देखै के तो बेसुध होय रहूं ....
इंद्रकामिनी देखो, मुझे छोड़ दोगे तो मैं तुम्हारी... बहुरिया बन
सकती हूं !
बैगा अं ! छोड़ दूंगा। छोड़ दिया। अब मेरे साथ
चलो। मेरी बहुरिया बनकर। (दोनों चल देते हैं।) ह ह ह ..... ये देखो ई मेरी झोपड़ी
है। मैं अब सोने जाथौं। तुम इते उते पराना नहीं। यहीं रहना ! तुम मेरी बहुरिया हो
! हा हा हा .....
बैगा जाता है।
इंद्रकामिनी घबराती है।
इंद्रकामिनी ये तो गया। अब क्या करूं
!
सुमधुर संगीत तेज होता
है। इंद्रकामिनी बेचैन होने लगती है।
आह ! ये संगीत ! अब मुझे कोई नहीं रोक सकता ! वादक कहीं पास
में ही होगा, मैं अब नहीं रुक
सकती !
फिर से कुर्री बाज बनकर
उड़ने लगती है। मंच का चक्कर लगाती है।
हां, यही है वो जगह, जहां से यह संगीत
निकल रहा है! ये तो कोई महल लगता है !
महल में घुसने के लिए चारों तरफ दौड़ती-भागती है।
अब मैं क्या करूं ? सारे दरवाजे बंद हैं ! मैं कैसे उसे देखूं ! ऊपर की ओर जाती हूं। कोई न कोई तो
रास्ता मिलेगा !
जाती है। फड़की और कबूतरों का दल नृत्य करता हुआ
आता है। दल के जाने पर लक्ष्मण सोता हुआ दिखता है। इंद्रकामिनी आती है।
इंद्रकामिनी अद्भुत दृश्य है ! परंतु वादक कोई नहीं ?
अरे ! ये कौन सो रहा है ? तो यही है वो, मुझे आता हुआ जानकर सोने का बहाना कर रहा है ! आह ! कितनी
सुंदर है इसकी चमकती देह ! ये मुझे पति के रूप में मिल जाए तो मेरे भाग्य खुल जांए
! इसकी रानी बनकर जगाती हूं ! ए ! सुनो जी ! सुनो तो ! अरे ! ये तो कुंभकरण की
नींद सो रहा है ! ए ! देखो तो ! अरे ! इतनी सुंदर स्त्री को समीप पाकर भी इसकी
नींद नहीं खुल रही ! ये बहाना है या सचमुच की नींद ! अब देखना, मैं क्या करती हूं !
गुस्से से भर जाती है। चारों तरफ उलट-पलट मचा
देती है। गहने चारों तरफ फेंक देती है। वस्त्र को फाड़-फाड़कर इधर-उधर फेंकती हुई
चली जाती है। परधान आता है।
परधान किंदरा बाजा बजने लगे
हो....
चारों तरफ ऐसा वातावरण बना दिया इंद्रकामिनी ने, मानो लक्ष्मण महाराज ने न जाने कितनी स्त्रियों
के साथ व्यभिचार किया हो ! कई दिनां तक जब लक्ष्मण की कोई खबर सीता माता को नहीं
मिली तो ....
जानने आ गईं सीता माता, देख अचंभा खा गईं माता हो...
सूत्रधार जाता है,
सीता आती है।
सीता सतधारी लक्ष्मण ! मेरा व्रतधारी लक्ष्मण !
पवन से भी तेज लक्ष्मण ! मेरा आन-बान वाला लक्ष्मण ! वह सत्य से कैसे हिल गया ?
तुझे क्या हो गया लक्ष्मण ? चारों तरफ अनेक स्त्रियों के गहने ! स्त्रियों
के कपड़े ! हे प्रभु ! ये कैसा अनर्थ है ! क्या मेरा देवर नहीं रहा सत्यनिष्ठ ? इसका ब्याह तुरंत होना चाहिए ! (ऊंचे स्वर में) प्रभु
श्रीराम आइए! आप स्वयं देखिए अपने छोटे भाई का हाल !
राम आते हैं।
राम क्या
हुआ सीते ?
सीता प्रभु
! ये देखिए ! देखिए आपके लक्ष्मण ने क्या करतूत की है !
राम चारों ओर का दृश्य देख कर आहत होते हैं।
राम आह ! मेरा लक्ष्मण ऐसा नहीं कर सकता !
सत्य क्या है, पता करना होगा !
(ऊंचे स्वर में) पांडवो ! मेरे समक्ष तुरंत आइए ! देवर्षि नारद, आप भी !
परधान राम संकट पड़ने पर पांडवों को बुलाते हैं।
कहां त्रेता के राम कहां द्वापर के पांडव ! है न मजेदार बात ! दरअसल गोंड चेतना
में समय रैखिक नहीं है, वृत्ताकार है।
वृत्त में कोई भी दूरी ज्यादा या कम भी नहीं होती। अर्थात समय उनके दर्शन में कभी ‘व्यतीत’ नहीं होता है। आज विज्ञान इसी सत्य को तो प्रमाणित करने में
लगा है। तो... राम के पुकारने पर पांडव और देवर्षि नारद तुरंत आ गए !
पांडव आते हैं।
पांडव क्या हुआ प्रभु ! ऐसे क्यों बुलाया हमें ? राजा वासुकि भी आ गए !
राम देख रहे हो तुम सब लोग ये ? ये मेरा भाई लक्ष्मण जो सोता हुआ दिख रहा है,
उसने न जाने कौन-सा कृत्य कर डाला है ! चारों
ओर स्त्रियों के गहने और वस्त्र ! क्या है सत्य ?
नारद आते हैं।
नारद नारायण
नारायण ! सत्य तो लक्ष्मण को जगाने पर ही सामने आएगा !
राम लक्ष्मण
! लक्ष्मण ! ..... तुम अगर अब भी न जागे तो मेरा धनुष उठ जाएगा !
लक्ष्मण जागता है। सीता लक्ष्मण के पास जाती
है।
लक्ष्मण क्या
हुआ भैया ? भाभी ? आप सब लोग यहां ? और ये सब क्या है ? आप सभी ऐसे मुझे क्यों देख रहे हैं ? अरे ! ये सब क्या है ! .... मैंने कुछ नहीं किया है भैया ! भाभी, मैं निर्दोष हूं। ये सब किसी की माया है ! किसी
का छल है !
राम देवर्षि
! अब क्या करें ?
नारद लक्ष्मण
के सत की अग्नि परीक्षा लो !
राम (आगे
आकर ऊंचे स्वर में) मेरी आज्ञा है कि लोहे का महल बनवा कर उसे लकड़ियों से छा दिया
जाय !
परधान आता है। इस बीच, समूह द्वारा महल बना कर उसे लकड़ियों से आच्छादित कर देने का
नृत्यात्मक अभिनय।
गीत (महल बनाते समय का गीत)
लोहा का ईंट, लोहा का गारा, लोहा के भीत बने हवें भाई !
लोहा का मलगा, लोहा का बांस, लोहा का खपरा रे दादा !
लोहा का चौखट, लोहा का कुंदा, लोहा का दुआर रे भाई !
(लकड़ी से ढंकने के समय का गीत)
चले हवे लसकत कवारी, चले जाथै हुमकत कबारी
चले जाथे खेप लैके, पूरन लागिन लोहा महल ला
एक खेप, दुई खेप, तीन खेप, चार खेप
पांच खेप, छः खेप, दुपहर भर दस खेप,
संझा भर बीस खेप ....
चाकर श्रीमान
! जैसा आपने कहा रहा, लोहे का महल बनवाकर,
काठ से ढांक दिया है !
राम, पांडवों और नारद
सहित अग्रमंच के कोने में आते हैं। सीता विह्वल होकर लक्ष्मण की ओर देखती है।
राम सीते
!
सीता भी बाहर आती हैं।
(ऊंचे स्वर में) मेरी आज्ञा है - महल में आग लगा
दो !
नारद नारायण
नारायण !
समूह द्वारा आग लगाने का अभिनय। महल जलने लगता
है।
गीत लग गैन्हें बजुर किंवारा, लग गैसे आगी दंवारा
बरन लगिन बन के लकड़िया, भै गैसे बन मां उजारा
धंधग गैसे आगी, तपन लगिस लोहा
टिघल टिघल के, बूंद-बूंद चुह थे
लक्ष्मण किंदरा बाजा बजाने लगते हैं। बाहर राम
विह्वल होते हैं।
राम लक्ष्मण
! लक्ष्मण ! हा लक्ष्मण !
