शनिवार, 3 अगस्त 2019

Rajkumar Bairagadhiya राजकुमार बैरागढ़िया


नाटक
राजकुमार बैरागढ़िया
मूल उपन्यास - राजा चक्रधर सिंह
नाट्य-रूपांतरण - योगेश त्रिपाठी
12/273, गांधीनगर उर्रहट, रीवा म.प्र.

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ गोँड राजवंश की यह एक कथा है, जिसे उपन्यास के रूप में राजा चक्रधर सिंह ने लिखा था। राजा चक्रधर सिंह का जन्म 19 अगस्त, 1905 में हुआ था, और मृत्यु 7 अक्तूबर 1947 में केवल 42 वर्ष की उम्र में ही हो गई थी। बैरागढ़िया राजकुमार नाम से यह पुस्तक सन 1932 में प्रकाशित हुई थी। इसी पुस्तक का नाट्य रूपांतरण यहाँ पर प्रस्तुत है, इसका पहला मंचन रामचंद्र सिंह के निर्देशन में दिनांक 20 जून 2019 को भोपाल के शहीद भवन में सम्पन्न हुआ। इस मंचन की सूत्रधार और परिकल्पक थीं सृष्टि गुप्ता जो स्वयं एक सिद्धहस्त कत्थक नृत्यांगना हैं।
पात्र
नट                    राजा चक्रधर सिंह
नटी                   रानी ईश्वरमती
कंदर्प                चांदा नरेश
मानसिंह            कंदर्प का दत्तक पुत्र
महारानी            कंदर्प की पत्नी
3 सखियां           राजकुमारी मृणालिनी की सखियां
कर्णमेघी शुक     मृणालिनी का पाला हुआ शुक
सुलोचना            मृणालिनी की सखी
राजकुमार          बैरागढ़ का राजकुमार- राजकुमार बैरागढ़िया
सोनकेसर           धुर्रापुर के महल में मिली हुई एक युवती
डूंड़ी                   धुर्रापुर की डूंड़ी राक्षसिन
महामंत्री              कंदर्प का मंत्री
महात्मा                एक महात्मा
महाराज               सुमेरुगढ़ का राजा
सैनिक                 सुमेरुगढ़ का एक सैनिक
महारानी              सुमेरुगढ़ की महारानी
प्रतापसिंह            चांदा नरेश का पुत्र
देव 1,2,3,4          राजकुमार बैरागढ़िया के रक्षक
मालिन                 लांजी राज्य में फूल पहुंचाने वाली बूढ़ी मालिन
सीमांतिनी             लांजी राज्य की राजकुमारी
पद्मावती               सीमांतिनी की सखी
चंपा                     नारी वेश में राजकुमार बैरागढ़िया
भूतनाथ                संगीताचार्य


नाटक
राजकुमार बैरागढ़िया
मूल उपन्यास - राजा चक्रधर सिंह
नाट्य-रूपांतरण - योगेश त्रिपाठी
12/273, गांधीनगर उर्रहट, रीवा म.प्र.

