सोमवार, 5 अगस्त 2019

रतिनाथ की चाची Ratinath Ki Chachi

नागार्जुन के प्रथम उपन्यास ‘रतिनाथ की चाची’ का नाट्यांतरण

रतिनाथ की चाची

नाट्यांतरण
© योगेश त्रिपाठी 
12/273, गांधीनगर उर्रहट, रीवा (म.प्र.) 486001
मोबाईल - 7354979702, 9981986737
प्रमुख पात्र 

सूत्रधार -
दमयंती - विधवा बूढ़ी। गले में रुद्राक्ष की माला। नस लिया करती है।
गौरी     -  युवा विधवा। रतिनाथ की चाची।
रतिनाथ - 10-11 वर्ष का किशोर।
रामपुर    - वाली गांव की सयानी औरत
जयनाथ - 25-30 के बीच का युवक। गौरी का देवर।
ताराचरण - गांव का युवक। समाजसेवी। उम्र 35 वर्ष।
उमानाथ - गौरी का पुत्र। उम्र 19 वर्ष।
कमलमुखी-  गौरी की बहू। उम्र 16-18 वर्ष।


                                                       मंच पर प्रकाश के साथ महात्मा गांधी की जन-यात्रा का दृश्य 
                                                      उपस्थित होता है।  

गीत                  वैष्णव जन तो तेने कहिए, पीर पराई जाणे रे !
                                                         बीच-बीच में जय उद्घोष भी होता है। समूह जाता है। समूह में 
                                                        शामिल  सूत्रधार सामने आता है। 
सूत्रधार   -     
यह कहानी है उन्नीस सौ सैंतीस और चालीस के बीच की। सारा देश अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलित हो उठा, महात्मा गांधी की अगुआई में। बापू का असर शहर-शहर, गांव-गांव, घर-घर, पूरे देश में दिखाई देने लगा। और क्यों न दिखाई दे ? वो आम जन की समस्या को आम जन की भाषा में कहते थे। वो न तो लाठी उठाने के लिए कहते थे, न बंदूक, बस कहते थे कि एक जुट हो जाओ। वो पहले आदमी थे जो कमजोर से कमजोर आदमी को भी जता दिये कि उसमें भी अंग्रेजों  को भगाने की ताकत है। इतना ही नहीं, वो अपने पैरों पर खड़े होने के रास्ते भी बताते थे।  इसीलिए उनका कहना था कि अपने उपयोग के लिए कपड़े खुद बुनो। ब्रितानी सरकार यहां  से  कच्चा माल विलायत ले जाती और वहां से बुना हुआ कपड़ा भारी कीमत पर यहां भेजती। हिंदुस्तानी करघे शांत होने लगे। इसीलिए उन्होंने खुद चरखा चलाया, सूत बुना और उससे बना  जो कपड़ा, वो खुद पहनने लगे। गांव-गांव में तकली-चरखा चलने लगा। लोग खुद कमाने लगे। यह बात तो हुई मगर, पुरानी दकियानूसी सोच इतनी जल्दी थोड़ी जाने वाली थी। ऊंच-नीच, अमीर-गरीब और जाति-पांति में बंटा हिंदुस्तानी समाज, चाहकर भी इससे अलग नहीं हो पा रहा  था। और ऐसे में पिसते थे वो लोग, जो गरीब थे, जो दलित थे, जो कमजोर थे। महिला वर्ग की आवाज भी गूंगी थी। चाहे वो जिस वर्ग, जाति और धर्म की हो, अपनी जातीय और मजहबी संस्कृति की अन्यायपूर्ण जंजीरों में जकड़ी थी। वैष्णव जन तो तेने
अंधेरा होता है। पुनः प्रकाश। उमाकांत की मां गौरी चटाई लेकर आती है। पीछे-पीछे रतिनाथ अपना बस्ता लिए आता है।
गौरी    -
दिन भर खेल ! दिन भर खेल ! कितनी बार कहा कि खेलने के समय में खेल, पढ़ने के समय में पढ़। पर मन लगे तब न ? अब चुपचाप यहां पर बैठ और हिलना नहीं। 
एक किनारे चटाई बिछाती है। रतिनाथ पढ़ाई करने बैठता ही है कि कई  औरतें आती हैं जिनके हाथों में चरखा, पोनी, तकली आदि हैं।            
रामपुरवाली -
अरे आ जाओ आ जाओ आज उमाकांत की मां के घर में बैठते हैं। 
दूसरी औरत -
अरे उमाकांत की मां ! चरखा नहीं चला रही हो आज ?
गौरी      -   
अभी-अभी काम से रीते हैं दीदी। ......... आओ न ! बैठो !
रामपुरवाली -
दम्मो फूफी भी आने वाली हैं। उनके लिए आसन ?
दूसरी औरत दूर रखी मचिया को पास में रखती है। 
रामपुरवाली -
हां ये ठीक है।
                                                               