वासुकि राम ! भाई को
आग में झोंक कर विलाप कर रहे हो ! अब तुम अकेले रह गए हो राम ! अकेले !
राम हा
लक्ष्मण !
भीम मामा,
आपका विलाप मुझसे देखा नहीं जा रहा। कहें तो
मैं पानी लाकर आग बुझा देता हूं।
राम भीम
! जल्दी जाओ, कुछ भी करो,
मेरे लक्ष्मण को बचाओ !
भीम अभी
जाता हूं !
भीम जाता है।
लक्ष्मण अच्छा
तो भीम मुझे बचाने के लिए पानी लेने गया है ! जीवन भर ताना मारेगा कि लक्ष्मण
तुम्हें मैंने बचाया है ! यह सब सुनने से अच्छा है कि मैं स्वयं महल से बाहर आ
जाऊं ! (बाने की खूंटी को) जाओ तुम ! भीम के घड़े को फोड़ डालो !
मांत्रिक क्रिया करते हैं। खूंटी चुड़ैल का रूप
धर कर चल देती है। भीम एक विशाल घड़े को लेकर जा रहे होते हैं कि चुड़ैल उन पर
आक्रमण करती है। घड़ा फूट जाता है। भीम लौट जाते हैं। लक्ष्मण बाहर आते हैं। राम
दौड़कर उन्हें छाती से लगा लेते हैं। नर्तक दल आकर गाता-नाचता है। परधान आते हैं।
परधान पूर भई सत् परीक्षा, खरे उतरे लछमन हो...
सतधारी लछमन, वरतधारी लछमन....
पूर भई सत् परीक्षा, खरे उतरे लछमन हो...
डूंडा महल में लक्ष्मण किंदरा वाद्य बजाते हैं। पर, क्या वास्तव में वो किंदरा वाद्य ही बजाते हैं ?
बड़ी गूढ़ है गांड रामायनी।
गोंड दर्शन देखिए कि यहां पर किंदरा वाद्य नहीं, बल्कि तन है, शरीर है। और तार - इंद्रियां हैं। सारी इच्छाएं ध्वनियों के
रूप में बाहर आती हैं। यदि इन इंद्रियों पर अंकुश है तो संगीत सुर में निकलेगा,
अंकुश नहीं है तो बेसुरा।
कामना में फंसे व्यक्ति का संगीत कभी सुर में निकल सकता है भला ?
मानव-तन है किंदरा बाजा, इंद्री इसके तार हो...
बस में रखियो तारों को तो, सुर साजे सिंगार हो !
इंद्रकामिनी के स्वाभिमान को बड़ी तगड़ी ठेस लगी थी। वो ऐसे
ही मानने वाली कहां थी। अब उसने क्या किया अगले अध्याय में सुनो !
किंदरा बाजा बजने लगे हो .....
इस बार इंद्रकामिनी, डूंडा महल में मक्खी बनकर घुस आई। मानवी रूप धारण की और
करने लगी प्रतीक्षा लक्ष्मण महाराज के जागने का। काहे को जागें। तो वह गुस्सा गई।
सोते हुए लक्ष्मण महाराज को उड़ाकर ले गई इंद्रलोक। सीमा पर पहुंचकर बना दिया -
क्या? - बकरा !
किंदरा बजाता हुआ जाता है।
सहेलियां ये
क्या इंद्रकामिनी ! तू क्या ये बकरा लाने गई थी पृथ्वी पर ? आखिर ये बकरा कौन है?
इंद्रकामिनी कैसे बताऊं कि ये मेरे कौन हैं ! झूठ भी नहीं
कह सकती, और सच भी नहीं बता सकती।
सहेली क्या
सोचने लगी इंद्रकामिनी ? बताओ न ! यह बकरा
क्या लगता है तुम्हारा ?
इंद्रकामिनी समझ लो कि यही तुम्हारे बहनोई हैं।
सहेलियां क्या
???
इंद्रकामिनी बकरे के साथ हंसती हुई
भागती है। सहेलियां पीछे-पीछे जाती हैं। परधान आता है।
गीत सब लरकियां जुर मिल के भैया
बोकरा के केवा कसदा करन लगिन दादा
कोनों पूंछ ला उमेठथैं कोनों कानन ला छेदथैं
कोनूं गरे मा घुंघरू बांधे हवै दाऊ
दिन भर लरकियां करथैं किलोल रे भैया
हो... लछमन के आफत भै जाथै रे भैया .....
परधान लक्ष्मण
महाराज के दुर्दिन आ गए थे। इंद्रकामिनी उन्हें दिन में बकरा और रात में मानुस
बनाकर नचाती ! थक गए लक्ष्मण महाराज तो एक दिन वो फरियाद किए। किससे ? सीता माता से। कैसे ? सीता माता ने सपने में आकर !
बचा लो माता, मैं तो फंसा मझधार हो....
अपनी पीड़ा, कैसे सुनाऊं, किसको सुनाऊं तुम ही बताओ
इंद्रलोक में माया छलती, इस माया से मुझको बचाओ
बचा लो माता, मैं तो फंसा मझधार हो....
सीता माता ने सपने की बात बताई राम से और राम
ने पुकारा पांडवों को !
राम (ऊंचे स्वर में) पांडव बंधुओ ! मेरे
समक्ष तुरंत आइए !
पांडव आते हैं।
भीम क्या हुआ श्रीराम ?
राम लक्ष्मण किसी संकट में है। वह कहां हो
सकता है ? सहदेव पोथी विचारो !
सहदेव राम,
लक्ष्मण इस समय इंद्र की कन्या इंद्रकामिनी के
आधिपत्य में है। उसने उसे बकरा बना रखा है !
राम ओह
! तब तो हमें वहां जाना होगा। इंद्र, नाच-गान का प्रेमी है। सेना तैयार करिए !
नारद नारायण
नारायण !
पांडव जो
आज्ञा श्रीराम !
नारद सहित पांडव नाचते-गाते इंद्रमहल तक जा
पहुंचते हैं।
गीत अब
बने हैं तमाशा रे भैया
धरे हैं तमूरी मुनी नारद हो
खंजरी धरे हैं सहदेव भैया
लै हैं तूमा भीम मरदाना
सरंगी बजाय रहे हैं तुड़ंग दादा
ढोलकी लै हैं अर्जुन रे भैया
नकुल नाच रहे हैं छम-छम करके हो......
बजे है तमूरा, ढोलकी मंजीरा।
बजे हैं नगाड़ा, नाचे हवै नकुल हो.....
इंद्र वाह
वाह ! इतना सुंदर नृत्य और गान ! मैं बहुत प्रसन्न हुआ ! बताओ ! पारितोषिक में
क्या चाहिए ?
नारद पारितोषिक
में हमें चाहिए महाराज मात्र एक बकरा !
इंद्र बकरा
?
नारद हां
देवराज, वो बकरा, जो इंद्रकामिनी के आधिपत्य में है ! मात्र उसी
की खाल से इस मृदंग में अद्भुत धमक आ सकेगी देवराज !
इंद्रकामिनी मैं वो बकरा नहीं दूंगी।
नारद तुम्हें
देना होगा इंद्रकामिनी ! ले जाओ गायक ! मैं बहुत प्रसन्न हुआ !
सभी बकरे को लेकर नाचते-गाते जाते हैं। इंद्रकामिनी गुस्से
से पागल हो उठती है। मांत्रिक क्रिया से कुर्री बाज बन जाती है। वह पीछा करने के
लिए जाती है। दूसरी ओर से नारद व पांडवों का नर्तक दल लक्ष्मण को लिए हुए आता है।
राम व सीता से मिलता है। चल पड़ते हैं तभी कुर्री बाज के रूप में इंद्रकामिनी का
आक्रमण होता है। राम इंद्रकामिनी से युद्ध करते हैं। वह सीता पर आक्रमण करती है।
सीता-इंद्रकामिनी युद्ध होता है। युद्ध समाप्त होने का नाम ही नहीं ले रहा था तभी
.... (इस बीच में यह गीत डाला जा सकता है।)
गीत बाज
लोट पोट के रानी बन गैस री बैया
सीता जी के जूरा ला पकर लैस रे दादा
दोनों झनी झींका झपटी होन लगिन भाई
लातन के घम गुरदा थप्पड़ के थपड़ी होथैं दादा
ओला वा ओला वा पटकन लगिन भाई।
नारद नारायण
नारायण ! मान गया तुम्हें इंद्रकामिनी ! लक्ष्मण को पाने की तुममें उत्कट अभिलाषा
है। एक काम करते हैं। तुम्हारा विवाह लक्ष्मण से करा ही देते हैं। आप लोग क्या
कहते हैं? देवी सीते !
