बघेलखंड के ‘निराला’ - मणि रायपुरी
आलेख
योगेश त्रिपाठी
12/273 गांधीनगर उर्रहट
रीवा म.प्र.
ईमैल – yogeshplays@gmail.com
‘मणि-किरण’ पुस्तक में मणि
रायपुरी ने अपना परिचय अपने ही अंदाज में दिया है -
‘धधकी नहीं जो उर में दबी है, चिंगारी नहीं वो आग हूं मैं।
झड़ के मृदु फूल से धूल सना, उड़ता नभ में जो पराग हूं मैं।।
सुन के जिसे झूम उठे दुनिया, वह मादक राग विहाग हूं मैं।
जिसके फिर काटे का मंत्र नहीं, जहरी वो कालिया नाग हूं मैं।।
जलता जिसमें सुख-ईंधन है, उसी क्षारक-आग की आंच हूं मैं।
उलझा झूठ के जाल में जो,सदियों से पड़ा वही सांच हूं मैं।। सदा आंगन टेढ़ा रहा जिसमें, अपने उस भाग्य की नाच हूं मैं।
कहते जिसको‘मणि’ लोग सभी,वही अलौकिक ‘कांच’ हूं मैं।।’
मणि रायपुरी को बघेलखंड का निराला कहा जाता है। मणि रायपुरी
यानी शेषमणि शर्मा ‘मणि’ का जन्म रीवा नगर से 10 किलोमीटर दूर रामनई ग्राम में 17 दिसंबर सन् 1916 को एक सुसंस्कृत सरयूपारी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पितामह पंडित
भैरव प्रसाद संस्कृतज्ञ थे। वो कई वर्षों तक रीवा राज्य में नाजिर रहे थे। मणि के
पिता पंडित चंद्रशेखर शर्मा पेशे से मिडिल स्कूल के प्रधानाध्यापक थे, परंतु वे कवि भी थे, जो भी लिखते, अधिकार के साथ लिखते। राज-दरबार में उनका काफी सम्मान था। मणि की माता का नाम
पार्वती देवी था, और विमाता का नाम जमुना देवी। उनकी दूसरी मां से तीन पुत्र हुए।
उनकी पहली पत्नी का नाम रुक्मिणी था जिन्हें उन्होंने नलिनी नाम दिया था। नलिनी से
शैलेंद्र का जन्म हुआ जो मात्र पांच वर्ष की उम्र में ही कालगत हो गया। नलिनी के
अलग हो जाने के बाद नौ वर्ष तक वे अकेले रहे, उसके बाद उन्होंने दूसरा विवाह एक बाल विधवा आशा शर्मा से
किया। विधवा से विवाह के निर्णय का घर-परिवार में विरोध हुआ परंतु मणि अड़ गए और
विवाह किया। इनसे पांच संतानें पैदा हुईं जिनमें दो नहीं रहीं। पहली संतान किरण,
दूसरी माया, तीसरी दया शर्मा, चौथी संतान अमन कुमार शर्मा और चौथी संतान बृजेंद्र कुमार शर्मा।
व्यक्तित्व से सुदर्शन
मणि जी का स्वभाव बहुत स्वाभिमानी था। पेशे से वे अध्यापक थे। वे कविताएं लिखते थे
और गाते भी थे। कैकेयी उनकी प्रसिद्ध रचना है। होनहार मणि को शैशव काल में
मातृवियोग सहना पड़ा। पिता ने अधिक ध्यान नहीं दिया। पर्याप्त प्यार व देखरेख के
अभाव में वे अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए विवश हो गए। पुत्र शैलेंद्र के वियोग
ने मणि को तोड़ दिया था।
‘इस अमां की यामिनी में खोजने जाऊं कहां मैं ?
हाय, मेरे हदय के धन,
अब तुझे पाऊं कहां मैं ?