                                                                राजा चक्रधर सिंह (नट) और रानी (नटी) मंच पर आते हैं।
गीत         (नट) सौ बरस जीए जो मानुस, उसमें आधी रात है।
                                (नटी) आधे में बचपन-बुढ़ापे, का भी निष्क्रिय काल है।।
                                (नट) शेष जो मिलता है वो भी, है कुव्याधि से भरा। 
                                (नटी) जीना है जलफेन जैसा, बुलबुलों का जाल है।।
नट      मानुस की उमर अधिक से अधिक सौ बरस मानी गई है। उसमें आधा समय सोने में चला जाता है। बचे हुए आधे का आधा निकल जाता है लड़कपन और बुढ़ापे में।
नटी      बचता है एक चौथाई, तो वह कब गुजर जाता है किसको पता चलता है ?
नट       पेट-पूजा, घर-गृहस्थी के चक्कर में बुलबुले जैसा आता है, बुलबुले जैसा ही खो जाता है।
नटी      परंतु हे महाराज चक्रधर सिंह जी ! मैं चाहती हूं कि मैं और आप सदियों तक जिएं। इस धरती का आनंद लें, इसका सुख भोगें।
नट       संभव नहीं है महारानी ईश्वरीमती देवी ! जो आया है, जायेगा जरूर। हां इतना जरूर संभव है कि सदियों-सदियों तक लोग हमारा नाम लेते रहें, हमारी कहानी को याद रखें।
नटी      कौन-सी कहानी ?
नट    हमारी कहानी, हमारे पुरखों की कहानी, हमारे रीति-रिवाजों की कहानी, हमारे सुनहरे इतिहास की कहानी।
नटी      हुंह... हमारा सुनहरा इतिहास ! हमें न तो कोई बाल्मीकि मिला है जो हमारे पूर्वजों की रामायण लिखता और न ही कोई व्यास।
नट        महारानी ! हम तो हैं।
नटी       आप ? आप रामायण और महाभारत जैसा ग्रंथ लिख सकेंगे ?
नट      नहीं। संभव ही नहीं है। हर लेखनी पा नहीं सकती शक्ति बाल्मीकि की, हर मस्तिष्क पा नहीं सकता   स्मरण शक्ति व्यास की।
नटी      और न हर वंश में हुए हैं राम और कृष्ण जैसे महापुरुष।
नट       परंतु न जाने कितने राम और कृष्ण और भी हुए होंगे जिन्हें न तो वाल्मीकि मिले और न ही व्यास। खो गए अतीत में, सदा-सदा के लिए। रानी साहब, मेरे मन में आ रहा है कि यह काम हम करेंगे, अपने पूर्वजों के लिए।
नटी      अपने पूर्वज ?
नट      हां। मैं याद कर रहा हूं यशस्वी गोंड़वंश के राजकुमार बैरागढ़िया को जिनका एक वंशज मैं हूं, और क्यों न आप भी याद करिए यशस्वी गोंड़ राजकुमारी सीमांतिनी को, जिनकी वंशज आप हैं !
नटी      हां-हां क्यों नहीं। परंतु मुझे उनके बारे में थोड़ा-थोड़ा ही पता है। आप बताते जाना !
नट     तो चलिए, अपने ही सुख के लिए हम बनते हैं वाल्मीकि और व्यास, और रचते हैं एक नया ग्रंथ जिसमें यशगान हो अपने महान और समृद्ध गोंड़वंशी पूर्वजों का !
गीत     बहुत पुरानी बात है, मौखिक यह इतिहास है !
नट     उस समय गोंड़ों के तीन राज-घराने बड़े प्रसिद्ध थे - चांदा, बैरागढ़ और गढ़ा-मंडला। चांदा-साम्राज्य के महाराज थे - सूर्यवंशी राजा कंदर्प।
नटी     उनकी दो बहनें थीं - विमला और कमला।
नट      एक पुत्र था जो सुमेरुगढ़ में बंदी बन चुका था और जिसके वापस आने की कोई उम्मीद नहीं थी।
नटी    सुमेरुगढ़ में बंदी था और उसके आने की कोई उम्मीद नहीं थी। ये तो मुझे मालूम है, पर क्यों था बंदी,  यह तो बताइए ?
नट      समय आने पर, समय से पहले कुछ नहीं !
गीत     बहुत पुरानी बात है, मौखिक यह इतिहास है !
नट    विमला का ब्याह बैरागढ़ के राजा भुवनेश्वर के साथ हुआ और कमला का विवाह गढ़ा-मंडला के राजा हृदयशाह के साथ।
नटी     कमला और हृदयशाह को पुत्र हुआ मानसिंह, जिसे राजा कंदर्प ने गोद ले लिया। यानी अपने भांजे को।
नटी    इधर कमला और राजा भुवनेश्वर को भी कई यज्ञों के बाद एक पुत्र हुआ - राजकुमार बैरागढ़िया। यानी अपनी कथा के नायक। 
नटी     एक बात समझ में नहीं आई। उनका कोई और नाम भी तो होगा ?
नट     कोई नाम नहीं। रानी साहब, मैं यह कहानी गढ़ नहीं रहा हूं। बहुत छानबीन, ढेर सारी किंवदंतियों को जानने-सुनने के बाद बता रहा हूं। राजकुमार बैरागढ़िया का कोई दूसरा नाम मुझे आज तक नहीं मालूम हुआ।
नटी    चलिए ऐसा भी तो होता है कि कई बार, लोग उन्हीं नामों से प्रसिद्ध हो जाते हैं जिन नामों से लोग उन्हें पुकारते हैं।
नट      और भी सुनिए। राजकुमार बैरागढ़िया का जन्म शस्त्र सहित हुआ था।
नटी      माने ?
नट       (गान)  जब वो पैदा हुए तो हाथों में उनके शस्त्र था।
                                               राज्य भर में लोहे की बारिस हुई थी शाम से।
                                               एक घोड़ा भी हुआ पैदा, महल में उस घड़ी।
                       नाम रखा रक्तकर्ण, राजा ने बड़े प्यार से।
नटी   और कुछ समय बाद, चांदा नरेश कंदर्प के यहां भी एक पुत्री का जन्म हुआ।
नट    हां, ..... 
                                (गान)       जब वो पैदा हुई तो लोहे की वर्षा नहीं हुई।
                                                सोने की वर्षा हुई ! सोने की वर्षा हुई !
                                                पुत्री का नाम रखा - मृणालिनी !
नटी      तनिक सोचिए, एक राजकुमार का जन्म हुआ तो लोहे की वर्षा हुई। वहीं, दूसरे राज्य में                          राजकुमारी का जन्म हुआ तो सोने की वर्षा हुई। यही सब सोच-समझ कर एक दिन,
            बैरागढ़ के राजा भुवनेश्वर ने अपने साले चांदा-नरेश कंदर्प के पास जाकर दोनों के विवाह 
            का प्रस्ताव रख दिया।
नट              जिसे राजा कंदर्प ने सहर्ष मान भी लिया। परंतु .....
नटी             चांदा नरेश का भांजा मानसिंह जिसे उन्होंने गोद ले रखा था, नाराज हो गया।
नट              ना...रा...ज.... हो... गया.......
दोनों जाते हैं। राजा कंदर्प और मानसिंह आते हैं।
मानसिंह         महाराज, यह क्या सुन रहा हूं ? आपने राजकुमारी का ब्याह बैरागढ़िया राजकुमार से तय कर दिया है ? क्या यह बात सच है ?
कंदर्प               हां मानसिंह, यह बात सच है। क्या हुआ ? तुम्हें प्रसन्नता नहीं हुई ?
मानसिंह           महाराज, सच पूछिए तो मुझे इस पर आपत्ति है।
कंदर्प               क्यों ?
मानसिंह         क्योंकि .... राजकुमारी मृणालिनी से मैं ब्याह करना चाहता हूं। हमारे रीति-रिवाज के अनुसार मामा की पुत्री से ब्याह हो सकता है।
कंदर्प               अब कुछ नहीं हो सकता। मैं फलदान भी कर चुका हूं।
मानसिंह          हा हा हा ..... फलदान ! फल... दान ! वाह  ! फलदान कर दिया तो क्या पत्थर की लकीर खींच दी! महाराज, क्या आपको कोई नया समाचार नहीं प्राप्त हुआ ?
कंदर्प               नया समाचार ?
मानसिंह         हां, नया समाचार। मेरा नाम मानसिंह है और मैं राजकुमारी मृणालिनी से ब्याह करके इस पूरे राज्य का उत्तराधिकारी बनूंगा। यह मैंने पहले से ही ठान रखा था। भला मैं यह कैसे स्वीकार करता कि आप राजकुमारी का ब्याह किसी और से तय कर दें। इसीलिए महाराज भुवनेश्वर प्रताप सिंह जब फलदान करके लौट रहे थे तो मैंने उनसे कहा कि आप यह फलदान तोड़ दीजिए। वो नहीं माने। मैं क्या करता ? उनकी अस्वीकृति सुनकर लौट आता ? कायरों की तरह? नहीं महाराज, मैं मानसिंह हूं। चांदा का भावी नरेश। मैंने अपनी तलवार निकाली, और एक ही झटके में उनका सिर धड़ से अलग कर दिया !
कंदर्प                क्या ?
मानसिंह            विश्वास नहीं हुआ न ? जानता था। इसीलिए मैंने उनके सिर को न तो कहीं फेंका, न ही किसी     गड्ढे में गाड़ा, बल्कि रामसागर बंधा के बीचोंबीच खड़े स्तंभ में बांधकर लटका कर आया हूं ! 
कंदर्प                 मानसिंह !
मानसिंह           मेरे और राजकुमारी मृणालिनी के बीच जो भी आएगा, उसका यही हाल होगा, चाहे वह जो भी   हो।
                                                मानसिंह जाता है। कंदर्प चिंतित हो उठते हैं। महारानी आती है।
महारानी          यह मैं क्या सुन रही हूं महाराज ! मानसिंह ने महाराज भुवनेश्वर को मारा डाला !
कंदर्प              महारानी, वह मेरा दत्तक पुत्र है, इसलिए चुपचाप रहा। वरना उसे मैं तुरंत मृत्युदंड दे देता।
महारानी         अब मेरी पुत्री मृणालिनी का क्या होगा ? क्या उसके भाग्य में मानसिंह जैसा दुष्ट पुरुष ही लिखा है?
कंदर्प              ऐसा कदापि नहीं हो सकता। मैं अपनी बेटी को मानसिंह जैसे पापी से नहीं ब्याह सकता।
महारानी          तो आप क्या करेंगे ?
कंदर्प              मैं आज यह प्रण करता हूं कि जो भी हमारे महल के आंगन में रखे खरदे की छः चोट अपनी छाती में सह सकेगा, मृणालिनी को पाने का वही अधिकारी होगा !
महारानी           महाराज !
दोनों जाते हैं। संगीत के साथ राजकुमारी मृणालिनी सखियों सहित आती है। सखियां मृणालिनी का सौंदर्य-वर्णन करती हैं।
गीत          सखी 1  (गान)           उदधि मथ डाला था, देवों ने जिस खोज में।
                                                प्रकट सब वे तेरे हैं, रत्न आनन में रमे।।
                                                सुर-सुरभि श्वासों में हैं, रत्न आनन में रमें।
                                                अधरों में अमृत और देखो विष भरा है नेत्रों में।।
                                                                सखियां हंसती हैं।
                सखी 2  (गान)           अधरों बिच शारदा बसी है।
                                                श्रवणों में मणिकर्णिका लसी है।।
                                                शिर में सुषमा त्रिवेणिकी है।
                                                मृगनैनी यह तीर्थराज-सी है।।
                                                                सखियां हंसती हैं।
                सखी 3  (गान)           धिक-धिक कवित्व उस दुष्कवि का सदा है।
                                                जो बोलता सुमुखि आनन चंद्र-सा है।।
                                                जो भ्रू झुका, दृग नचा कर देखना है।
                                                सो कोप, शांति, हंसना उसमें कहां है।।
                                                                सखियां हंसती हैं। सखी 1 दूर देखती है ...
सखी 1         चलो चलो ! झटपट घर चलो कहीं हमारी इन चंद्रमा को ग्रसने कोई राहु न आ जाए !
सभी हंसते हुए जाती हैं। दूसरी ओर से मानसिंह आता है और वापस चला जाता है। मृणालिनी के पीछे-पीछे सुलोचना पिंजरे में तोता लेकर आती हैं। मृणालिनी उदास है।
सुलोचना      क्या बात है राजकुमारी जी ! आप कुछ उदास हैं ?
मृणालिनी     मैं ? नहीं तो। तुम जाओ !
                                                दासी जाती है। शुक निकलता है।
शुक         झुट्ठी !
मृणालिनी     नहीं तो।
शुक         बताओ ! मुझे तो बताओ !
मृणालिनी     क्या बताऊं ?
शुक         तुम उदास क्यों हो ?
मृणालिनी     पता नहीं, मेरा ब्याह किससे होगा ?
शुक         उसी से होगा, जो महाराज के खरदे की मार सह सकेगा !
मृणालिनी     यानी किसी पहलवान से ?
शुक         पहलवान हो या न हो, लेकिन कोई राजकुमार तो जरूर होगा।
मृणालिनी     नहीं। मैं किसी साधारण राजकुमार से ब्याह नहीं करना चाहती। वो तो ... वो तो ... बस....
                (गान)    दीनों का कल्पशाखी, गुणफल नत हो बंधु हो, सज्जनों का।
                                आदर्शी शिक्षितों का, चरित निकष हो, सिंधु हो सद्गुणों का।।
                                सत्कर्ता न घमंडी, पुरुष गुण-निधि, जो धनी हो प्रणों का।
                                जीना उसका सही है, नतु जनम वृथा श्वासधारी जनों का।।
शुक         हूं..... तो तुम्हारा मतलब है कि वह बहुत ही विनम्र हो। सद्गुणी हो ! वीर हो परंतु घमंडी न हो ! ऐसा तो संसार में एक ही है।
मृणालिनी     कौन ? कौन है वो ?
शुक               बैरागढ़ राज्य के राजकुमार ! जिन्हें सब प्यार से राजकुमार बैरागढ़िया कहते हैं !
मृणालिनी     राजकुमार बैरागढ़िया !
शुक         हां हां, उन्हीं के साथ तो तुम्हारा विवाह तय करने के लिए बैरागढ़ के महाराज स्वयं यहां आए थे।
मृणालिनी     अच्छा ? मैं इतनी भाग्यशाली हूं ?
शुक         हां। परंतु, महाराज जब फलदान कराकर लौट रहे थे तो दुष्ट मानसिंह ने उनकी गला काट कर हत्या कर डाली थी।
मृणालिनी     क्या ! यह मानसिंह मेरे भाग्य में कब तक राहु बनकर रहेगा !
                                                                मृणालिनी सदमें में आ जाती है।
शुक         राजकुमारी, शोक मत करो। तुम्हारा ब्याह राजकुमार बैरागढ़िया से ही होगा।
मृणालिनी     असंभव है शुक। भला ऐसा होने पर भी वो कभी मुझसे ब्याह करना चाहेंगे ?
शुक               हां। चाहेंगे। परंतु तुम्हें कुछ करना पड़ेगा।
मृणालिनी     क्या ?
शुक                तुम अपने मन का हाल उन्हें बता दो, फिर देखो, वो क्या करते हैं।
मृणालिनी    लेकिन कैसे ? कैसे मैं उन्हें बताऊं कि अपने पति के रूप में मैं सिर्फ उनको स्वीकार कर सकती हूं किसी और को नहीं ?
शुक               तुम एक चिट्ठी लिखो, मैं उसे राजकुमार तक पहुंचा दूंगा।
मृणालिनी    सच ! तुम पहुंचा दोगे ? ओह मेरे मिट्ठू तुम कितने प्यारे हो ! मैं आज रात में लिखूंगी, और....
शुक         कल सुबह तक मैं पहुंचा दूंगा। ओह... मुझे कितनी भूख लगी है ! अगर मैं भोजन नहीं करूंगा तो कल इतनी दूर कैसे जाऊंगा !
मृणालिनी     (पुकारती है।) अरे सुलोचना !
                                                                सुलोचना आती है।
                         मिट्ठू को ले जाओ। और इसे भरपेट भोजन कराओ !
सुलोचना      जी राजकुमारी।
                                                                सुलोचना, पिंजरा सहित मिट्ठू को अंदर ले जाती है।
मृणालिनी    ओह राजकुमार ! मैं कैसे आपको पत्र लिखूं ! मुझे कुछ नहीं पता। पता है तो बस इतना ही .....
                (गान)   जैसे ब्रह्म मुनि स्मरैं, सितगरुत का मानसवान हैं।