सीता मेरे
मन की यदि पूछ रहे हैं देवर्षि, तो मैं अपने
देवरजी के लिए ऐसी दुल्हन कभी नहीं चाहूंगी। फिर भी, जैसी आपकी आज्ञा।
नृत्यमुद्राओं के साथ सभी डूंडा महल पहुंचते
हैं।
लक्ष्मण इंद्रकामिनी
! हमारी परंपरा है, विवाह के पूर्व
कुलदेवता की पूजा करने की। भीतर आओ !
लक्ष्मण इंद्रकामिनी को बीचोंबीच गहरे मंच पर
ले जाता है।
अरे ! अग्नि लाना तो मैं भूल ही गया ! तुम यहीं रुकना !
लक्ष्मण बाहर चला जाता है। महल के एक-एक दरवाजे बंद होने
लगते हैं। इंद्रकामिनी जीवन भर के लिए महल में बंद कर दी जाती है।
दृश्य नेपथ्य की ओर जाता है। परधान का प्रवेश।
परधान कामना .... कामना.... कामना..... कहां
किंदरा बाजा और कहां कामना !
कामना ही है नाश का द्वार। कामना ही है दुःखों का मूल
स्रोत। लक्ष्मण महाराज ने जब जाना कि सीता माता को इंद्रकामिनी नहीं है स्वीकार,
तो मायाविनी को दे दिया आजन्म कारावास !
इंद्रकामिनी जीवन भर के लिए महल में बंद हो गई। जब तक संसार रहेगा तब तक वह महल से
निकल नहीं पाएगी ! जानते हो ? आज भी वह
नागिन-सी फुफकारती है। उसकी फुफकार से झाग निकलता है जिससे.... हैजा की बीमारी
होती है ! हा हा हा .....
लक्ष्मण महाराज ने इधर अपने कर्तव्य को पूरा किया और उधर
सीता माता को सताने लगी उनके ब्याह की चिंता। अब आरंभ होती है तीसरी कथा यानी गांड
रामायनी का तीसरा अध्याय !
किंदरा बाजा बजने लगे हो ..... ध्यान से सुनिये
हो....
परधान जाता है। लक्ष्मण और सीता आते हैं।
लक्ष्मण तिरिया
फूल, तिरिया फूल... ये क्या
लगा रखा है भाभी मां ! आखिर है ये कौन तिरिया फूल ! और उसमें ऐसी क्या विशेषता है
कि मैं उससे ब्याह करूं ?
सीता तो
सुनो लक्ष्मण !
तिरिया फूल बहुत सुकुमारी, बहुत ही सुंदर राजदुलारी।
करो ब्याह उससे तुम भैया, इंद्र की दुर्लभ राजकुमारी।।
लक्ष्मण इंद्र
की दुर्लभ राजकुमारी तिरिया फूल ? वो इतनी सुंदर है
?
सीता हां,
बहुत ही सुंदर, साथ ही बहुत ही गुणी ! बुद्धि में अपरंपार ! बलशाली ! मैं
कुछ नहीं जानती, मुझे चाहिए
तिरिया फूल जैसी देवरानी !
सीता जाती है।
लक्ष्मण भाभी को
देवरानी पाने की कितनी इच्छा है ! क्या मैं उनकी इच्छा का पालन नहीं कर सकता !
करूंगा ! करूंगा भाभी मां ! ले आऊंगा तुम्हारी देवरानी के रूप में तिरिया फूल को!
लक्ष्मण प्रणाम करके जाता है।
परधान चले जा रहे हैं लछमन रे भाई !
एक बन नकिन, दुई बन नकिन रे दादा
तीन बन नकिन, चार बन रे भाई !
पहुंच गए इंदर लोक के मेड़ो मां हो .........
दो अघोरी साधु नाचते हुए आते हैं।
साधु 1 बस-बस-बस यहीं तक है इंद्रपुरी का घेरा। यहीं
पर जमता है अपना डेरा। अब क्या कर लेगा हमारा, बड़ा आया इंद्रपुरी का राजा !
साधु 2 हा हा हा .....
लक्ष्मण आता है।
लक्ष्मण तिरिया
फूल ... तिरिया फूल .... इंद्रपुरी की सीमा पर आ चुका हूं। इंद्रपुरी के अंदर कैसे
जाऊं, इन साधुओं से पूछता हूं।
जय भोले !
साधु 1 जय भोले !
साधु 2 क्या है भोले ?
लक्ष्मण तिरिया
फूल ... ?
दोनों साधु हंसते हैं।
इसमें हंसने का क्या कारण है ? तिरिया फूल से मिलना है, कहां मिलेगी ? जानते हो तो बताओ, अन्यथा मुंह मत
बनाओ !
साधु 1 रोज आती है शाम
को भान तालाब में सात बहनों के साथ नहाने।
साधु 2 पर उन्हें देखना
आसान नहीं है !
लक्ष्मण तुम
दोनों इसी लिए बैठे हो क्या ?
साधु 1 नहीं !!! (आंख
मिचमिचाता है।)
लक्ष्मण ये
क्या है ?
साधु 2 आंखों में रेत
भरकर तालाब किनारे बैठ जाओ, तभी देख पाओगे !
लक्ष्मण और
तालाब कहां है ?
साधु 1 ये देखो !
लक्ष्मण वहीं पर बैठने का निश्चय करता है।
साधु यानी
कि मुझे यहीं पर बैठना होगा। तुम लोगों का यहां क्या काम ! भागो अब ! भा...गो....
!
दोनों साधु भाग कर दूसरे कोने में बैठ जाते
हैं।
लक्ष्मण संझा
होने को आई। अब मैं साधुओं की बताई रीति के अनुसार आंखों में रेत डालकर बैठ जाता
हूं।
आंखों में रेत डालने का उपक्रम करता है। आंखें
दुखने लगती हैं।
अरे ! रेत पड़ते ही आंखें तो गड़ने लगीं ! पानी ! कहां है
पानी ! .....
आगे आकर तालाब के पानी से आंख धोने का उपक्रम
करता है।
हां, अब जाकर आराम हुआ ! आ जाओ तिरिया फूल !
तभी एक प्रौढ़ स्त्री मांत्रिक क्रिया करती आती
है।
स्त्री सो जा ! सो जा ! सो जा !
लक्ष्मण सो जा ?
लक्ष्मण सहित साधु भी सो जाते हैं। दुर्लभ कन्या अपनी सात
बहनों के साथ आती है। स्नान करके चली जाती हैं। लक्ष्मण व साधुओं की निद्रा भंग
होती है।
लक्ष्मण अरे
! ये तो रात हो गई ! लगता है दुर्लभ कन्या आकर चली गई ! कहां गए साधु ! ओ साधुओ !
ये तुमने कौन-सी रीति बताई ? मुझे तो अहमक
नींद आई ! कोई दूसरी रीति है क्या भाई ?
साधु 1 ये लो मिर्ची का चूरा ! आंख में डाल लो
पूरा.... नींद नहीं आएगी, दुर्लभ कन्या दिख
जाएगी !
लक्ष्मण खुशी-खुशी अपने स्थान पर आता है।
लक्ष्मण अब
होने को है संध्या, दिखेगी दुर्लभ
कन्या ! करता हूं सही उपचार, मिर्च करेगी अब
चमत्कार !
आंखों में मिर्च का चूरा डालता है। आंख जलने
लगती है।
अरे रे रे.... ये साधु हैं कि राक्षस ! कैसी-कैसी बताते हैं
रीति ! कहां है पानी ! कहां है पानी !
आगे आकर पानी से आंख धोने का उपक्रम करता है।
अब आराम हुआ ! लगता है वो आ रही है !