औरतें पास में बैठ जाती हैं। कताई करने लगती हैं। उमाकांत की मां  अलग-थलग बैठ जाती है। सूत बुनाई के साथ आपस में कुछ बातचीत  करती हैं और  उमाकांत की मां को मुड़-मुड़ कर देखती हैं। गुज्जी भी आती  है और  मचिया पर बैठ जाती है।                                              
रामपुरवाली-
अरे गुज्जी उस पर न बैठ। दम्मो फूफी का आसन है। देख लेंगी तो नराज हो जाएंगी।
गुज्जी -
उठ जाऊंगी न ! जब आएंगी तो।
दमयंती फूफी आती है।                                      
दमयंती -
क्या हुआ रे !
गुज्जी -
आओ आओ दादी ! बैठो !
दमयंती-
चल रही है कताई ! कातो कातो ! बापू का कहना है कि अपने लिए कपड़े खुद बुनो।
गुज्जी -
तो तुम काहे नहीं बुनती दादी ?
दमयंती -
अरे अब हाथ कंपता है रे। बहुत तो बुनी। ये सब अपने ही सूत का पहनी हूं !
दूसरी औरत -
मजै नहीं आ रहा था तुम्हारे बिना फूफी। कुछ चर्चा छेड़ो न !
दमयंती -       
आज गर्मी मालूम होती है। तूफान उठा तो आम की फसल चौपट हो जाएगी। गुज्जी बिटिया,  हमारे यहां से जरा पंखा तो ले आ !
  
गुज्जी उठकर जाती है।                                      
दमयंती -
रतिनाथ भी बैठा है यहां ?
रामपुरवाली-
जा रतिनाथ, बाहर खेल आ।
गौरी      -   
नहीं, खेल बहुत चुका है वो। पढ़ाई करेगा अब।
गौरी का कहना खलता है।                                    
दमयंती -
अरे बैठा रहने दे। छोटा बच्चा है, पढ़ बेटा। पढ़ाई में मन लगा। हमारी बातों में नहीं। 
औरतें -
हां, यही ठीक है। 
दमयंती -
घर की मरम्मत करानी पड़ेगी उमानाथ की मां। अबकी उमानाथ आ जाए, तो बोलो उसे। अब बेचारी के पास और है ही कौन उमानाथ के अलावा ? अच्छा हुआ बेटी का ब्याह पहले ही निपटा दिया।  ..........  उमानाथ की मां, कब तक चुप रहेगी ?
                  
सबकी निगाहें गौरी की ओर। रतिनाथ भी देखता है। गुज्जी पंखा लेकर आती है।                   
दमयंती -
अरे झल भी दे !                                                                                          
गुज्जी झलने लगती है। दमयंती नस लेती है। सबका ध्यान फूफी की ओर।  सिवा गौरी के।                

दमयंती -                                                                                          
 कुछ-न-कुछ तो इसे कहना ही पड़ेगा। पूरे गांव में इसी बात की चर्चा है। आखिर जो होना था, वह  होकर  ही रहा। विधना के विधान को भला हम-तुम टाल सकते हैं ? वैदनाथ के  मरने के बाद किस तरह से उमानाथ को इसने पाला-पोसा तुममें से बहुतों को मालूम नहीं  होगा पर मुझे मालूम है। वैदनाथ था बड़ा कमजोर। रोगहा। लग रहा था कि उसका ब्याह ही नहीं होगा। पर चलो। ये आ  गई। वो तो निकल गया पर बंस चल गया उसका। भगवान करे, उमानाथ अपने बाप का नाम रखे ! 
                 
गौरी कृतज्ञता से फूफी की ओर देखती है। फूफी अपने शिकार को अपनी गिरफ्त  में आता देखकर आश्वस्त होती है। नस लेती है।              
दमयंती -
उमानाथ की मां ! चरखा क्यों नहीं चला रही हो ? हां, ठीक ही है। मन में चिंता है तो कैसे चले चरखा ? सयानी हूं और मैके में हूं, सबको देखा है मैंने। दो पीढ़ी। बहुतों को संकट से निकाला है। कह रही हूं तुमसे भी। कोई चिंता की बात नहीं है, सारा इंतजाम हमने कर लिया है। परसों इस  समय तक यह बोझ तुम्हारे शरीर से उतर जाएगा। उमानाथ की मां मैं तुमसे कह रही हूं, रत्ती- भर की फिकर मत करो।                               
                 
                 
                                  
                  
                                 
                                                                           
                 