                                रेवा को युत शाल कानन यथा देते करी मान हैं।।
                                तेरी दर्शन लालसा धर, तथा तेरा मुझे ध्यान है।
                                होगा संगम कौन-से दिन यही, चिंता मराप्राण है।।
अंधकार. पुनः प्रकाश। राजकुमार बैरागढ़िया, साथियों सहित शस्त्राभ्यास कर रहा है। शुक, जिसके गले में पत्र बंधा है आता है। राजकुमार का ध्यान आकर्षित करने के लिए, कभी इस तरफ तो कभी उस तरफ जाता है। राजकुमार शुक को देखकर चकित होता है, शस्त्राभ्यास रोककर साथियों को जाने का संकेत देता है। साथी जाते हैं। राजकुमार शुक को अपने पास बुलाता है।
राजकुमार   इधर आओ ! क्या बात है ? इतने बाग-बगीचे हैं यहां, वहां न जाकर तुम यहां आए हो ?ये क्या है ? चिट्ठी ? (खोलता है।) मेरे लिए ? क्या किसी का संदेशा लाए हो ?
           राजकुमार चिट्ठी पढ़ने लगता है। शुक उड़ जाता है।
गीत                               जैसे ब्रह्म मुनि स्मरैं, सितगरुत का मानसवान हैं।
                                                रेवा को युत शाल कानन यथा देते करी मान हैं।।
                                                तेरी दर्शन लालसा धर, तथा तेरा मुझे ध्यान है।
                                                होगा संगम कौन-से दिन यही, चिंता मराप्राण है।।
राजकुमार     ओह राजकुमारी मृणालिनी ! ..... मैं आऊंगा। राजकुमारी ! मैं आऊंगा... तुम्हारा वरण करूंगा, साथ ही अपने पिता की हत्या का बदला भी लूंगा।
                                                राजकुमार जाता है। नट-नटी आते हैं।
नट    (गान)  चल पड़े कुमार अपने रक्तकर्ण पर सवार होकर
अकेले ही, चांदा राज्य के अति कठिन मार्ग पर
मार्ग चुना वो उनने जो था सबसे छोटा
परंतु था बहुत अनगिनत बाधाओं से भरा
नदी मिली, नदी में मगर मिला
वन मिला, वन में बाघ मिला
झुरमुट मिला, झुरमुट में विशाल अजगर
आगे मैदान में एक वनभैंसा भी मिला
निपटाकर इन सब को जब कुमार कुछ आगे बढ़े
वनवासी मिले तभी क्रूर, आंखों में खून की प्यास लिए
चढ़ाने लगे उनकी बलि, रख गर्दन पर कटार
परंतु रक्षक देव उनके, सदा की तरह रक्षा किए
साहस था उनका और कृपा थी उनके देवों की
कवच बन रक्षा करते सदैव, राजकुमार बैरागढ़िया की।।
नटी   फिर क्या हुआ ? चांदा नगर पहुंचे वो ?
नट    हा हा हा.... अभी तो चांदा नगर दूर था। मिला एक दूसरा नगर, धुर्रापुर जिसका नाम था। पूरा नगर सूनसान, एक राजप्रासाद दिखा, वह भी सूनसान ! वो प्रवेश कर गए।
नट-नटी जाते हैं। राजकुमार आता है, मानो सूने राजप्रासाद को देखकर चकित हो रहा हो।
राजकुमार     कमाल है ! पूरा नगर सूना ! और ये महल भी ! कोई है ? है कोई ?
                                     रमणी सोनकेसर बाबी आती है।
                         लगता है इस महल की राजकुमारी हैं ! अभिवादन स्वीकार करिए !
सोनकेसर     अहोभाग्य ! कोई जीवित तो दिखा ! आपका स्वागत है ! लगता है कहीं के                       राजकुमार हैं!
राजकुमार     जी हां। बैरागढ़ का। परंतु ये सब क्या है ? पूरा नगर और ये राजमहल इतना वीरान क्यों?
सोनकेसर     डूंडी राक्षसिन के कारण।
राजकुमार     डूंडी राक्षसिन ?
सोनकेसर     हां। कुछ ही साल पहले, मेरे पिता अपने परिवार के साथ इसी मार्ग से गुजर रहे थे। उसने सबको खा डाला, लेकिन मुझे छोड़ दिया। वो मुझे अपनी बेटी मानने लगी। कुमार, तुम छुप जाओ। वो आती ही होगी। अगर उसे पता चला तो वह तुम्हें भी खा जाएगी। (अट्टहास सुनाई देता है।) वो देखो ! वो आ रही है ! तुम्हें कहां छुपाऊं... चलो तुम्हें मक्खी बना देती हूं ! मुझे क्षमा करना !
सोनकेसर मांत्रिक क्रिया करती है। राजकुमार मक्खी बन जाता है। डूंडी राक्षसिन अट्टहास करती आती है।
डूंडी                    कहीं कोई नहीं मिला। शायद अब कोई बचा ही नहीं। मैं अब क्या खाऊंगी, किसे                   खाऊंगी ! 
सोनकेसर     मुझे ही खा जाओ ! कम से कम मैं मरकर तो आजाद हो जाऊंगी !
डूंडी          अरे तुझे कैसे खा जाऊं रे ! बेटी बनाया है तुझको ! ऐसा फिर कभी मत कहना ! ...... अरे ! (सूंघती है।) मानुस-गंध ! कोई आया है यहां ? क्या कोई आया है ? बोल ? कौन आया है ? बोल मेरी बेटी, मुझे बहुत जोरों की भूख लगी है ! कमजोरी भी लगने लगी ... जल्दी बता, वरना मुझे थकान के कारण नींद आ जाएगी ! आ..... (जुम्हाई लेती है।)आ आ...... (जैसे उसके मुंह में कुछ चला गया हो।)
सोनकेसर     क्या हुआ ?
डूंडी               लगता है मुंह में कोई मक्खी चली गई है ! आह आह ......
डूंडी राक्षसिन ऐसे तड़पने लगती है जैसे अंदर ही अंदर उसे कोई मार रहा हो। उसकी तड़पन को देखकर राजकुमारी खुश होने लगती है। तभी .....
सोनकेसर     ये अच्छा मौका है। राजकुमार ! मैं तुम्हें अब मक्खी से फिर से मनुष्य बनाती हूं !
सोनकेसर मांत्रिक क्रिया करती है। डूंडी ऐसे तड़पती है जैसे उसका पेट फटने वाला हो ! अंततः वह मर जाती है, राजकुमार बाहर आता है।
राजकुमार ! मेरा नाम सोनकेसर बाबी है। अब से मैं आपकी दासी हुई। आपने मुझे नया जीवन दिया है। आपसे विनती है कि मुझे स्वीकार करें !
राजकुमार     नहीं।
सोनकेसर     तो फिर अभी इसी समय, मेरी आकांक्षाओं के साथ मेरा भी गला घोंट दीजिए। मैं तो मृत समान पहले ही थी। आपने मुझे क्यों नया जीवन दिया ? मार डालिए मुझे। आपके हाथों मृत्यु भी मिली तो मेरा जीवन सार्थक हो जाएगा। राजकुमार तलवार चलाइए !
राजकुमार     उठो सोनकेसर। मैं तुम्हें स्वीकार करता हूं। 
सोनकेसर      अग्नि प्रज्वलित कर देती है। राजकुमार सोनकेसर की चुनरी को अपनी कटार से बांधता है। सात फेरे लेता है। देव आशीर्वाद देकर जाते हैं। राजकुमार और सोनकेसर प्रणय-नृत्य करते हैं। प्रणय-नृत्य के अंत पर राजकुमार, सोनकेसर से विदा होता है। सोनकेसर बिछोह का दर्द लिए अंदर जाती है। नट और नटी आते हैं।
नट                    सोनकेसर को वहीं छोड़कर राजकुमार चल दिए चांदा राज्य की ओर।
नटी                   अच्छा। मैंने तो सोचा कि वो भूल ही गए होंगे कि उन्हें जाना कहां था।
नट                    रानी साहब, सच्चे प्रेमी कभी भूला नहीं करते।
नटी                   अच्छा, तो ये सब क्या था ? ..... चलिए माफ किया। आगे बताइए।
नट          ह ह ह .... तो जहां उनकी प्रियतमा राजकुमारी मृणालिनी इंतजार कर रही थी, राजकुमार चल दिए। चांदा राज्य पहुंचकर उन्हांने पड़ाव डाला राज्य के बाहर बड़े ही सुंदर रामसागर बंधा के किनारे।
नटी                   राजकुमारी को पता चला ?
नट                    हां।
नटी                   किससे ?
नट          उसी परम प्रिय तोते से। राजकुमारी अपनी सखियों के साथ आती है मिलने, कि तभी लग जाता है पता मानसिंह को भी, और वो आ धमकता है। राजकुमार इस पल का इंतजार कर ही रहा था। भयंकर युद्ध होता है और राजकुमार उसका सिर काटकर चल देते हैं चांदा राजमहल की ओर !
नट-नटी जाते हैं। दूसरी ओर से राजा कंदर्प और अन्य मंत्री आते हैं।
कंदर्प        समझ में नहीं आता कि राजकुमारी मृणालिनी के लिए सुयोग्य वर कहां मिलेगा ! मेरे प्रण के मुताबिक कोई भी राजपुरुष, खरदे की मार का सामना ही नहीं कर पा रहा है। उत्तीर्ण तो क्या, वह परीक्षा देने को ही तैयार नहीं हो रहा है ! कहीं ऐसा न हो, कि मुझे प्रण तोड़कर मानसिंह से ही अपनी पुत्री का ब्याह कराना पड़े।
                                                                राजकुमार, मानसिंह के कटे सिर को लिए आता है।
राजकुमार     चांदा नरेश महाराज कंदर्प की जय हो !
कंदर्प                  कौन हो तुम ? और ये सब क्या है ?
राजकुमार     क्षमा चाहता हूं महाराज ! मैं बैरागढ़ नरेश स्वर्गीय महाराज भुवनेश्वर प्रताप सिंह का पुत्र हूं ! मैं राजकुमारी मृणालिनी के साथ विवाह करने के लिए यहां आया हूं।
कंदर्प                  और ये तुम्हारे हाथ में.... किसका सिर है ?
राजकुमार     राजकुमार मानसिंह का।
कंदर्प                  क्या ?
राजकुमार     इसने मुझे मारने की कोशिश की। महाराज, मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है, कि मैंने इसे मारकर अपने स्वर्गीय पिता की हत्या का बदला लिया है। अब आप चाहे जो दंड दें मुझे।
कंदर्प        मैं लज्जित हूं राजकुमार। आपके स्वर्गीय पिता महाराज की हत्या के लिए भी, और आप पर इस प्राणघातक आक्रमण के लिए भी। (महामंत्री से) महामंत्री जी !
महामंत्री          आज्ञा महाराज।
कंदर्प                  राजकुमार मानसिंह के अंतिम संस्कार की व्यवस्था की जाय !
महामंत्री         जो आज्ञा महाराज !
एक सैनिक थाल लेकर आता है, राजकुमार मानसिंह के विच्छेदित सिर को उस पर रखता है। सैनिक थाल लेकर जाता है।
कंदर्प        राजकुमार ! आप हमारे अतिथि हैं, परंतु मृणालिनी का वरण करने के लिए आपको भी परीक्षा से गुजरना होगा। यदि आप उसमें सफल होते हैं तभी मृणालिनी का वरण कर सकते हैं।
राजकुमार     ऐसा ही होगा महाराज।
कंदर्प             महामंत्री जी, हमारे प्रिय अतिथि को अतिथि गृह में ठहराने की उचित व्यवस्था कराइए।
महामंत्री       आइए राजकुमार।
महामंत्री के साथ राजकुमार जाता है। अन्य दरबारी भी जाते हैं। महारानी आती हैं।
महारानी      महाराज ! ये सब क्या हो गया !
कंदर्प        महारानी, दंड मिला है मानसिंह को, उसके पापों का। इसमें शोक के लिए कोई स्थान नहीं है।
महारानी      फिर भी वह हमारा पुत्र था।
कंदर्प        कैसा पुत्र महारानी ? मानसिंह के कारण हमने न जाने कितने तनाव झेले। वह धन-संपदा का लालची था, नारी-तन का लोलुप था। उसमें न तो चरित्र था, न ही संयम। और जानती हैं आप ? मानसिंह चांदा राज्य पाने की लालच में मृणालिनी से ब्याह करना चाहता था। सच पूछिए तो वह अभी से हमारे ऊपर इतना दबाव बना चुका था, कि बैरागढ़ नरेश भुवनेश्वर की हत्या करने के बाद भी हम उसे कोई दंड नहीं दे सके। मान लीजिए, ईश्वर की कृपा से यदि कभी हमारा पुत्र वापस आया, तो क्या यह उसे जीवित रहने देता ! ईश्वर ने जो किया ठीक किया।
दोनों जाते हैं। नगाड़े बजते हैं।
सैनिक       सावधान ! चांदा नरेश महाराज कंदर्पसिंह पधार रहे हैं !
कंदर्प और महारानी, राजकुमारी आदि के सामने दूसरी ओर से राजकुमार बैरागढ़िया आता है।
कंदर्प        खरदा लाया जाय !
अनेक व्यक्ति एक विशाल खर्दे को बमुश्किल उठाकर लाते हैं। भूमि पर रखकर पसीना पोंछते हैं।  
राजकुमार बैरागढ़िया ! ये है हमारा वेदमंछा खरदा। न जाने कितने शूरवीर राजकुमार, इस खरदे को देखकर भागने लगे थे, आज वो सब हमारे बंदीगृह में हैं। तैयार हो इस खरदे की मार सहने के लिए ?
राजकुमार     हां महाराज ! मैं तैयार हूं !
राजकुमार मन ही मन अपने देवों का आह्वान करता है। चार देव आते हैं, राजकुमार के चारों ओर कवच बन जाते हैं।
                        आरंभ करिए महाराज !
कंदर्प उठता है। खरदे को अकेले उठाता है। महारानी ईश्वर का स्मरण करती हैं। कंदर्प खरदे को चारों ओर घुमाकर उसमें वेग उत्पन्न करता है, और दौड़ लगाकर राजकुमार की छाती पर मारता है। राजकुमार झटका खाता है, परंतु देवों की सहायता से सह लेता है। सभी के चेहरों पर आश्चर्यमिश्रित हर्ष। इसी तरह से कंदर्प कुल पांच बार करता है। राजकुमार सारे वार झेल लेता है। कंदर्प कुछ सोच कर, खरदे को भूमि पर रख देता है।
                          क्या हुआ महाराज ! अभी तो एक वार शेष है ! करिए एक वार और !
कंदर्प        नहीं राजकुमार। मैं समझ गया कि तुम वास्तव में एक बलशाली और पराक्रमी पुरुष हो। मुझे प्रसन्नता हुई तुम्हें पाकर। परंतु....
राजकुमार     परंतु क्या महाराज ?
कंदर्प        क्या यह उचित होगा, कि मैं इधर अपनी पुत्री का स्वयंवर रचा रहा हूं और उधर मेरा पुत्र, इस चांदा राज्य का उत्तराधिकारी, सुमेरुगढ़ में बंदी रहे ?
राजकुमार     सुमेरुगढ़ में बंदी ?
कंदर्प       हां राजकुमार। यहां से सौ कोस की दूरी पर विशाल सुमेरुगढ़ राज्य है। वहां पर महाराज रमेशचंद्र सिंह अपनी बेटी त्रिलोका देवी का विवाह करना चाहते हैं। उन्होंने प्रतिज्ञा कर रखी है कि जो राजकुमार उनके आंगन में रखे विशाल खरदे को भूमि पर गाड़ देगा, वही उनकी पुत्री से विवाह कर सकेगा। राजकुमार, पता चला है कि वह खरदा इतना बड़ा है मानो संसार भर का लोहा उसमें भरा हो। इंद्र का वज्र भी उस पर पड़े तो ठोकर खाकर उल्टा ही लौटेगा। परंतु त्रिलोका देवी के सौंदर्य पर मोहित होकर मेरे पुत्र जैसे न जाने कितने राजकुमार अपने प्रयत्न में विफल होकर वहां बंदी पड़े हैं। इसीलिए मैंने अपनी पुत्री के विवाह के लिए खरदे की मार सहने की शक्ति की प्रतियोगिता रखी है। आपसे एक विनती है राजकुमार !
राजकुमार     विनती नहीं महाराज, आदेश करिए। मैं आपके पुत्र के समान हूं।
कंदर्प                 राजकुमार, तुम्हारा बहुत उपकार होगा मेरे ऊपर, यदि तुम मेरे पुत्र प्रतापसिंह को मुक्त करा लाओ ! मात्र तुम हो, जो यह काम कर सकते हो।
राजकुमार     परंतु महाराज, आप तो स्वयं अत्यंत बलशाली हैं। भला आपको किसी और की क्या आवश्यकता है ?
कंदर्प        नहीं राजकुमार। मुझमें बल तो है परंतु अब साहस नहीं है। बूढ़ा हो गया हूं। और ऐसे काम में बल से अधिक साहस की जरूरत होती है। तुममें साहस भी है, बल भी है। यही नहीं, तुममें वो सारी योग्यताएं हैं, जो एक उत्तम पुरुष में होनी चाहिए। क्या तुम मेरा यह काम कर सकते हो ? इस बूढ़े बाप पर तुम्हारी अति कृपा होगी, मना मत करना।
राजकुमार     महाराज, मैं आपकी आज्ञा का पालन करने के लिए तैयार हूं !
राजकुमार चला जाता है। अन्य भी जाते हैं। नर्तक आते हैं, शिव की आराधना करते हैं।
गीत             अहो नंदी, पाटी, अजिन, फरसा, भस्म जलती।
                                ओ कपाली ये सामग्री तब किसे न खलती।।
                                भ्रू से ही सुरगण तुम्हारी लहैं ऋद्धि फलती।
                                निजात्मारामी को विषय मृगतृष्णा न छलती।।