प्रौढ़ स्त्री मांत्रिक क्रिया करती हुई आती है।
स्त्री सो
जा ! सो जा ! सो जा !
लक्ष्मण एं !
लक्ष्मण व दोनों साधु सो जाते हैं। दुर्लभ कन्या अपनी सात
बहनों के साथ आती है। स्नान करके चली जाती हैं। लक्ष्मण व साधुओं की निद्रा भंग
होती है।
लक्ष्मण फिर आ गई थी नींद ! अब क्या करूं ?
साधु 1 ओ बच्चा ! इधर आ !
लक्ष्मण अरे क्या इधर आऊं ! बार-बार भरमाते हो,
रीति सही नहीं बताते हो !
साधु 1 तू है मन से बच्चा, लेकिन प्रण में है सच्चा ! ये ले !
एक पोटली देता है।
लक्ष्मण क्या है इसमें ?
साधु 1 मक्के की लाई !
लक्ष्मण इसे भी आंख में डालना है ?
साधु 1 नहीं। इसे फैलाना है ! अपने चारों ओर फैला दे ! उसके बाद
दुर्लभ कन्या का दर्शन ले !
लक्ष्मण पोटली खोलकर लाई को चारों ओर फैला देता
है। साधु हंसते हैं।
लक्ष्मण अगर ये रीति भी काम न आई तो समझो कि होगी
तुम दोनों की पिटाई !
साधु 1 हा हा हा ... बड़ा ही ....
दोनों साधु नटखट है !
लक्ष्मण सावधानी से बैठता है।
लक्ष्मण दिन डूबने को चला है !
देखता हूं दुर्लभ कन्या, कन्या है या कोई
बला है !
प्रौढ़ स्त्री मांत्रिक क्रिया करती हुई आती है।
रुक जाती है।
स्त्री सो
जा ! सो जा ! एं ! (गंध को महसूस करती है।) मक्के की लाई की सुगंध ! कहां है?
कहां है ?
लक्ष्मण यहां है !
स्त्री आ हा हा .... मेरा प्यारा भोजन ! मक्के
की लाई !
प्रौढ़ स्त्री लाई बीनकर खाने में जुट पड़ती है। खाती हुई
निकल जाती है। दुर्लभ कन्या अपनी सात बहनों के साथ आती है। दोनों साधु भय से दुबक
जाते हैं। नृत्यात्मक गतियों के साथ सभी कन्याएं तिरिया फूल में परिवर्तित हो जाती
हैं। स्नान करके जाने लगती हैं। लक्ष्मण एक का हाथ पकड़ लेता है। शेष बहनें चली
जाती हैं।
लक्ष्मण दुर्लभ
कन्या ! दुर्लभ कन्या ! एक बार और.... एक बार और तिरिया फूल बनकर दिखाओ!
दुर्लभ कन्या नहीं।
लक्ष्मण दिखाओ न !
दुर्लभ कन्या नहीं।
लक्ष्मण दिखाओ
... दिखाओ ! जब तक एक बार और तिरिया फूल बनकर नहीं दिखाओगी, मैं तुम्हें जाने नहीं दूंगा !
दुर्लभ कन्या तो फिर ठीक है। उसके बाद तो जाने दोगे न ?
लक्ष्मण हां। वचन देता हूं।
दुर्लभ कन्या अच्छा... चलो फिर एक बार और बन जाती हूं ....
दुर्लभ कन्या दोबारा तिरिया फूल बनती है। आकाश में हलचल
होती है। भयानक अट्टहास सुनाई देता है। भौंरामल दानव नृत्यात्मक गतियों के साथ आता
है। दोनों साधु भयभीत होकर एक-दूसरे से लिपट जाते हैं।
भौंरामल हा
हा हा .... इसी पल की तो प्रतीक्षा थी ! तिरिया फूल ! तेरा स्थान मेरे ही अंक में
है ! हा हा हा ..... आ जा ! आ जा ! ....
भौंरामल तिरिया फूल को उठा ले जाता है। लक्ष्मण
साधुओं के पास आता है।
लक्ष्मण कौन
था ये दानव ? बताओ ? बताओ मुझे ? कहां ले गया वो तिरिया फूल को ?
साधु 1 ये दानव भौंरामल
है।
साधु 2 और वो ले गया है
उसे कजली वन में !
लक्ष्मण कजली
वन ?
साधु 1 हां, और बांस के एक झुंड में छुपा दिया है !
लक्ष्मण अच्छा
! कहां है कजली वन ?
दोनों साधु उस तरफ ! तुम जाओ उस ओर... और हम जाते हैं....
इस ओर !
दोनों साधु विपरीत दिशा में भाग जाते हैं और लक्ष्मण दो
चक्कर लगाता है।
लक्ष्मण कजली
वन में तो आ गया हूं पर वो बांस का झुंड कहां है ! तिरिया फूल ! तिरिया फूल! कहां
हो तुम ! कहां हो तुम तिरिया फूल !
तिरिया फूल (दूर से आवाज आती है।) मैं यहां हूं !!!!
मंच पर हलचल होती है। पेड़-वनस्पतियां हिलने लगती हैं।
बांसों के झुंड में तिरिया फूल दिखती है। लक्ष्मण उसे निकालता है। दोनों आलिंगन-बद्ध
होते हैं।
तिरिया फूल तुमने मुझे बचाया इसलिए तुम मेरे प्रिय हो।
लक्ष्मण तो फिर मुझसे ब्याह भी करोगी न ?
तिरिया फूल हां।
लक्ष्मण ओह तिरिया फूल !
चारों ओर से भौरों का आक्रमण होता है। लक्ष्मण उनसे अपने को
मुक्त नहीं कर पाता।
लक्ष्मण आह
आह ... इतने सारे भौंरे ! इतने भयानक भौंरे ! आह आह .... घबराना नहीं तिरिया फूल ! हे धरती मां हमें बचा लो !
धरती बीच से फट जाती है। लक्ष्मण तिरिया फूल समेत उसमें समा
जाता है। भौंरों का दल चला जाता है।
झिंझरी महल में सीता परेशान अवस्था में। राम
आते हैं।
राम क्या
हुआ सीते ? तुम इतनी व्यग्र क्यों हो
?
सीता प्रभु
मुझे रात में सपना आया। सपने में लक्ष्मण पुकार-पुकार कर कह रहा था, भाभी मां मुझे बचा लो ! भाभी मां मुझे बचा लो !
प्रभु, मेरा लक्ष्मण किसी संकट
में है ! उसे बचा लीजिए ! उसे बचा लीजिए !
राम अग्रमंच पर आते हैं।
राम (ऊंचे
स्वर में) पांडव बंधुओं उपस्थित हो !
पांडव क्या
हुआ राम ?
राम लक्ष्मण
कहीं संकट में है। वह कहां है, सहदेव ही बता
सकते हैं !
सहदेव मनन करता है।
सहदेव पता
चल गया राम। सेना को तैयार करिए।
राम सेना
तैयार हो !
ढोल ताशे बजने लगते हैं। देवी-देवता, महादेव, हनुमान, अंगद, पांडव आदि समूह
बनाते हैं। मंच का चक्कर लगाकर एक तरफ खड़े होते हैं।
सहदेव लक्ष्मण वहां है राम !
राम भीम, मेरी आज्ञा है कि तुम जाओ ! और मेरे लक्ष्मण का पता लगाओ !
भीम जो आज्ञा राम।
गदाधारी भीम आगे जाते हैं।
भीम लक्ष्मण ! कहां हो लक्ष्मण !
भौंरे भीम पर टूट पड़ते हैं। भीम परेशान ...
भीम अरे
अरे ..... भौरों की सेना ! अभी बताता हूं ... आ जाओ अरे अरे .... बचाओ बचाओ ....
क्या करूं.... इन भौंरों से बचने के लिए समुद्र में ही कूद जाता हूं...
राम व अन्य लोग प्रतीक्षारत हैं। भीम आता है।
राम भीम, तुम समुद्र के रास्ते वापस आ गए ?
भीम राम,
वहां तो लाखों भौंरे हैं, मैं भला गदा से किस-किस को मारता ! किसी तरह से
प्राण बचा कर लौटा हूं !
राम तो फिर यह काम कौन कर सकता है ? हनुमान !