                       गौरी का मन हुलस पड़ता है। रतिनाथ समझने की कोशिश करता है।
               पर मदद मन से तभी मिलती है, जब हर बात पता हो। अच्छा ये तो बता दो, कौन था वह                                  कलमुंहा, जिसने तुम्हें आग में यों झोंक दिया ? 
                                  गौरी, मानो कांप उठी। उसे फूफी राक्षसी लगने लगी। रतिनाथ भी आशंकित।
               अब बोलो भी। हमसे क्या छुपाना। हमको भी पता होना चाहिए। जिस हक से मदद करने को                             तैयार  हूं, उसी हक से मालूम भी होना चाहिए। सयानी हूं। इस गांव को बिगड़ने नहीं दूंगी मैं।                              बोलो!
                                    सब उसकी तरफ देखते हैं। 
गौरी  -     पता नहीं। मैं कैसे बताऊं ? मैंने नहीं देखा उसे।
                    सारी औरतें गौरी की ओर प्रश्न से देखती हैं। 
दमयंती-        हूं......। तो वो कौन था, तुम इस बारे में कुछ नहीं जानतीं ?
गौरी -        नहीं। 
रामपुरवाली -भला ऐसे कैसे हो सकता है फूफी ?
दमयंती - हूं। इसका बाप, माने तेरा देवर जयनाथ, चार महीने से लापता है। भला क्यों ? बोलो !
गौरी   -      मैं क्या जानूं ?
रामपुरवाली -अरे ! घर में अकेली औरत तुम हो, और तुम्हें नहीं मालूम वो कहां गया ?
गौरी    -     नहीं।
दमयंती  -  रामपुरवाली ! जरूरी नहीं होता कि मर्दों के मन के अंदर क्या चल रहा है, औरत जान
                 ही ले। हूं .... रतिनाथ को तुम बहुत चाहती हो न ? 
गौरी     -             बिन मां का है न, उसको कहीं मां की कमी न महसूस हो इसलिए......
                                  औरतें हंसी को दबाती हैं।
दमयंती   -       इसमें हंसने की क्या बात है ?
रामपुरवाली- कुछ नहीं फूफी। इसने कहा कि जयनाथ का बेटा भी तो है, इस बात पर हंसी आ गई।
दमयंती -  चुप रह। रतिनाथ को अगर उसकी चाची अपने सगे बेटे जैसा मानती है तो इसमें बुरा
                  क्या है ? देवर का बेटा अपना ही बेटा होता है। दुनिया भर की घरफोड़हू यहीं 
                  आके इकट्ठी हो गईं ! क्या करे बेचारी। इसका बेटा उमानाथ तो बाहर है। जयनाथ 
                   का पता नहीं ! लंपट है ! घूम रहा होगा  इधर-उधर ! क्या करे ये ? आखिर जीने का 
                   सहारा तो चाहिए न। .... अच्छा भई ! अंधेरा हो रहा  है, मुझे तो शिवजी के 
                   दर्शन करने नित्य मंदिर जाना होता है। 
रामपुरवाली -अंधेरा होने के बादै क्यों फूफी ?
                                                         औरतें हंसती हैं।
दमयंती  - छिनाल कहीं की ! अंधेरा होने के बादै दिया-बत्ती होती है। संजीदी बात के बीच, 
                  ठिठोली शोभा नहीं देती ! हूं.... तो उमानाथ की मां, घर-परिवार की सयानी होने 
                  के नाते मैं बस जानना चाहती थी, कि वो कौन है जिसने तुम्हें .....। खैर, तुम 
                  कहती हो कि तुम जानती ही नहीं हो तो बात ही खतम हो गई ! पर मैं तो 
                    इतना जानती हूं कि पांच साल की बच्ची भी ये बता सकती है कि 
                 आंखमिचौनी के वक्त उसकी पीठ थपथपाने वाला कौन रहा होगा! अभी भी 
                  वक्त है, जो बता सकती हो, बता दो।
गौरी     -      मैं और कुछ नहीं जानती। वह भादों का महीना था। अमावस की रात थी। एक घनी 
                  और अंधेरी छाया मेरे बिस्तर की तरफ बढ़ आई ...........
                                सारी औरतों के मुंह गौरी की तरफ।
                       उसके बाद क्या हुआ, होश नहीं रहा.....
                                         औरतें निराश होती हैं। 
रामपुर वाली- होश कैसे होता ? मौज मारने की घड़ियों में किसी को भला कोई होश रहेगा ! 
                        बला से, अब पेट  कोहड़ा हो गया, तो होने दो !
                                 चली जाती है।
दमयंती  -     शिव-शिव ! सोच ले। अब भी सब ठीक हो सकता है। चलूं ..... देर हो रही है ! 
                      अरे अब  चलो न  तुम लोग भी !
                                            सभी जाती हैं। गौरी रोती है। रतिनाथ देख रहा है। गौरी का ध्यान                                                                       रतिनाथ  की ओर जाता है, वह उसके पास आती है।
गौरी      -     रत्ती, चल तुझे खाना खिला दूं।
रतिनाथ  -   ये लोग हमारे घर क्यों आती हैं चाची ? 