                                भू ये ढगमग पदाघातों से बनी ज्यों नट बटा।
                                रुग्ण ग्रह गण भुजाओं से कई बार सिमटा।।
                                कंपकंपाता है सकल ये स्वर्ग झूमी घन जटा।
                                नृत्य किस विधि है रचा जगद्रक्षा वाला, उलटा।।
इसी बीच राजकुमार आता है। भगवान शिव को प्रणाम करता है। एक महात्मा प्रकट होते हैं।
महात्मा      राजकुमार, शिव तुम पर बहुत प्रसन्न हैं। मैं तुम्हारा भविष्य देख रहा हूं। मुझे साफ दिखाई दे रहा है कि तुम कई बड़े काम करने के बाद, वृद्ध हो जाने पर वन में आकर सन्यास ग्रहण करोगे।
महात्मा अंतर्धान होते हैं। राजकुमार प्रणाम करके चल देता है। नया दृश्य - प्रतापसिंह सींखचों मे कैद है और राजकुमारी अपनी सखियों सहित उसके प्रति मोह का प्रदर्शन कर रही है।
गीत             धन्य हो मेरे देवता तुम, मेरे प्राणाधार हो।
                                दूर तक नहीं कोई आशा, फिर भी मेरी आस हो।।
                                               राजकुमार बैरागढ़िया छुपकर राजकुमारी के मन के भाव को समझता है।
                                कब मिलन होगा हमारा, कह सको तो कह दो तुम।
                                मैं तकूंगी राह तब तक, जब तलक नहीं पास हो।।
                                धन्य हो मेरे देवता तुम .....
सभी जाते हैं। सुमेरुगढ़ का दरबार लगा है। राजकुमार बैरागढ़िया आता है।
राजकुमार     सुमेरुगढ़ महाराज की जय हो !
महाराज      कौन हो तुम युवक ?
राजकुमार     महाराज, मैं बैरागढ़ का राजकुमार हूं और राजकुमारी त्रिलोकादेवी के विवाह के लिए जो दांव आपने रखा है, उसे पूरा करने आया हूं।
महाराज                 सुना तो तुम्हारे बारे में बहुत है, परंतु क्या तुम्हें यह पता है कि यदि तुमने दांव को पूरा नहीं किया, तो दूसरे कई राजकुमारों के साथ-साथ तुम्हें भी बंदी बना लिया जाएगा ? वो भी पूरे जीवन के लिए ?
राजकुमार     मुझे अच्छी तरह पता है महाराज। परंतु आपको एक वचन देना होगा। यदि मैं प्रतियोगिता में सफल हो गया तो उसे आप पूरा करेंगे।
महाराज      वचन देता हूं।
राजकुमार     तो फिर प्रतियोगिता आरंभ करें।
महाराज      खरदा मंगवाया जाय !!
राजकुमार के चारों ओर देव कवच बनते हुए आ जाते हैं। कई लोग मिलकर विशाल खरदा लाते हैं। भूमि पर रखते हैं। महाराज, राजकुमार को संकेत करके खरदे को उठाने के लिए कहता है। राजकुमार उठाता है और चारों ओर घुमा कर इस तरह से फेंकता है कि भूकंप जैसा आ जाता है। सैनिक आता है।
सैनिक       महाराज महाराज ! खरदा आंगन की भूमि में पूरा का पूरा गड़ गया। मानो धरती फट गई हो। उसका ओर-छोर कुछ नहीं दिख रहा है महाराज !
                                               सब प्रसन्न होते हैं। राजकुमार बैरागढ़िया की जयकार होने                                    लगती है।
महाराज      आज मैं बहुत प्रसन्न हूं। मेरी प्रतिज्ञा पूरा करने वाला एक सुयोग्य राजकुमार मिला। बोलो अब तुम क्या चाहते हो ? तुमने कहा था कोई शर्त तुम्हारी भी है ?
राजकुमार     हां महाराज। प्रसन्नता इस के अवसर पर सभी को प्रसन्न होना चाहिए। मेरी विनती है कि सभी बंदी राजकुमारों को मुक्त कर दिया जाय !
महाराज      अवश्य। समस्त बंदी राजकुमारों को मुक्त कर दिया जाय !
                                                                प्रतापसिंह आता है।
राजकुमार     आइए राजकुमार प्रतापसिंह !
महाराज      बाकी सब कहां गए !
सैनिक       बाकी सब मुक्त होते ही भाग गए महाराज !
महाराज      ये भी अच्छा ही हुआ। मेरी आज्ञा है कि राजकुमारी को वरमाल के लिए बुलाया जाय!
                                                                राजकुमारी वरमाल लिए आती है। खड़ी हो जाती है।
                         आगे बढ़ो राजकुमारी, बैरागढ़िया राजकुमार के गले में वरमाल डालो !
राजकुमार   रुकिए महाराज। महाराज, आपको जानकर अति प्रसन्नता होगी, कि आपकी सुपुत्री राजकुमारी चांदा राजकुमार प्रतापसिंह से प्रेम करती हैं।
महाराज      क्या ? परंतु उसका विवाह तो अब तुम्हारे साथ होगा, क्यांकि मेरी प्रतिज्ञा को तुमने पूर्ण किया है, चांदा राजकुमार ने तो नहीं।
राजकुमार     आपने वचन दिया था महाराज कि जो मैं मांगूगा, आप मना नहीं करेंगे।
महाराज      राजकुमारी ! क्या तुम चांदा राजकुमार प्रतापसिंह से प्रेम करती हो ?
राजकुमारी    जी हां महाराज।
महाराज      और तुम राजकुमार प्रतापसिंह ?
प्रतापसिंह     मैं भी महाराज। राजकुमारी को कभी रंचमात्र भी कष्ट नहीं होने दूंगा।
महाराज            मेरी पुत्री को मनचाहा वर मिले, इससे अधिक और क्या चाहिए ! मेरा आशीर्वाद है तुम दोनों को !
राजकुमारी, प्रतापसिंह के गले में वरमाल डालती है। लोग हर्षित होते हैं। कलाकार नृत्य करते हैं। इस बीच महाराज आदि चले जाते हैं। नृत्य के अंतिम चरण में चांदा नरेश, महारानी, मृणालिनी आदि आते हैं और प्रतापसिंह, त्रिलोका देवी और राजकुमार बैरागढ़िया का स्वागत करते हैं। कंदर्प और महारानी अपने पुत्र के गले लगते हैं।
कंदर्प        मैं आभारी हूं राजकुमार तुमने पिता और पुत्र को मिला दिया, मां और पुत्र को मिला दिया। बहन और भाई को मिला दिया। एक असंभव कार्य तुमने कर दिखाया। बोलो तुम्हें क्या चाहिए ?
राजकुमार     महाराज, मुझे और कुछ नहीं चाहिए। बस, आगे का कार्यक्रम संपन्न हो !
कंदर्प        ओ हां ! मैं तो हर्ष के कारण भूल ही गया था। लाओ ! खरदा का एक वार राजकुमार को झेलना अभी बाकी है।
महारानी       अरे अब छोड़िए भी। राजकुमार की असली परीक्षा तो हो गई ! अब आगे और क्यों ?
राजकुमार   नहीं माता, महाराज सही कर रहे हैं। अपने प्रण को पूरा करना उनका दायित्व है। महाराज, मैं तैयार हूं।
                                                                कई लोग मिलकर खरदे को ले आते हैं।
कंदर्प        मुझे विश्वास है राजकुमार, जिस तरह से तुमने पिछले पांच वार बड़े आराम से सह लिए थे, उसी तरह इस अंतिम वार को भी सह लोगे। मेरा आशीर्वाद है तुम्हें।
राजकुमार     आभारी हूं महाराज।
कंदर्प               तैयार हो जाओ !
राजकुमार देवों का स्मरण करता है। परंतु देव नहीं आते। राजकुमार विचलित होता है।     
राजकुमार     (स्वगत) ओह ! मैं भूल गया था। मेरे रक्षक देव तो इस समय कहीं विचरण कर रहे होंगे!
कंदर्प               बोलो राजकुमार तुम तैयार हो ? तुम्हारे मन में कोई संशय है क्या ?
राजकुमार     नहीं महाराज। वार करिए !
कंदर्प, खरदे को उठाकर, वेग उत्पन्न करता है और राजकुमार पर वार करता है। राजकुमार चक्कर खाता है, और असहनीय चोट की वेदना से चीत्कार करता हुआ अचेतन जाता है। सभी हैरान और घबरा जाते हैं। चारों ओर चीत्कार मच जाता है।
कंदर्प        राजकुमार !
मृणालिनी     राजकुमार !
कंदर्प राजकुमार के पास जाता है। राजकुमार का हाथ उठाता है, हाथ गिर जाता है। सभी राजकुमार को मृत समझ कर रोने लगते हैं।
महारानी      हे भगवान ये तो अनर्थ हो गया !
प्रतापसिंह     पिताजी, आपने ये क्या किया ?
महारानी      मैं रोक रही थी आपको, परंतु आपने मेरी बात नहीं मानी .....
कंदर्प        काश मैंने तुम्हारी बात मान ली होती महारानी ! ये मैंने क्या किया ... क्या किया .... मैं अपराधी हूं... मेरे पुत्र को बंदी जीवन से मुक्त कराने वाले इस देवता का... अपनी फूल जैसी सुकुमारी पुत्री का ..... मुझसे बड़ा अपराधी और कौन हो सकता है !
                                                                मृणालिनी बेहोश होने को होती है।
महारानी      बेटी !
दौड़कर सब संभालते हैं। मृणालिनी राजकुमार के अचेत शरीर की ओर जाती है।
नेपथ्य गीत               सब जीवन था दिया तुम्हें।
                                                तुम भागे वह प्रेम तोड़ के।।
                                                नलिनी तज ज्यों नहीं थम्हें।
                                                बहता है जल बांध फोड़ के।।