हनुमान आज्ञा करिए प्रभु।
राम अब तुम जाओ।
हनुमान जो आज्ञा।
हनुमान उछलते-कूदते पहुंचते हैं। चारों ओर भौंरों की सेना
उन पर आक्रामक नजर से देखती है।
भीम ठीक
ही कह रहा था। इन्हें बाहुबल से नहीं हराया जा सकता। बुद्धिबल का उपाय करता हूं।
बनाता हूं एक मायावी महाजाल !
हनुमान मांत्रिक क्रिया कर एक मायावी महाजाल की रचना करते हैं।
जाल को पूरा जोर लगाकर फेंकते हैं। सारे भौंरे उस जाल में फंस कर छटपटाने लगते
हैं। अब हनुमान पूरे जाल को समेटकर बार बार जमीन पर पटकते हैं। भौंरे मर जाते हैं।
लक्ष्मण ! तुम कहां हो ! लक्ष्मण !
लक्ष्मण (धरती के अंदर से) मैं यहां हूं हनुमान !
मैं धरती के अंदर हूं !
हनुमान धरती के अंदर ! ठीक है,
मैं अभी निकालता हूं !
हनुमान धरती का सीना चीरने का अभिनय करके
लक्ष्मण और तिरिया फूल को बाहर निकालते हैं। राम के समूह में खुशी की लहर आ जाती
है। हनुमान, लक्ष्मण व तिरिया
फूल राम के समूह के पास आते हैं।
राम लक्ष्मण ! मेरे भाई !
राम, लक्ष्मण को गले लगाते हैं। तिरिया फूल राम के चरण छूती है।
सभी प्रसन्न होकर नाचने लगते हैं। लक्ष्मण व तिरिया नेपथ्य में चले जाते हैं।
नृत्य समाप्त होते-होते सीता, लक्ष्मण व तिरिया को वर-वधू के रूप में ले आती है। दोनों का विवाह संपन्न होता
है। परधान आता है।
परधान आनंद आनंद पूरे अजोद्धा में आनंद ! लछमन और
दुर्लभ कन्या का विवाह संपन्न हुआ और महारानी सीता को सुंदर देवरानी मिली ! पर अभी
गोंड रामायनी का तीसरा अध्याय ही संपन्न हुआ है। अभी तो बहुत सुनाना शेष है।
किंदरा बाजा बजने लगे हो .....
बहुत दिनों के बाद अचानक एक दिन लक्ष्मण महाराज अपनी भाभी
मां, यानी सीता माता से मिलने
पहुंचते हैं झिंझरी महल में। अब कोई अचानक मिलने आ गया तो आवश्यक थोड़ी है कि वह
खाली बैठा हो और आवभगत में लग जाए ! सीता माता अपनी सखी-सहेलियों के साथ
हास-परिहास में व्यस्त थीं। नहीं ध्यान दिया लक्ष्मण जी की ओर। लक्ष्मण जी गुस्सा
हो गए। रूठ कर आंगन में आसन जमाकर बैठ गए। सीता माता दौड़के आ गईं उनको मनाने।
लक्ष्मण जी ने अपना मनपसंद भोजन मांगा। पूछो क्या ? सुनना - बिना जोते खेत का चावल, मक्खी का दूध, भर्रू घास के लाछे, लाल मुंह का
चबैना, बिना पैर का बकरा,
बिना आंख का घोड़ा और कलेजे के पानी से बना हुआ
भोजन! सीता माता चकरा गईं ! आज भैया को क्या हो गया ! नदी के कछार में लाछा तोड़ने
गईं तो हाथ चिरा लाईं। भोजन सामग्री लाने विराटनगर गईं तो एक भी वस्तु न मिली।
थक-हार कर लौट रही थीं कि मार्ग में एक सयानी दादी मिलीं।
दादी तुम रो क्यों रही हो बेटी सीता ?
सीता क्या
करूं दादी ! देवर लक्ष्मण ने भोजन में ऐसी वस्तुओं की चाहना की है कि मैं कहां से
लाऊं !
दादी अच्छा
! तनिक बता तो !
सीता बिना
जोते खेत का चावल ....
दादी लंपा
के चावल तुम्हारे महल में ही होंगे।
सीता अच्छा
! और ... भर्रू के लाछा !
दादी बराही
का गुड़।
सीता और
मक्खी का दूध कहां से लाऊं ?
दादी शहद
नहीं है तेरे महल में ?
सीता लाल
मुंह का चबैना ?
दादी मिर्ची
रे।
सीता बिना
पैर का बकरा ?
दादी बैगन।
सीता अंधा
घोड़ा ?
दादी ह
ह ह... बड़ा शैतान है तुम्हारा देवर। अंधा घोड़ा माने पांव की जूती।
सीता और,
कलेजे का पानी ?
दादी कलेजे
का पानी मतलब, बरफ रे। अब जा,
सब परोस दे उसको।
सीता धन्यवाद
दादी !
दोनों अपनी-अपनी दिशा में जाते हैं। परधान आता है।
परधान सीता देवर की पसंद का भोजन परोस दीं लेकिन
भोजन में सीता के पसीने की बूंद गिर जाने का बहाना कर भोजन को छुआ तक नहीं। सीता
माता को ऐसा आघात हुआ कि बेसुध होकर गिर पड़ीं और गहरी नींद में चली गईं। अब नींद
में गईं तो क्या होगा ? सपना देखा। सपना
देखा और चिल्ला कर जाग पड़ीं !
किंदरा बाजा बजने लगे हो .....
लक्ष्मण क्या हुआ भाभी ? क्या हुआ भाभी ?
क्या हुआ भाभी ?
सीता मैंने एक सपना देखा। सपना देखा कि
तुम्हारा ब्याह कलशापुर के राजा मछंदर की बेटी मचला दई से हो रहा है !
लक्ष्मण तो ? क्या आज्ञा है ?
सीता मेरी
आज्ञा है कि मेरा सपना पूरा करो !
लक्ष्मण सिर झुकाते हैं, चले जाते हैं। सीता अंदर की ओर।
परधान भाभी
मां के सपने को पूरा करने के लिए अपने सत्य को थाम कर सत्यनिष्ठ लक्ष्मण चले तो
मचला दई से ब्याह करके ही लौटे। भाभी मां की आज्ञा थी। कैसे टालते ? गोंड रामायनी में नायक राम नहीं बल्कि लक्ष्मण
हैं। लक्ष्मण महाराज के ही इर्दगिर्द पूरी रामायनी है। वास्तव में जनजातीय चेतना
यहां कह रही है कि जो दूसरे के कल्याण के लिए जीवन जीता है, जो दूसरे की इच्छा को पूरी करने के लिए तत्पर रहता है,
सारे कष्ट उसी के पास हैं। दोहराव भी है यहां।
सीता माता सपने देखती हैं और उन्हें पूरा करने के लिए लक्ष्मण जी चल देते हैं।
अरे किंदरा बाजा जब बजने लगे हो...
एक दिन सीता माता ने सपना देखा कि लक्ष्मण, लंका गढ़ के राजा रावण की पुत्री रानी फुफैया से
ब्याह करके लौटे हैं पर इस बार एक अजूबी ही बात हुई ! लक्ष्मण महाराज स्त्री वेश
में हैं ! घोर आश्चर्य ! आखिर लक्ष्मण ने स्त्री रूप धारण ही क्यों किया ? सीता माता से रहा नहीं गया, और उन्होंने लक्ष्मण को सपने के बारे में बता
दिया और फिर से एक आज्ञा दे दी -
सीता लक्ष्मण से बात करने का माईम करते हुए आती
हैं।
सीता सुनो
देवर जी ! मेरा कलेजा तभी ठंडा होगा जब तुम रावण की कन्या को लेकर आओगे और उससे
ब्याह करोगे ! बोलो मेरी इच्छा का पालन करोगे न ?
लक्ष्मण प्रणाम करते हैं। नर्तक दल आता है। इस बीच सीता
सहित सभी मिलकर लक्ष्मण का नारी के रूप में श्रृंगार करते हैं।
गीत (मूल गोंड़ी गीत)
हो... सोला हाथ के सारी, नागर पैटी के पैरी
देश भगन के तोड़र, गिलर गुलर चुटका
चकाली सार करधन, फुर्र हुर्र के जामा
चोली चारम चीरा, चारौं खूट मां
बरथैं हीस
झुमकी के झनकारा, रतन के पियारी
भौंर के जूरा, मांग के सेंदुर, आंखी के कजलबा
कान के कनियारी, मोंम के बिंदिया
मछेंव छतना तरकी, सेंमर फूल के फुदरा
अतना पहर ओढ़ के लछमन तैयार भै गै हो ........