गौरी         -      अरे बेटा, सब एक जगह बैठ कर चरखा चलाती हैं। मन भी लगा रहता है सबका। फूफी का                                 दरबार तो कहीं भी लग सकता है। 
रतिनाथ -    कहती है, बापू ने कहा है चरखा चलाओ ! चरखा चलाने के लिए कहा है न ? किसी की बुराई                                करने के लिए तो नहीं ?
गौरी       -     नहीं नहीं ! बेटा, कहां किसकी बुराई ? तुम्हारा मन पढ़ाई में नहीं लग रहा था क्या ? चल, खाना                           खिला दूं।
रतिनाथ -   ये औरतें मुझे अच्छी नहीं लगती हैं। न वो, न उनकी बातें। तुम अपने यहां क्यों बिठाती हो                                 उन्हें ? आज से मैं दरवाजा ही नहीं खोलूंगा। किसी को नहीं आने दूंगा।
गौरी      -    ऐसा नहीं करते बेटा। घर-परिवार निभाना पड़ता है। हम समाज में हैं न ? समाज से कट कर                                कैसे रह सकते हैं बता तू ? अच्छा ये बता, तूने रधिया को क्यों मारा था ?
रतिनाथ     -      ऐसे ही।
गौरी        -          बता न, क्यों मारा था उसको ?
रतिनाथ   -       उसने गंदी बात की थी।
गौरी       -           गंदी बात ? क्या ?
रतिनाथ    -        नहीं बताऊंगा।
गौरी      -            तुझे मेरी कसम है।
रतिनाथ  -        उसने कहा था - तेरी चाची को बच्चा होने वाला है !
                                          गौरी उसे भींच लेती है।
                   इसलिए मैंने उसको मार दिया। क्यों कहा उसने ऐसा तुम्हारे लिए ? 
गौरी     -     हम कमजोर हैं बेटा, किसी पर हाथ उठाएगा, वो चार अच्छर हमें और सुनाएंगे। थोड़ा-सा                                 सुन लेना ठीक है, झगड़ा करना ठीक नहीं है। बोल, अब तू किसी से झगड़ा नहीं करेगा।                                       बोल !
रतिनाथ  -          ठीक है। नहीं करूंगा। 
गौरी    -               चल, अब खाना खा ले !
रतिनाथ -          तुम खाओगी तभी खाऊंगा।
गौरी      -             मैं कहां पहले खाती हूं ? जब तुझे खिला देती हूं तब ही न खाती हूं ?
रतिनाथ  -        नहीं खाती हो। कल तुमने कहां खाया था ? मैंने देखा था। पूरा खाना रखा था सुबह। 
गौरी        -          मेरी इच्छा नहीं हुई बेटा। अच्छा चल, तू कहता है तो दोनों जन साथ ही खाते हैं। 
रतिनाथ    -       हां।  
                                    गौरी अंदर जाती है। रतिनाथ उत्साह के साथ बैठने की व्यवस्था करता है।
गीत ललना हमार देखो खाए न बिगुर मइया
मइया की छतिया में हुलसे दुलार।
नान्हीं नान्हीं बतिया, और नान्हीं ये सुरतिया
मइया के जियरा में हुलसे दुलार !
                                            खिलाकर उसे अंदर ले जाती है। अंधेरा। आकाश में चांद पूरे निखार पर आ                                                         जाता है। गौरी उद्वेलित अवस्था में आती है।
गौरी   -        कहने को तो चंद्रमा हमारे अंगना में चांदनी की बरखा कर रही है। पर हमें इसमें 
                  शीतलता  नहीं, आग जैसी जलन लग रही है। एक-एक किरण तिरशूल जैसे छाती को 
                   बेध रही है।  कहते हैं आज के दिन चंद्रमा को देखना निसिद्ध है। पर मैं तो देखूंगी ! 
                   वो भी हाथ में फल-फूल लेकर नहीं ! ऐसे ही देखूंगी, खाली हाथ। कितना अशुभ होगा 
                   मुझे? हो जाए न ! अब और कितना कलंकित हूंगी मैं ? और कोई कलंक बचा है मेरे 
                   लिए ? लगा दे ! तू वो भी लगा दे कलंकी ! विधाता के विधान में फंसि के न सोय सके 
                   हैं, न जाग सके हैं ! भादों, आसिन, कातिक, अगहन, पूस, माघ, फागुन और ये चैत, 
                  आठवां महीना चल रहा है ! पेट में बच्चा ऊधम मचाने लगा है ! बेटवा और बिटिया 
                  सुनेंगे तो क्या कहेंगे ? कहां गए तुम जयनाथ ? ऐसे भी कोई जाता है ? वादा करके 
                   गए थे कि बाबा बैदनाथ को जल चढ़ाकर लौट पड़ोगे। पर नहीं आए। हमको पता है कि 
                   तुम आजकल काशी में हो ! तुमको चिट्ठी भी भेजना चाहें तो किससे लिखवाएं ? 
                   हे भगवान ! का करूं मैं ? सुना है कि लहेरिया सराय अस्पताल की डाक्टरनी इस 
                   काम में बहुत कुसल है। पर वहां तक पहुंचूं तो कैसे ? माई रे !.. माई ! अब तुम्हीं हमारा 
                   साथ दे सकती हो। तुम मना न करना माई !