                                                विधि ने खलता यही धरी।
                                                पति के संग न मैं मरी।।
                                                द्रुम भंग करे जहां करी।
                                                गिरती आश्रित है सु-वल्लरी।।
मृणालिनी     राजकुमार ! मैं भी सती होकर सूर्य मार्ग से आपके पास आ रही हूं। मैं इतना समय नहीं दूंगी कि जिसमें देवबालाएं अपनी जादू भरी चितवन से आपका हृदय चुरा सकें ! स्वामी ! यदि हम दोनों इस संसार में गृहस्थ-सुख न भोग पाए तो परलोक में हम दोनों का संयोग कौन रोक सकेगा ! पिताजी ! वचन दीजिए कि आप मुझे नहीं रोकेंगे? वचन दीजिए !
कंदर्प        मैं क्या वचन दूं बेटी ? मैं अभागा तुम्हें क्या वचन दूंगा ! अब तुम पर मेरा कोई अधिकार नहीं रहा।
मृणालिनी     तो फिर ठीक है। राजकुमार के दाह संस्कार की व्यवस्था की जाय ! साथ ही मेरे सती होने की भी !
चारों तरफ रुदन मचता है। राजकुमार के शरीर को लोग ले जाते हैं। राजकुमारी को भी। प्रकाश में परिवर्तन होता है। राजकुमार के चारों देव रामसागर बंधा में स्नान कर रहे हैं।
देव 1            आहाहा... कितने दिनों बाद हमें अवकाश मिला ...
देव 2            और इतना शीतल जल भी !
देव 3           परंतु हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि राजकुमार के जीवन की रक्षा का दायित्व हमारा है।
देव 4            निश्चिंत रहिए ! राजकुमार के ऊपर भला अब कौन-सा संकट आएगा ! अब तो बस उन्हें अपनी प्रिया के साथ प्रेम सागर में हिलोरें भरनी है !
देव 1             अरे अरे ! ये क्या ! बंधा का पानी अचानक लाल कैसे हो गया !
देव 2              जरूर यह किसी अनहोनी का संकेत है।
देव 3             आह ! मैं देख रहा हूं .... राजकुमार की मृत्यु हो गई है !
सभी            मृत्यु ?? कैसे ?
देव 3             पूरा राजपरिवार, राजकुमार के शरीर को लेकर इधर ही आ रहा है !
देव 4             आओ हम लोग यहां छुपकर बैठ जाते हैं !
                                                  चारों छुपकर बैठते हैं। रुदन करते हुए पूरा समूह आता है।
देव 1              यह कैसा दृश्य है ! (देव 4 से) जाइए, पता करिए राजकुमार के शरीर में जीवन बचा है क्या ?
देव 4               अदृश्य होकर जाता हूं।
तब तक राजकुमार के शरीर को बीच में रखकर, बाकी लोग समूहों में इधर-उधर व्यस्त हो जाते हैं।
प्रतापसिंह     अब शांत भी हो जाइए पिताजी। श्मशान में रुदन ठीक नहीं।
महारानी      बेटी ! अब भी विचार कर ले ! तेरा विवाह अभी राजकुमार से नहीं हुआ है !
मृणालिनी     वाह माता वाह ! मैंने राजकुमार का वरण तभी कर लिया था, जब ये मेरे सामने तक नहीं आए थे, और आप कहती हैं कि मेरा विवाह अभी तक नहीं हुआ है ?
                                               तब तक देव 4 राजकुमार की सांस देखता है ...
देव 4                राजकुमार जीवित हैं !
मृणालिनी     क्या राजकुमार जीवित हैं ?
राजा               कौन बोला ?
महारानी       किसने कहा कि राजकुमार जीवित हैं ?
राजा              प्रताप पागल हो गए हो क्या ? राजकुमार भला जीवित हैं ?
प्रतापसिंह     मैंने नहीं कहा है !
तब तक चारों देव अदृश्य बनकर मांत्रिक क्रिया करके राजकुमार को चैतन्य कर देते हैं। वह उठता है। चारों देव इकट्ठे होकर खुश होते हैं।
राजकुमार     अरे ! ये मैं यहां कैसे आ गया ?
प्रतापसिंह     पिता जी वो देखिए !
मृणालिनी     राजकुमार !
राजकुमार उठता है। मृणालिनी दौड़कर राजकुमार के कंधे से लग जाती है। सभी हर्षित होते हैं।
कंदर्प        भगवान ने हमारी सुन ली। अपार हर्ष की बेला है। आइए सब लोग वापस चलें !
राजकुमार    नहीं। अब हम राजमहल जाकर समय नहीं गवाएंगे। अपना आशीर्वाद देकर हमारा विवाह संपन्न कराइए।
देव अग्नि प्रज्वलित कर देते हैं। दोनों सात फेरे लेते हैं। दृश्यावसान। नट-नटी आते हैं।
नट          राजकुमार मृणालिनी से ब्याह रचाकर लौटते समय धुर्रापुर पहुंचे, वहां से प्रतीक्षा करती सोनकेसर बाबी को साथ में लिया। वहां का राजभार पंचों को सौंप कर बैरागढ़ आ गए।
नटी         अच्छा तो यह है पूरी कहानी ? अब ये बताइए, आपने कहा था मैं सीमांतिनी की वंशज हूं। वो कहां हैं?
नट          कहानी अभी खत्म नहीं हुई रानी साहब।
नटी         तो ?
नट          कुछ वर्ष बीत गए। राजकुमार का एक बहुत ही चहेता बाज पक्षी था। उसका नाम था आशुग।
नटी         बड़ा प्यारा नाम था।
नट          बाज भी बहुत प्यारा था। एक दिन वह जब राजकुमार को नहीं दिखा तो उन्होंने उसे याद किया। बाज नहीं मिला। वास्तव में बाज कुछ पक्षियों का पीछा करते हुए बहुत दूर लांजी राज्य में पहुंच चुका था और वहां की राजकुमारी सीमांतिनी ने उसे अपने पिंजरे में कैद कर लिया था।
नटी               अच्छा !
नट               राजकुमार को पता चला। वो गए लांजी राजा के पास, परंतु .....
नटी               परंतु ?
नट         राजा ने बेइज्जत करके उन्हें निकाल दिया। तब राजकुमार ने सोचा कि यहां पर सीधी उंगली काम नहीं चलेगा।
नटी               तो ?
नट          आगे देखिए क्या किया फिर हमारे राजकुमार ने !
नटी         दिखाइए।
नट    (गान)  राजकुमार ने जब पाया कि इस तरह से
महल के अंदर घुसना गलत होगा
उन्होंने लिया सहारा एक बूढ़ी मालिन का 
खो गई थी जिसकी पोती कई बरस पहले
बूढ़ी मालिन अपनी पोती को बिसूरती रातदिन रोया करती।
राजकुमार ने खोज लिया रास्ता, सीमांतिनी तक पहुंचने का
उसकी वही पोती बनकर।
नटी         वाह वाह वाह !
दोनों जाते हैं। सखियां राजकुमारी सीमांतिनी की सेवा करते हुए गा रही हैं।
गीत                     ना वक्त है यह, शशी बिन चिह्न वाला।
                                                ना हैं उरोज, घट-स्वर्ण, सुधी रसाला।।
                                                ना हैं लटैं शिर, मनोभव अस्त्र-शाला।
                                                ना नेत्र हैं, युवक-बंधन, रज्जु-माला।।