मणि पुत्र-विछोह से उबरे नहीं थे कि एक और आघात ने उन्हें
झकझोर दिया। उनकी अर्द्धांगिनी उनसे अलग हो गईं। वे मृतप्राय हो गए। मानसिक संतुलन
डगमगा गया। शेष जीवन ऐसी ही अवस्था में गुजरा।
जिनके पितामह संस्कृतज्ञ हों और पिता कवि हों, वह कवि न हो, कैसे हो सकता है ? मणि में काव्य-प्रतिभा बचपन से ही थी। उनकी पुस्तक के भूमिका-कार ‘चंद्र’ लिखते हैं - ‘मणि ने अपनी
किशोरावस्था से ही, कवि-सम्मेलनों
में प्रथम-द्वितीय पुरस्कार जीतते रहने का कांट्रैक्ट-सा ले रखा था। पिता-पुत्र
में भी प्रतिद्वंद्विता होती आई। एक सम्मेलन में तो निर्णायकों ने, पिता की प्रतिष्ठा रखने को, एक नंबर से पुत्र को हरा दिया था।’
विक्षिप्त मणि जीते-जी लोगों के उपहास के पात्र
हो गए थे, परंतु कहा गया है न,
कि प्रतिभा चाहे किसी भी कोठरी में विराजे,
पूजी तो जाएगी ही। यह उनकी प्रतिभा थी कि
तत्कालीन समय के प्रबुद्ध लोगों में उन्हें सम्मान दिलाती थी। राममित्र चतुर्वेदी,
जगदीश चंद्र जोशी आदि प्रसिद्ध विद्धान-समालोचक
उनकी कविताओं को अत्यंत गंभीरता के साथ लेते थे।
मणि क्रांतिकारी थे, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। उनका नाम रीवा जिला गजेटियर
में क्रांतिकारियों की सूची में सौवें नंबर पर अंकित है। मणि रायपुरी हिंदी मिडिल
परीक्षा पास करने के बाद 14 जुलाई 1936 से शिक्षक हुए। 1942 के स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के कारण 25 नवंबर 1942 को उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं। 1932 में शहीद पद्मधर सिंह उनके सहपाठी थे।
प्रसिद्ध उपन्यासकार सिद्ध विनायक द्विवेदी उनके साथ जेल के एक ही बैरक में रहे।
इसी समय कप्तान अवधेश प्रताप सिंह, शंभूनाथ शुक्ल,
यादवेंद्र सिंह, कुंअर सूर्यबली सिंह आदि भी जेल में थे। जेल में उन्होंने
कई पुस्तकों की रचना की। कैकेयी भी उनमें से एक है। स्वतंत्रता-प्राप्ति के दस
वर्षों बाद 12 अगस्त 1952 को उन्हें विंध्य प्रदेश शासन ने उन्हें निम्न
श्रेणी शिक्षक के रूप में फिर से नौकरी दे दी। 17 दिसंबर 1971 में वे रामनई
विद्यालय से सेवानिवृत्त हुए।
‘नैकहाई’ काव्य में महारानी कुंदन कुंवरि को क्रांतिकारी महिला की
पहचान दिलाने का श्रेय मणि रायपुरी को जाता है। इस काव्य से एक पंक्ति को निकालने
के लिए उन पर रीवा महाराज गुलाब सिंह द्वारा दबाव डाला गया परंतु उन्होंने दृढ़ता
से मना कर दिया। महाराज ने भी लेखक की दृढ़ता का सम्मान कर स्वयं को सम्मानित ही
किया। उनकी प्रकाशित कृतियां हैं - 1942 में कृष्णा प्रेस प्रयाग से मणिकिरण, 1952 में नेशनल प्रेस प्रयाग से कैकेयी और 1952 में देशसेवा प्रेस प्रयाग से द्धितीया।
समीक्षकों का मानना है कि उनकी प्रकाशित कृतियों से कहीं अधिक परिपक्व और अधिक
अर्थपूर्ण उनकी अप्रकाशित कृतियां हैं। अप्रकाशित कृतियों में अंतर्ध्वनि, बागी की डायरी, नलिनी-वियोग, क्रांति की चिंगारियां और पिंजरे का पंछी हैं। उनकी ‘जग और जीवन’ कृति को
विंध्यप्रदेश शासन द्वारा पुरस्कृत किया गया है। ‘बदलती दुनिया’ मध्यप्रदेश शासन द्वारा पुरस्कृत है। ‘कैकेयी’ को विंध्यप्रदेश
शासन द्वारा व्यास पुरस्कार प्राप्त हुआ था।
मणि ने अपने क्रांतिकारी व्यक्तित्व से दुनिया
को चौंकाया था। यही नहीं, उन्होंने अपने
देहत्याग से भी दुनिया को चौंकाया। उनका निधन 29 मई 1975 को रीवा से 22 किलोमीटर दूर बेला में सड़क दुर्घटना में हुआ।
मणि जी पर रीवा विश्वविद्यालय द्वारा शोधकार्य
भी कराया गया है। शोधकर्ता डा. अनिता पांडेय के अनुसार जगदीश चंद्र जोशी की
प्रेरणा से उन्होंने मणि पर शोधकार्य किया। उनकी कविताएं जहां वैयक्तिक त्रास और
करुणा का महासागर प्रतीत होती हैं, वहीं दूसरी ओर
पूंजीवादी व्यवस्था से उपजे दुर्बल, शोषित समुदाय का भी आईना हैं। आवश्यकता है कि मणि रायपुरी की सभी
प्रकाशित-अप्रकाशित रचनाओं को एकत्र कर मणि-समग्र के रूप में पुनः प्रकाशित कराया
जाय। विंध्य के इस सपूत को यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी, साथ ही हम अपनी धरती, अपनी भाषा और अपनी संस्कृति को भी नमन् कर सकेंगे।
-योगेश त्रिपाठी