                               प्रकाश उज्वल होता है। स्कूल जाने के लिए तैयार रतिनाथ अंदर से आता है।
रतिनाथ -     चाची, खाना बन गया ?
गौरी     -       हां बेटा। मैं लाती हूं।
                             रतिनाथ बिछौना बिछाकर बैठता है। चाची अंदर से थाली में भोजन लाती है। 
रतिनाथ -    क्या हुआ चाची ? तुम रो रही हो ?
गौरी      -      कुछ नहीं बेटा। ऐसे ही है।
                                                     रतिनाथ को खिलाने लगती है।
                     रत्ती, पांच-छः रोज तू अकेले रह लेगा ?
रतिनाथ     -        और तुम कहां जाओगी ?
गौरी       -      तरकुलवा जाऊंगी। किसी से कहना मत। रात को पड़ोस के आंगन में सो जाना। 
                    चावल, दाल,  लकड़ी, धनिया, हल्दी नमक तेल सब मौजूद है। खुद पकाकर खा लेना। 
रतिनाथ   -           मैं भी साथ चलूं ?
गौरी        -              नहीं। बात ऐसी आ पड़ी है कि अकेले ही जाना होगा।
रतिनाथ   -            अकेले तुम चली जाओगी ? 
गौरी   -    अ........ हां बेटा। मैं चली जाऊंगी.... बस तुम अपना ध्यान ठीक से रखना। खाना बनाना तो                                आता ही है। आगी ठीक से जलाना। तुम रहे आओगे न ? बहुत जरूरी है इसलिए जा रही हूं।
रतिनाथ  -           ठीक है चाची। तुम मेरी चिंता मत करना। पर सावधानी से जाना।
                             उठ चुकता है।
                    चाची मैं जा रहा हूं पाठशाला। तुम कब जाओगी ?
गौरी     -                 कल। किसी से कहना नहीं।
रतिनाथ   -           ठीक है चाची। मैं जाऊं ?
गौरी      -                 जा। दरवाजा ओढ़का देना !
                                     रतिनाथ पांव छूकर जाता है। गौरी चरखा चलाने लगती है। पुरानी बातें याद                                                      करने लगती है। सूत्रधार दूसरे कोने पर आता है।
सूत्रधार-  रतिनाथ की चाची चरखा चलाने तो बैठी लेकिन तभी उसे उसका अतीत, 
               याद आने लगा। भरा-पूरा बचपन था, सुखी मां-बाप थे। कुलीन वर की तलाश में आ 
                पहुंचे शुभंकरपुर। ब्याह दिया वैद्यनाथ नामक एक महाकुलीन परंतु महादरिद्र को ! 
                नाम वैद्यनाथ, किंतु रोगों की खान। घुन से लिपटे हुए दांपत्य ने घिसट-घिसट कर 
                रेंगना शुरू किया। बेटी प्रतिभामा पैदा हुई, दो साल बाद बेटा उमानाथ पैदा हुआ और 
                वैद्यनाथ टें बोल गए। विधवा जीवन। सुदूर दक्षिण में सत्रह बरस की प्रतिभामा को बेच 
                दिया। जी हां, बेचना ही है। चालीस साल के अधेड़ से चार सौ रुपए के बदले ब्याह कर 
                दिया ! जो गांव-परिवार के बुजुर्गों ने नियम बताए, उनका पालन करती गई। चार सौ 
               रुपए से ऋण को चुकता किया, पर अब ? वैधव्य में गर्भ-धारण ! न यहां कोई परिवार 
                साथ दे रहा है, न कोई समाज ! क्योंकि ये समाज के नियमों के विपरीत है ! उमानाथ 
                की मां ! तुम्हें अपने किए पाप के प्रायश्चित का मार्ग स्वयं तलाशना होगा !
                                    गौरी चौंक पड़ती है। सांसें तेज। 
गौरी-     हां, मुझे अपने पाप के प्रायश्चित का मार्ग खुद ही तलाशना होगा ! मगर कुछ नहीं सूझ 
             रहा है। कहां जाऊं, किसके पास जाऊं ? कौन है जो मेरी परिस्थिति पर हंसे नहीं, मेरी मदद 
             करे। माई ! नहीं है मेरा। वो भी नहीं है, जिसने मुझे इस पाप के सागर में  धकेल  दिया ! 
             मुझे विश्वास है माई कि तुम मुझे नहीं ठुकराओगी, तुम ही मुझे आश्रय दोगी, तुम ही मुझे 
             इस मुसीबत से बाहर निकालोगी, पर अगर वहां भैया हुए तो ? तब क्या होगा ..... तब मैं                                      कहां जाऊंगी ........हे प्रभु ! ये किस संकट में डाल दिया हमको ! 
                                                    रोने लगती है। अचानक आहट सुनाई देती है।
             कौन है ? कहीं पुलिस वाले तो नहीं ? सुना है नाजायज संबंध बनाने वालों को पुलिस 
            पकड़ ले  जाती है। मैं क्या करूंगी तब ? कौन जाएगा मुझे पुलिस से छुड़ाने ?
                                        उसका दिल धड़कने लगता है। दाढ़ी बढ़ाए हुए जयनाथ का प्रवेश।                                                                     जयनाथ उसके बढ़े हुए पेट को देखकर सिर झुका लेता है।
           कौन हो तुम ..... तुम !