                                                क्या दैव ने शशि-कला कर दी चूर्ण सारी ?
                                                पीयूष को फिर क्या मिला उसमें दिया री ?
                                                था जो जला मदन शंकर की हुंकारी।
                                                संजीवनौषधि तदर्थ रची सुखारी।।
चंपा को साथ लिए, मालिन आती है।
मालिन       अरे वाह ! कितनी सुंदर लग रही हैं हमारी राजकुमारी !
सीमांतिनी     मालिन दादी ! ये कौन है ?
मालिन       ये चंपा है। मेरी पोती। ये लो फूल !
सीमांतिनी     वही पोती, जो खो गई थी ?
मालिन      हां। वापस आ गई। मेरा जीवन सफल हो गया। अब से यही फूल पहुंचाने आया करेगी। सोचा आपसे परिचय करवा दूं।
सीमांतिनी     इधर आओ चंपा ! अरे ! तुम कितनी सुंदर हो !
                                                   दोनों एक-दूसरे के सौंदर्य पर मोहित।
मालिन              गुणी भी बहुत है। गजरा यही बनाती है अब।
सीमांतिनी     तभी कहूं कि आजकल दादी फूलों के आभूषण बहुत सुंदर कैसे बनाने लगी ! मुझे भी सिखाओगी न ?
चंपा                हां। सिखाऊंगी न ! और कौन-कौन रहते हैं इस कक्ष में ?
सीमांतिनी     सिर्फ मैं।
चंपा               और तुम्हारे पालतू जानवर ?
सीमांतिनी     वो सब अपने-अपने पिंजरे में रहते हैं। जब चाहती हूं बुला लेती हूं।
चंपा                बुलाओ न !
मालिन             अब जब मन भर जाए लौट आना। मैं चलती हूं !
सीमांतिनी     हां दादी। तुम जाओ। मैं चंपा को भिजवा दूंगी।
                                                  मालिन जाती है।
चंपा                दिखाओ न !
सीमांतिनी     किसको देखना चाहती हो ? मेरी प्यारी बिल्ली को ? या मेरे प्यारे तोते को ? अरे हां ! याद आया ! तुम्हें मैं बहुत ही अचरज भरा प्राणी दिखाती हूं ! पद्मा ! जा तो ! ले आ उसे!
                                                                पद्मा अंदर जाती है।
                            चंपा, तुम कहां रही थी इतने बरस ?
चंपा                   मैं ? बड़ी लंबी कहानी है, फिर कभी बताऊंगी.....
                                                                पद्मा पिंजरे में बंद बाज को लाती है।
पद्मावती         ये देखिए राजकुमारी !
चंपा                   आशुग !
                                                                बाज खुशी से पंख फड़फड़ाता है।
सीमांतिनी     आशुग ?
                                                                चंपा बाज के पास आती है।
चंपा                   कितना प्यारा बाज है ! ऐसा बाज तो दुनिया में कोई दूसरा नहीं होगा ! है न ?
सीमांतिनी     सही कहा तुमने। ऐसा प्यारा बाज मैंने जीवन में पहली बार देखा है। पद्मा, ले जाओ               इसे !
                                                                पद्मा पिंजरे को वापस ले जाती है।
चंपा                   जाओ आशुग, जल्दी ही अपना मिलन होगा।
सीमांतिनी     कुछ कहा तुमने ?
चंपा                   नहीं राजकुमारी। अरे ! लगता है रात हो गई, मुझे अब चलना होगा।
सीमांतिनी     नहीं चंपा। तुम यहीं रुक जाओ। अभी तो तुमसे मुझे बहुत बात करनी है। (पद्मावती आती है।) पद्मा, चंपा यहीं रहेगी, यहीं हमारे पास।
चंपा                   आह ! मुझे नींद आने लगी !
सीमांतिनी     अभी से ? ओह... थक गई होगी ! ठीक है तुम यहीं पर सो जाओ।