नारी रूप में लक्ष्मण को देखकर सीता चकित रह जाती हैं। सीता
उन्हें जाने का इशारा करती हैं। लक्ष्मण प्रणाम करके चल देते हैं। रावण अपने
दरबारियों के साथ नृत्यात्मक ढंग से आता है।
प्रहरी लंका
गढ़ के राजा, महाराज रावण की
जय हो ! एक बहुत ही सुंदर जुवती आपकी सभा में आई है। आपसे मिलने।
रावण जुवती ? शीघ्र बुलाओ !
संगीत के ताल पर स्त्री-वेशी लक्ष्मण आते हैं। रावण उसके
सौंदर्य पर मोहित होता है।
कौन हो तुम सुंदरी ?
लक्ष्मण आपकी पुत्री।
रावण हमारी पुत्री ? तुम कब पैदा हो गई ?
लक्ष्मण बिसर
गए ? कामी पुरुष ! न जाने
कितनी स्त्रियों से तुमने सहवास किया होगा, कहां तक याद रख पाओगे ....
रावण बस
बस बस ! (प्रहरी से) सुनो प्रहरी ! ले जाओ इस युवती को ! राजकुमारी रानी फुफैया के
महल में पहुंचा दो !
प्रहरी जो
आज्ञा महाराज।
संगीत के ताल पर सभी जाते हैं। दूसरी तरफ से रानी फुफैया
अपनी सहेलियों के साथ आती है। प्रहरी के साथ लक्ष्मण आते हैं। लक्ष्मण रानी फुफैया
के सौंदर्य को अपलक देखते ही रह जाते हैं।
फुफैया कौन है ये प्रहरी ?
प्रहरी जानकर भी बता नहीं सकता। बस, महाराज की आज्ञा है कि ....
लक्ष्मण हम यहीं पर रहेंगे।
फुफैया अच्छा है ! तुम जैसी सुंदर सखी को पाकर मैं
प्रसन्न हुई !
लक्ष्मण (आगे आकर
अपने-आप से) जैसा भाभी मां ने कहा था, ये तो वैसी ही निकली ! सुनो मेरी सिंगियो ! जाओ ! फुफैया के
पेट में घुसकर अपना काम आरंभ कर दो !
फुफैया के पेट में दर्द होने लगता है।
फुफैया आह ! आह !
लक्ष्मण क्या हुआ रानी ?
फुफैया मेरे पेट में दर्द। अचानक, अभी-अभी।
सहेलियां एक के बाद एक .....
सहेली 1 हाय हाय ! रानी फुफैया के पेट में पीरा उठी है !
सहेली 2 पेट में पीरा !
सहेली 3 पेट में पीरा !
लक्ष्मण अरे क्या पीरा-पीरा लगा रखी हो ? मैं अभी ठीक किए देती हूं !
सहेली 1 रुक जाओ ! हमारे महल में राजवैद्यों की कमी नहीं है ...
सहेलियां हां... !
चार लूले-लंगड़े वैद्य पंक्तिबद्ध होकर आते हैं। इलाज करने
का अभिनय करते हैं। निराश चले जाते हैं।
वैद्य 1 मैं तो हार गया।
वैद्य 2 रोग ही बड़ा विचित्र है।
वैद्य 3 ठीक होने में समय लगेगा।
वैद्य 4 नई दवा बनानी पड़ेगी।
लक्ष्मण अरे
कब दवा बनाओगे, कब दवाई करोगे ?
चलो भागो ! सखी फुफैया, अब कहो तो मैं भी अपनी वैदी करूं ?
सहेलियां अभी भी पूछती है ? करो न !
लक्ष्मण तो फिर ये लो ! तनिक अपना हाथ तो देना !
आगे बढ़कर सलीके से फुफैया की हथेली को हाथ में लेते हैं।
आत्मिक आनंद का अनुभव करते हैं।
सहेलियां क्या हुआ ? हाथ ही पकड़े रहेगी कि कुछ करेगी भी ?
लक्ष्मण (फुफैया से) कैसा लग रहा है ?
फुफैया आधा दर्द चला गया।
सहेलियां आधा दर्द चला गया !
लक्ष्मण पूरा दर्द भी जाएगा सात समुद्रों में स्नान
करने से !
सहेलियां सात समुद्रों में स्नान करने से !
रावण दरबारियों सहित नृत्यात्मक गति से आता है।
रावण आज्ञा है।
रावण आदि उसी गति से जाते हैं। लक्ष्मण,
फुफैया और सहेलियां के
साथ नृत्य-ताल पर समुद्र तट पर पहुंचता है।
लक्ष्मण (स्वगत) रानी फुफैया को समुद्र तट पर तो ला
दिया हूं पर अब, इसके पहले कि ये
सब मुझे भी नहाने के लिए कहें, और मेरी असलियत
इन्हें पता चल जाए, मैं इन्हें
नन्हीं-नन्हीं पिल्लियां बना देता हूं !
नृत्य गति तेज होती है। नृत्य के बीच लक्ष्मण
मांत्रिक क्रिया करते हैं। फुफैया सहित सभी सहेलियां एक टोकरी में समा जाती हैं।
लक्ष्मण टोकरी को दूसरी टोकरी से ढंक देता है। टोकरी सिर पर रख लेता है।
बस ! मेरा काम हो गया, वापिस चला अजोद्ध्ा ! कहां है केवट ! वो रहा !
लक्ष्मण जाता है। दूसरी ओर से झिंझरी महल में
सीता परेशान हालत में।
सीता कितने दिन हो गए, देवर जी लौट कर नहीं आए ! मन व्याकुल है, न जाने उनका क्या हुआ होगा, चिंता है !
लक्ष्मण टोकनी सिर पर रखे आता है।
लक्ष्मण मैं
आ गया भाभी मां !
सीता ये
क्या ? कहा था रानी फुफैया को ले
आने को, ले आए हो टोकरी ?
लक्ष्मण लाया
हूं वही, कहा था जो तुमने। ये देखो
!
टोकरी उतारता है। जादू करता है। फुफैया समेत
सहेलियां प्रकट होती हैं।
सीता सचमुच
कितनी सुंदर है मेरी होने वाली देवरानी ! मेरा देवर तो जादूगर है ही, सुना है तुम भी जादूगरनी हो ! दिखाओ तो अपना
जादू ! मैंने कुछ कहा है तुमसे ! तुम कुछ बोलती क्यों नहीं ?
फुफैया पहले
ब्याह फिर जादू।
सीता नहीं।
पहले जादू फिर ब्याह।
फुफैया नहीं।
पहले ब्याह फिर जादू।
दोनों नहीं-नहीं कहते हुए झगड़ने लगती हैं।
अचानक ....
अच्छा तो ठीक है। तू देख ले पहले मेरा जादू ही
!
जादू का उपक्रम करती है और सहेलियों-समेत नागिन बन जाती है।
नृत्यात्मक गतियों के साथ सभी जाते हैं। परधान आता है।
परधान अरे किंदरा बाजा जब बजने लगे तो... आतिमा
झनझना उठे !
भाभी सीता के एक हठ से लछमन महराज की पूरी मेहनत बेकार हो
गई, रानी फुफैया नागिन बन,
पाताल चली गई। जय-जय सिया
राम ! अब सुनिए छठवां अध्याय ! बोलो गांड रामायनी की ! जय !