जयनाथ-  (दर्शकों से) मैं जयनाथ हूं। इस विधवा का देवर। जिस खानदान में मैं पैदा हुआ, उस 
                  खानदान  की कुछ खासियतों को अपनाने का अवसर पाने की तलाश में हूं। पत्नी 
                   सिधार गई। एक बेटा है रतिनाथ, जिसे ये पुत्र जैसा ही मानती है।  
जयनाथ - मैं हूं उमानाथ की मां। 
                                                         जयनाथ लोटे में पानी लेकर पैर धोता है। 
                         दातून भी नहीं किये हैं। है क्या ?
गौरी    -      ...... हां। देती हूं।
                         दौड़कर अंदर से दातून लाती है।
                 कल सुबह ही रत्ती लाया था। 
                           जयनाथ दातून करने लगता है।
                चार अच्छर लिखना पहाड़ हो गया था क्या ? कोई खत नहीं, खबर नहीं ! बड़े 
                अजीब आदमी हो ! मेरे लिए एक-एक पल गुजारना मुश्किल हो रहा है यहां। 
                 कुछ खबर भी है ? 
जयनाथ- हां, खबर है और मैं उसी के प्रबंध में लगा था। तुम सोचती हो कि मुझे कोई 
                चिंता नहीं ?  तारा बाबा के पास गया था। जानती हो न उनके बारे में ? दुनिया 
                 की कोई भी ऐसी समस्या नहीं है, जिसका निदान तारा बाबा के पास न हो। 
                 बस, उन्होंने जो सामग्री मांगी हो, वो मुझे मिल  जाए ....... 
गौरी  -    मुझे तारा बाबा पर भरोसा नहीं है। सुनो ! तुम मुझे कल मेरे मायके पहुंचा दो ! 
             मैं इतनी संकट  में पड़ी हूं, और तुम्हें जादू-मंतर सूझ रहा है ? बरबाद कर दिया 
             तुमने मुझे ? कहीं मुंह दिखाने  लायक नहीं छोड़ा ! जी करता है तुम्हें मार दूं और 
              खुद भी मर जाऊं ! एक-एक दिन पहाड़ लग  रहा था। मैं विधवा, और मेरा पेट 
              फूलने लगा। घर के अंदर रह नहीं सकती थी, बाहर भी निकलना  मुश्किल पड़ रहा 
              था। आंचल से कितना छिपाऊं पेट को ? सब समझ गए। जान गए सब। और मुंह 
              पर कहने लगे। कितने महीने का है ? कितने महीने का है ? और फिर वो छुपा हुआ 
             सवाल - किसका है ? किसका है ? उनकी आंखों में जो तंज है, उसका क्या जवाब दूं मैं ? 
             बोलो ! क्या  जवाब  दूं मैं ? 
जयनाथ  -      तुमने कहीं मेरा नाम तो नहीं लिया ?
गौरी  -   यही तो अफसोस है। कि क्यों नहीं तुम्हारा नाम बता दिया मैंने उन सबसे ! बोल क्यों 
             नहीं दिया मैंने कि मुझे इस हालत में पहुंचाने वाला कोई और नहीं, तुम्हारे ही खानदान 
             का कमीना वो मेरा अपना ..... ! नहीं बोल सकी। ताला लगाकर जुबान पर चुपचाप सुनती 
              रही हर ताने को। क्योंकि दोष सिर्फ तुम्हारा नहीं था। 
जयनाथ   -   हां। यही तो मैं भी कह रहा था। चाहती तो तुम मना कर सकती थीं। 
                                          गौरी सन्न रह जाती है।
गौरी   -    चाहती तो मैं मना कर सकती थी। ठीक कहा तुमने। पर क्यों नहीं कर सकी मना ? इस 
              शरीर पर वश क्यों नहीं कर सकी मैं ?  
जयनाथ -            तुम अगर मना करती, तो मैं शायद लौट जाता। जबर्दस्ती थोड़ी करता ?
गौरी     -                और दोबारा कभी कोशिश भी नहीं करते। 
जयनाथ -             बिल्कुल।
गौरी    -      लेकिन वो क्या था, जो मुझे मना करने से रोक रहा था ? मैं मानती हूं कि मैं भी 
                  बराबर की  पापिनी हूं। मुझे हक नहीं है तुम्हें कोसने का। मेरा आंचल ढलक गया 
                  और प्याला लुढ़क गया। इसीलिए विधवाओं को श्रृंगार वर्जित है। सफेद साड़ी पहनें, 
                  मर्दों से दूर रहें। पर कोई तो बताए  कि कौन-सी ऐसी जगह है जहां मर्द नहीं होता ? 
                  जहां मर्द नहीं पहुंच सकता ! जहां हम  विधवाएं  अपनी दबी-कुचली उछालों को दबाते 
                  हुए पवित्र जीवन बिता सकें ! जयनाथ, तुम बेफिक्र रहो, मैंने तुम्हारा नाम न तो कभी 
                  लिया है न ही कभी लूंगी। कभी नहीं लूंगी। मर जाऊंगी किन नाम नहीं लूंगी। लेकिन 
                   तुम्हारे पैर पड़ती हूं। मुझे इस संकट से उबारो। भगवान के लिए मुझे अकेला मत छोड़ो 
                  इस संकट के घड़ी में !  
जयनाथ  - ठीक है। ऐसा तुम क्यों सोचती हो कि मैं तुम्हें अकेला छोड़ रहा हूं ? कहा न, इसी चिंता 
                   में लगा  था। कई वैद हकीमों से बात की मैंने, पर सभी कहते हैं कि खतरा है... खतरा है। 
                   इसलिए मेरी  हिम्मत नहीं हुई खाली हाथ यहां आने की। तुम्हें मायके पर भरोसा है तो 
                   अच्छी बात है, मैं  पहुंचा   दूंगा। 
गौरी     -    सच में पहुंचा दोगे न ?
जयनाथ- हां। पहुंचा दूंगा। कब जाना है ?