राजकुमार पल्लू से चेहरा ढंक कर सो जाता है। अचानक करवट बदलता है तो पल्लू खिसक जाता है। राजकुमारी को शक होता है।

सीमांतिनी     पद्मा ! देख तो !
पद्मावती            क्या ?
सीमांतिनी     इसकी तरफ देख !
                                                                पद्मावती भी हैरान होती है।
पद्मावती         ये तो लगता है कोई पुरुष है !
सीमांतिनी     अरे नहीं । ऐसा कैसे सोच लिया तुमने ? मैं तो इसके सौंदर्य की बात कर रही थी !   तुम जाओ अपने कमरे में।
पद्मावती जाती है। सीमांतिनी बैचैन इधर-उधर घूमती है। फिर राजकुमार के पास आती है।
                                ए ! ए ! सुन तो !
                                                                राजकुमार जगता है।
                                कौन हो तुम ? बताओ ! कौन हो तुम ?
                                                                राजकुमार समझ जाता है कि उसका झूठ पकड़ा गया।
राजकुमार     सच बताऊं या झूठ ?
सीमांतिनी     पूरा का पूरा सच। झूठ कुछ भी नहीं।
राजकुमार     तो ठीक है। राजकुमारी, मैं बैरागढ़ का राजकुमार हूं !
सीमांतिनी     इस वेश में ? (स्वगत) मुझसे मिलने की इतनी बेचैनी थी तो बता तो देते ! अद्भुत सौंदर्य है तुम्हारा। मैं तुम्हारी हो गई राजकुमार ! जीवन मेरा धन्य हो जाएगा, तुमसे विवाह करके।
राजकुमार     क्या सोचने लगीं राजकुमारी ?
सीमांतिनी     कुछ नहीं। भला मुझसे मिलने के लिए स्त्री-वेश में आने की क्या जरूरत थी ?
राजकुमार     जरूरत थी। पहले मूल स्वरूप में आया था तो महाराज ने भगा दिया था, यह कहकर कि यहां तुम्हारा कोई बाज नहीं है !
सीमांतिनी     बाज ?
राजकुमार     हां। अपने बाज को ही तो लेने आया हूं !
सीमांतिनी     आप अपने बाज को लेने आए हैं ?
राजकुमार     हां। क्या हुआ ?
सीमांतिनी     ओह... मैंने सोचा आप मेरे लिए आए हैं।
राजकुमार     कुछ कहा क्या तुमने ?
सीमांतिनी     नहीं। हूं..... तो बैरागढ़ के राजकुमार स्त्री वेश धरकर लांजी राज्य की राजकुमारी के निजी कक्ष में अपने बाज को लेने के लिए आए हैं !
राजकुमार     हां।
सीमांतिनी     और मेरा क्या होगा ?
राजकुमार     आपका ?
सीमांतिनी     हां। राजकुमार, आपके बारे में बहुत सुना था। मन ही मन, मैं आपको पाने की इच्छा रखने लगी थी। और अब, जब आपको देखा तो ....
राजकुमार     तो ?
सीमांतिनी     मेरी धृष्टता को क्षमा करें। यदि आपने मुझे स्वीकार नहीं किया तो, मैं आजीवन कुंआरी रहूंगी। कभी विवाह नहीं करूंगी ! यह मेरी प्रतिज्ञा है।
राजकुमार     राजकुमारी !