एक दिन महाराज राम को विचार आया कि लक्ष्मण महाराज के क्यों
न दो से चार हाथ कर दिया जाय। काहे कि काम उनको बहुत करना पड़ता है। सो वो गए
झिंझरी महल, सीता महारानी से
सलाह लेने। पर सीता महारानी ने वहां एक दूसरी ही बात कर दी। उन्होंने कहा कि राजा
वासुकि की पुत्री बीजुलदई, बहुत ही सुंदर और
गुणी है।क्यों न उसका ब्याह लक्ष्मण से करा दिया जाय ! रामचंद्र महाराज ने तुरंत
ही चिट्ठी लिख दी राजा वासुकि को। राजा वासुकि बहुत प्रसन्न हुए, बस एक शर्त रख दी कि लक्ष्मण महाराज पहले होंगे
लमसेना। लमसेना माने ? - घर जमाई। फिर वो
निर्णय लेंगे कि विवाह अपनी पुत्री का करेंगे या नहीं। और ऐसा ही हुआ।
(यहां पर पात्रों का अभिनय भी हो सकता है।)
लक्ष्मण महाराज राजा वासुकि के यहां रहने लगे। घर-खेत का
काम करते, जंगल काटते, खेत जोतते, बीज बोते, फसल काटते। ऐसा
करते-करते बारह बरस बीत गए। एक दिन राजा वासुकि को विचार आया और बोले - जाओ
लक्ष्मण महाराज, खेत में तिल्ली
बो आओ। लक्ष्मण महाराज बो आए। जब तिल्ली पक गई तो बोले जाकर बीन लाओ। भारी मन से
लक्ष्मण महाराज खेत में गए। एक-एक दाना बीनने लगे। मुट्ठी भर बीन पाए कि खीज उठे।
ब्याह-स्याह छोड़के घर भागने लगे। कि तभी ..... कि तभी बीजुलदई की सखियों ने कहा -
काहे नहीं फड़कियों और कबूतरों की मदद लेते ? लक्ष्मण महाराज ने ऐसा ही किया और पोटली लेकर वासुकि के
सामने धर दी। वासुकि खुश हुए फिर भी उन्होंने और परीक्षाएं लीं। अंत में बीजुलदई
को लक्ष्मण महाराज के साथ ब्याह दिया और बांस के पोर में पुत्री को बिठा कर विदा
कर दिया और बोले कि रास्ते में पोर को न खोलना ! पर लक्ष्मण महाराज बिना कर्म किए
कैसे रह सकते थे ?
लक्ष्मण भला ये क्या बात हुई कि
रस्ते में पोर को न खोलना ! खोल दूंगा तो ? क्या होगा ?
लक्ष्मण पोर के पास आते हैं। उसे खोलते हैं। उससे बीजलदई
प्रकाश रूप में निकलती है। बादलों में छुपती है। लक्ष्मण क्रोधित होकर तीरों की
वर्षा करने लगता है। बादल में बिजली कड़कती है।
गीत अब तो लछमन रे भैया
गुस्सा मा लाल पियर रंग भैगें
कैसना गलती भैस भैया
बीजुलदई धोखा दैके भग गैं
अब उठाए हैं धनुष बान दादा
तड़ा तड़, तड़ा तड़ मारन लगे हैं लछमन हो.....
दृश्य नेपथ्य में जाता है। परधान आता है।
परधान बीजलदई वापस नहीं आई। उसी दिन से लक्ष्मण
महाराज बादलों के दुश्मन हो गए और जैसे ही बादल दिखते हैं, लक्ष्मण बाण छोड़ने लगते हैं। उनके बाणों से बादल कड़कड़ाकर
पत्थर की तरह टूटकर बिखरने लगते हैं। कभी-कभी लक्ष्मण का तीर टकराकर नीचे गिर पड़ता
है, वही गाज कहलाता है।
अरे किंदरा बाजा जब बजने लगे हो...
इंद्रकामिनी, तिरिया फूल, मचलादई, रानी फुफैया और बीजुलदई की कामना क्या लक्ष्मण
ने की थी ? नहीं, बल्कि सीता ने की थी। सीता की इच्छा के लिए
लक्ष्मण महाराज ये सब करते हैं। लक्ष्मण को कभी भी विश्राम नहीं है। अगर विश्राम का
उद्यम भी करते हैं तो उन्हें स्वप्न का लोक सताने लगता है। अब सुनिए ! गोंड
रामायनी का सातवां और अंतिम अध्याय ! इसे तनिक ध्यान से सुनिएगा। क्योंकि इसमें
लक्ष्मण की असली परीक्षा है। उन्हें वह सब करना पड़ता है जो वो सपने में भी न करते
!
रामचंद्र महाराज की बहिन कारी अंजनी एक दिन अपनी भौजाई सीता
महारानी से मिलने आ जाती है। उसका आना, मानो एक बहुत बड़ी घटना का न्यौता आना !
सीता बहुत अच्छा किया जो तुम आ गईं। मेरी भी
तुमसे मिलने की बहुत इच्छा थी।
कारी अंजनी अच्छा भौजी ये तो बताओ, वो दुष्ट रावण दिखने में कैसा था ?
सीता दिखने में .....
कारी अंजनी ऐसे नहीं। चित्र बनाकर दिखाओ !
सीता चित्र ?
कारी अंजनी ये लो चावल का आटा। बनाओ तो !
सीता चित्र बनाने लगती है।
गीत दस मूंड़ और बीस तोंन हांथ रहैं बाई
पहाड़ सा हों डील डौल रहै बैया
खोंहरन साहीं कान के छेदा रहै बाई
सुरंग सांहीं नाक नथुना रहै वो
करिया पटपर साहीं कपार रहै बैया हो .....
सीता और कारी अंजनी बातों में मगन हैं। लक्ष्मण
की आवाज आती है।
लक्ष्मण भाभी पानी तो लाओ, हम शिकार लाए हैं !
दोनों नहीं सुनतीं।
भाभी ! पानी लाओ !
दोनों नहीं सुनतीं। लक्ष्मण आ जाता है। रावण का चित्र देखकर
आग बबूला हो जाता है।
भाभी ! तुम रावण को याद कर रही हो ? उस दुष्ट रावण को, जिसने तुम्हारा अपहरण किया था ?
लक्ष्मण रावण के चित्र को पैरों से रौंदता है।
चित्र से रावण प्रकट हो जाता है।
रावण हा
हा हा.... मेरे चित्र पर कैसी वीरता दिखा रहे हो लक्ष्मण ? मुझ पर दिखाओ तो जानूं !
लक्ष्मण की आंखें लाल। मल्ल युद्ध आरंभ। लक्ष्मण को हारते
देखकर सीता अंदर जाकर कृपाण लाती है और लक्ष्मण को देती है। रावण के रक्तबिंदुओं
से कई रावण उत्पन्न होते जाते हैं।
सीता लक्ष्मण ! इन सबको इस अंधे कुंए में डालते
जाओ !
लक्ष्मण सभी को मार-मार कर अंधे कुंए में डालता जाता है,
कुंए को ऊपर से बंद कर
देता है। लक्ष्मण लहू-लुहान हो जाता है। परधान आता है।
परधान रावण
के खून की जितनी बूंदें गिरतीं उतने ही रावण पैदा हो जाते। आज भी यही हो रहा है।
राम ने जब लक्ष्मण की बात सुनी तो उन्हें बड़ा क्रोध आया। लेकिन भाई का क्रोध शांत
करने के लिए वो उन्हें एक बगीचे में ले आए। तभी उन्हें एक आवाज सुनाई दी !
आवाज अरे
जा भाग जा ! मैं कोई राजा रामचंद्र नहीं हूं जो अपनी उस घरवाली को फिर से अपने घर
में रख लूं जो रावण के यहां लंका में रहकर आई हो ! चल भाग यहां से !
यह आवाज सुनकर दोनों आहत होते हैं।
राम लक्ष्मण
! मेरे प्यारे भाई ! लोग मेरी हंसी उड़ाते हैं। मेरी मर्यादा को ललकारते हैं। जाओ,
इसी समय सीता को जंगल में छोड़कर आओ ! उसके दो
टुकड़े कर दो !
लक्ष्मण अवाक रह जाते हैं।
लक्ष्मण यह क्या कह रहे हैं प्रभु ?
राम जाओ
लक्ष्मण, मेरी आज्ञा है !
परधान आगे-आगे
लछमन, तो पीछे-पीछे सीता
चलत-चलत पहुंच गए जंगल हो ....
ऊंची-नीची मेड़न को पार करते-करते
चलत-चलत दुपहर हो गई हो .....