गौरी  -       कल सबेरे।
                                                      जयनाथ जाता है।
            (स्वगत) बोल तो दिया है - कल सवेरे पर इस काम के वास्ते चलने के लिए का हमरे 
              पैर उठेंगे ?  अरे कैसी मां हूं मैं ? जो लोकनिंदा से बचने के लिए अपने ही अंश की हत्या 
               करने चली हूं ? हमरी कोख में पल रहे उस नन्हीं जान को नहीं पता कि उसकी यही मां, 
               जो उसको हर पल खुराक दे रही है, एक-एक सांस दे रही है, उसका गला घोंटने वाली है ! 
                उसकी हत्या करने वाली है ! माफ करना हमरे बच्चे ! अगर तू पैदा होगा भी न, तो ये 
                दुनिया तुझे चैन से जीने नहीं देगी और तब भी  तेरी गुनहगार मैं ही हूंगी। तेरी मां ही 
               होगी ! सुन रहा है न तू ! ओ मेरे अजन्मे शिशु, मुझे माफ करना, मुझे क्षमा करना !
                                अंदर जाती है। सूत्रधार आता है।
सूत्रधार- दोषी एक है या दोनों हैं ? ये अपने आप में एक अलग विषय है। एक विधवा है, 
               एक विधुर है। समाज चाहता तो इन दोनों का ही आपस में विवाह करा सकता था। 
               लेकिन नहीं कराया। क्यों ? क्योंकि जयनाथ का तो दूसरा विवाह हो सकता था, पर 
               रतिनाथ की चाची का नहीं। समाज में विधवा के पुनर्विवाह की कोई व्यवस्था नहीं है। 
               जयनाथ चाची को उसके मायके पहुंचा कर तुरंत भाग आया, और इधर रतिनाथ, 
                स्कूल जाता और दोनों वक्त अपने और पिता के लिए भोजन बनाता। महीनों बीत गए 
              उधर चाची को रतिनाथ की याद सताने लगी और इधर रतिनाथ को चाची की। 
                                   सूत्रधार जाता है। बाहर से जयनाथ आता है।
जयनाथ  -      रत्ती ! ए रत्ती ! अरे कहां मर गया ? रत्ती !
                                    अंदर से हाथ पोंछता हुआ रतिनाथ आता है।
          सुनाई नहीं देता क्या ? जा, सिलौटी और बट्टा ले आ ! और सुन ! लोटा भर पानी, और
                  गिलास भी लेते आना !
                                            रतिनाथ अंदर जाता है। जयनाथ आसन बिछाता है। अंगौछी से सामान                                                          निकालता है। कागज की कई पुड़ियों में कई सामान हैं। रतिनाथ सिलौटी-                                                           बट्टा लेकर आता है। 
               शाबाश। पानी ले आ। और गिलास भी।
                      रतिनाथ फिर से अंदर जाता है। एक लोटा और गिलास ले आता है।
रतिनाथ-           क्या करोगे ?
जयनाथ   -        भोलेनाथ की बूटी बनाऊंगा। तू भी चखेगा ?
रतिनाथ  -          हां।
जयनाथ  -          अच्छा ? तो चल, जैसा मैं कहूं करता जा ! बैठ यहां। पहले सिलौटे को धो। अब ये 
                           ले बूटी है ये। इसको थोड़ा-थोड़ा पानी डालकर पीस। हां। अरे तनिक ताकत लगा। 
                           तब उसमें तासीर आएगी। रुक-रुक। गिनकर ग्यारह ठो काली मिर्च डाल। डाल
                           दिया ? अब दो ठो  बादाम डाल। हां। अब चुटकी भर सौंफ डाल दे। हां बस। 
                           अब घोट। 
                                           रतिनाथ भांग घोटना आरंभ करता है। पास में जयनाथ पालथी मार कर                                                               बैठ जाता है और गुनगुनाने लगता है।
जयनाथ  -         अरे भोलेनाथ की बूटी है ये, जितना बने तू घोट,
                  सीधे सरग को जाएगा, चार गिलास तू सोट।
                  जय भोलेनाथ। वृंदावन से लाया था ये सिलबट्टा। 
                  बानी ऐसी बोलिए, दिल पे न लागे चोट।
                   चाहे फिर जितना घिसे, रह जाएगी खोट। 
                       जय भोलेनाथ। अरे घिस चुका ? अरे जोर लगा बबुआ ! सुन बबुआ ! हम सोचते हैं 
                        अब तेरी चाची को बुलवा लें।
रतिनाथ- हां ! मैं चला जाऊं बुलाने ?
जयनाथ -         अरे तू बहुत छोटा है रे। भटक जाएगा। चल उठ। 
                                          रतिनाथ उठ जाता है। जयनाथ सिल से भांग को कांछ कर गिलास में                                                                डालता है। पानी मिलाकर घोलता है। पीता है। 
                   ठीक है बबुआ। तू ही जा। तेरे संघे राउत को पठा देंगे। (उठकर अंगड़ाई लेते हुए) बहुत 
                  दिन भए   रे तेरी चाची को गए हुए ! 
                                 रतिनाथ को उसका अंदाज अच्छा नहीं लगता। 
           खड़ा क्या है ? सिलबट्टा अंदर ले जा, और अच्छी तरह धोकर रखना। और कल ही चला 
                  जा तू।  उसकी याद तो मुझे भी सताने लगी।