गीत              चतुर पिया प्यारे, तुम बिन चैन परत न जिया रे।
                                ओ निर्मोही कहां पे बसत हो, किस सौतन के फंदन
     भूले रहत बन चेरे...पिया रे...

राजकुमार    सीमांतिनी ! तुम मेरी हो चुकी हो। मन से और आत्मा से। हम शीघ्र ही बैरागढ़ चलेंगे। वहां तुम्हारा स्वागत होगा.... हमारे संगीत-ऋषि भूतनाथ नई नवेली रचनाएं सुनाएंगे और हम वहां अपने जीवन की सर्वश्रेष्ठ होली खेलेंगे !
कई कलाकार आते हैं जिनमें भूतनाथ संगीताचार्य गाते हैं। सभी नाचते हैं।
गीत            न खेलूं तुम सन मैं होरी हो सांवरे करते हो छलबल कठिन।
                                नई झपट दई फार चुनरिया तहूं दिखावत नयन....

                                छम छनन नाचे
                                कन्हैया मुरारी रसमाते गाते झिझक झुम...
                                                                कलाकार नाचते-गाते जाते हैं। नट-नटी आते हैं।
नट    ऐसी होरी बैरागढ़ में न पहले कभी मनाई गई थी, न बाद में कभी मनाई गई। सीमांतिनी से एक पुत्र उत्पन्न हुआ और उसको राजपाट का भार देकर महान योद्धा राजकुमार बैरागढ़ी ने बैराग ले लिया।
नटी   क्या ? क्या कहा आपने ? बैराग ले लिया ?
नट    हां बैराग ले लिया और चल पड़े घनघोर जंगल की तरफ। जैसी महात्मा ने भविष्यवाणी की थी। क्योंकि उनका जो मानना था, उसी में आपके इस प्रश्न का उत्तर है  -
राजकुमार अपने हाथों से गहने आदि निकालकर दास की थाल में रखता जाता है।
राजकुमार     (गान)  आशा की सरिता मनोरथमयी, तृष्णा तरंगें लिए।
                                राग ग्राह जहां, वितर्क खग हैं, धैर्य द्रुमा देखिए।।
                                मोहावर्त गंभीर, तुंग तट जो चिंता धनी के किए।
                                डूबे अन्य परंतु तैर इसको योगीश ही हैं जिए।।
                                                                वैरागी वस्त्र धारण कराया जाता है।
नट    अर्थात यह आशा नाम की नदी बड़ी ही कठिन है। इसमें मनोरथ का गंभीर जल भरा हुआ है। तृष्णा की बड़ी-बड़ी तरंगें उठ रही हैं। राग के बड़े-बड़े मगरमच्छ पड़े हुए हैं। शंका के बड़े-बड़े पक्षी मंडरा रहे हैं। धैर्य के बड़े-बड़े वृक्ष इसके किनारे लगे तो हैं परंतु इसके प्रवाह के वेग से उखड़-उखड़कर उसमें गिरते जा रहे हैं। मोह के बड़े-बड़े भंवरों वाली इस नदी को केवल वही पार कर सकते हैं जो विशुद्ध हृदय वाले योगीश्वर होते हैं और इसे जो पार कर लेता है उसी का जीवन सफल है।

                                                                सभी कलाकार मंच पर आते हैं।
गीत             विशुद्धात्मा तू अगुण है, गुण के जाल तुझमें।
                                भ्रमात्मा ही देखें विचल, जग का जंजाल तुझमें।।
                                मुझे दे दे स्वामी शरण, करुणा माल तुझमें।
                                विलोका है मैंने गज-तारण का हाल तुझमें।

                                हां सुखी सब जीव-जंतु, और नीरोग हों सभी।
                                सबका हो कल्याण दाता, हो न दुखिया कोई कभी।।
                                                             दर्शकों को प्रणाम करते हैं।
                                                                       --इति--
नोट -
कोई भी व्यक्ति इस आलेख का आंशिक या पूर्ण उपयोग , मंचन या किसी भी रूप में करेगा तो उसे ©योगेश त्रिपाठी से लिखित अनुमति प्राप्त करनी होगी, अन्यथा कानूनी कार्यवाही की जाएगी।
Yogesh Tripathi
12/273, Gandhinagar Urrahat
REWA (M.P.) 486001
Email – yogeshplays@gmail.com
Mobile-  9981986737, 7354979702