लक्ष्मण भाभी, तुम यहीं छाए में
बैठो। हम अभी आते हैं।
सीता वहीं बैठ गईं। लक्ष्मण कहीं जाते हैं। सीता को नींद आ
जाती है।
परधान बहुत
दूर तक पैदल चलते-चलते सीता थक गई थी, सो गईं। लक्ष्मण कहीं जाकर पानी पिए, आकर देखा, सीता माता
थकी-हारी सो गई थीं। एक तरफ माता जैसी भाभी सीता, और वो भी गर्भवती, तो दूसरी तरफ बड़े भाई की आज्ञा ! कैसे करें हत्या दो-दो जीवों की! नहीं,
वो नहीं कर सकते ऐसा जघन्य पाप ! लेकिन बड़े भाई
को क्या प्रमाण देंगे ! लौट पड़े अयोद्ध्या की ओर ! रस्ते में बनवा लिए बढ़ई से दुई
हाथ ..... राम से मिलते ही दोनों भाई दहाड़ मार-मार के रोने लगे। इधर जंगल में सीता
की झपकी टूटी तो लछमन नहीं मिले। उठकर देख रही पहाड़ों में। बहते नदी-नालों में।
देवर जी कहीं नहीं दिखे ! रोते-रोते मुंह सूख गया। प्यास से गला सूख गया।
भटकते-भटकते मिल गए दो साधु !
साधु 1 इस वन में ये
बिटिया कहां से आ गई ?
साधु 2 अरे ! लगता है ये
तो महारानी सीता हैं !
साधु 1 सीता ? और इस गहन वन में ? हो ही नहीं सकता।
सीता सुनो
बाबा ! मैं अयोद्ध्या के राजा श्री रामचंद्र की पत्नी सीता हूं। मुझे मेरे पति ने
घर से निकाल दिया है। जंगल-जंगल भटक रही हूं।
साधु 1 यदि तुम वास्तव में सीता हो, तो प्रमाण दो ! अपने सत से अभी पानी बरसा दो !
बाढ़ ले आओ तो मानूं !
सीता हे
इंद्रदेव, हे पवन देव ! मेरी सहायता
करो भैया !
विपदा को दूर भगाओ, मुझे बचा लो देव !
हवा बहने लगती है। घनघोर बारिश होने लगती है। दोनों साधु
सीता के चरणों में गिर जाते हैं।
दोनों साधु सीता जी, हमारा कसूर माफ करो। पानी को बंद कराओ ! हम तुम्हारी शरण
में हैं !
सीता के आंख खोलते ही पानी बंद हो जाता है।
साधु 2 बेटी सीता ! तुम निर्भय होकर यहां रहो। इसे अपना ही घर
मानो।
परधान शंकर
झूले में झूल रही सीता रे भाई। दूनों बाबा उनकी सेवा करें भैया। सीता तो गर्भवती
थी ही। इस तरह नौ महीने पूरे हो गए। एक पुत्र हुआ। चंद्र के समान मधुर। कछरे के
बेल के समान कोमल ! एक दिन क्या हुआ कि जाने लगीं नदी कपड़े धोने।
सीता बाबा
! मैं नदी तट पर जा रही हूं कपड़े धोने। लव को यहां देखिएगा !
साधु हां
हां जा बेटी ! निसफिकिर रह !
सीता जाती है। दोनों साधु बच्चे को तनिक प्यार करते हैं।
उसके बाद सो जाते हैं। थोड़ी देर में सीता आती है।
सीता आ
जा आ जा ! भूख लगी होगी न ! आजा दूध पिला दूं !
बच्चे को उठाकर अंदर ले जाती है। साधु सो रहे
हैं। साधु जगते हैं।
साधु 1 अरे ! लव कहां
गया ?
साधु 2 क्या ? लव नहीं है ?
साधु 1 नहीं है यहां !
साधु 2 हे भोलेनाथ अब
क्या होगा !
साधु 1 एक उपाय है। इस
कुश से एक बालक बना देते हैं। ठीक वैसा ही।
साधु 2 हां ठीक रहेगा।
कुश से एक बालक बनाते हैं। उसमें प्राण फूंकते हैं। लिटा
देते हैं। तभी लव को लेकर सीता बाहर आती है। दोनों साधु हैरान। सीता भी दूसरे बालक
को देखकर हैरान।
साधु 1 गलती हो गई
बिटिया। हमने सोचा.....
साधु 2 तो क्या हुआ ! ये
बालक भी तुम्हारा है !
सीता (प्रसन्न
होकर) मैं दोनों को पालूंगी।
सभी खुशी-खुशी अंदर की ओर जाते हैं। परधान आता
है।
परधान दोनों
बालक बड़े हो गए, करने लगे शिकार।
पहुंच गए वो उसी जगह पर, जहां पे लक्ष्मण राम।
आए थे करने शिकार वो, देख के दो अद्भुत बालक।
चौंक गए, हैरान हो गए, वन में देख, दो ऐसे बालक।
पूछते हैं - कौन हो तुम ? कौन हैं तुम्हारे माता-पिता। बालक बताते हैं - हमारे पिता
का नाम है श्रीरामचंद्र और माता का नाम है सीता देवी। राम को भरोसा नहीं होता,
परंतु लक्ष्मण तो मुग्ध हो जाते हैं। राम लेते
हैं दोनों बालकों की परीक्षा। कहते हैं कि यदि तुम राम के पुत्र हो तो हमारा बाण
झेलो। राम बाण चलाते हैं। बाण बालकों का चुम्मा लेकर वापस लौट आता है। लव-कुश कहते
हैं अब हमारा बाण झेलो। बाण राम-लक्ष्मण के पैरों में गिरकर वापस लौट आता है। राम
दोनों बालकों को गोद में उठा लेते हैं और बालक उन्हें आश्रम में ले आते हैं। सीता,
राम को आश्रम आते देख धरती में समाने लगती
हैं।राम दौड़ते हैं उनकी चोटी हाथ में आती है। जैसे ही चोटी को धरती पर फेंकते हैं
वो नागिन बन जाती है। तब से सांप जंगल-जंगल घूमते हैं। चोटी छूट जाती है तो राम,
सीता की बांह पकड़ते हैं। राम, सीता को ऊपर खींचते हैं। राम और सीता की आंखों
से आंसू झरने लगते हैं। लक्ष्मण भी रो रहे हैं। साधु बाबा भी रो रहे हैं। सबको
आशीर्वाद देते हैं। सभी बदन महल को चल पड़ते हैं !
पहुंच गए हैं बदन महल, रामचंद्र सीता के संग।
साथ हैं लव-कुश, संग चल रहे हैं लक्ष्मण हो ......
बजने लगे नगाड़े हैं और ध्वज भी उड़न लगे हो ....
परधान जनजातियों का कालबोध व्यतीत होने के संदर्भ
में नहीं है। सबकुछ उनकी स्मृतियों के रूप में विद्यमान है। उन्हें कहीं उसे दर्ज
करने की जरूरत नहीं थी। हर समय के अनुभव का सत्य उनके लिए हमेशा मौजूद रहा। इस
प्रवृत्ति के कारण उनका कालबोध इस तरह से निर्मित हुआ कि उनके दादा-पुरखे हमेशा
उनके लिए उनके आसपास ही रहे। यही कारण है कि जनजातियां अपने देवलोक में अपने
पूर्वजों को रखती हैं। उनके देवता उनके पुरखे ही हैं किसी अन्य देवलोक से आए हुए
देवता नहीं।
आश्चर्य क्या यह नहीं है कि हमारे ही बीच की एक जनजाति
समुदाय ने कैसे इस सत्य को सदियों से संरक्षित किए हुए अब तक यात्रा की है। उनकी
कथा का नायक लक्ष्मण है, जो दूसरों की
इच्छा के लिए जीता है।
लक्ष्मण ने बिना बोले, बिना उपदेश दिए, अपने आचरण से जता दिया कि यदि हम इन सप्तचक्रों पर विजय कर लें तो हमें क्या
मिल जाएगा ? देवत्व। और जीवन
का उद्देश्य क्या है ? यही - देवत्व।
जीवन का अर्थ ही तो यही है न ! सात कामनाओं पर विजय की परीक्षा जो लक्ष्मण ने दी
है, वह एक मार्ग है देवत्व को
पाने का। हर लक्ष्मण जो सत्य की राह पर है, उसके मार्ग में ये सात कामनाएं बाधाएं उत्पन्न करती हैं। इन
कामनाओं से मुक्ति में ही जीवन की समग्रता का अनुभव है।
अरे लछमन महराज के नगरी में हो....
किंदरा बाजा बजने लगे ... हो...
किंदरा बाजा बजने लगे हो....
--इति--
नोट -
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