                          जयनाथ की वीभत्स हंसी से रतिनाथ सिहर उठता है।
 
                                   अंधेरा। पुनः प्रकाश। रतिनाथ का स्मरण-दृश्य। एक महिला (रतिनाथ                                                            की मां) कराह रही है। उसकी छाती पर बैठा जयनाथ कुल्हाड़ी से उसकी                                                            गर्दन रेत रहा है। औरत की छटपटाहट अचानक एक घुटी हुई चीख के                                                              साथ समाप्त हो जाती है। रत्ती जाग उठता है। सूत्रधार के रूप में आगे                                                              आता है।

रतिनाथ-   साढ़े तीन साल का रहा मैं, जब अपने पिता की इस करनी को अपनी आंखों से 
                 देखा था। मां की याद आते ही मुझे बस यही दिखाई देता है। उसको दमा की बीमारी थी। 
                 अक्सर लेटी ही रहती। मेरे पिता चाची से तो प्रेम से बतियाते, पर मां की ओर निहारते 
                 तक नहीं थे। उन्होंने  मेरी मां को मार डाला। उसकी गरदन रेत के। कोई भी दखल देने 
                 वाला यहां नहीं था। रुई के फाहे की तरह बात हमेशा के लिए दब गई। लेकिन मेरे मन में 
                अपने बाप के लिए इज्जत कभी  नहीं पैदा हुई। जमीन पर जरा सा पानी गिरने पर मुझको 
                पीटते, तो बचाती मेरी चाची।  मुझे दूसरे कामों में लगाते, तो उन्हें मेरी पढ़ाई के लिए 
                मनाती मेरी चाची। मेरे लिए तो बस मेरी चाची ही मेरी मां थी और मेरा बाप भी वही थी। 
                 मैं राउत बाबा के साथ तरकुलवा जाकर  चाची को ले आया। और लाया, ढेर सारे आम ! 
                 तरह-तरह के आम। मुझे आम बहुत पसंद है। लेकिन चाची ने कहा, जाके गांव वालों को 
                भी बांट दो! जा रहा हूं बांटने !  
                                        अंधेरा। पुनः प्रकाश।
                                    सन्नो की मां के घर पर दमयंती दूसरी औरतों के साथ भजन गा रही है। 
भजन रघुपति राघव राजाराम
                     पतित पावन सीताराम।
दमयंती - चलो अब ये हो गया।
जनककिशोरी- सन्नो की मां ! सो रही हो क्या ?
सन्नो की मां -अरे नहीं फूफी। बस आंखै भर लगी थी। 
दमयंती    -       अच्छा ! किससे ?
सन्नो की मां- तुम भी फूफी !
दमयंती  -बापू कहते हैं कि इंसान को जरूरत भर का ही खाना चाहिए और जरूरत भर का ही सोना                                   चाहिए। वो पूरे देस को जगाने में लगे हैं और ये सोने लगी ! ऐसे समय में सोना गुनाह है                                      गुनाह,  समझी ?
                       चरखा लिए रामपुरवाली आती है।
रामपुर वाली -न जाने अपने को क्या समझती है ! अरे अपने पति की दूसरी औरत हूं, 
                        रखैल नहीं हूं !  
दमयंती -क्या हुआ रामपुर वाली ? बड़ी तन्नाई हुई हो ? बड़ी वाली को तो तू ही नहीं आने देती 
                 यहां, अब क्या हुआ ?
रामपुरवाली -बातें तो आती हैं न यहां तक। 
दमयंती     -     अरे तो आने दे। अब तो तू ही राजलक्ष्मी है भोला महाराज के घर की। 
रामपुरवाली -अरे काहे की राजलक्ष्मी ! कल भी चार लात जमाया हमको।
जनककिशोरी -हाय राम ! काहे ?
दमयंती     -     अरे मर्द है तेरा। जमा दिया तो क्या हुआ !
जनककिशोरी -फिर भी कुछ कारण तो होना चाहिए ......
रामपुर वाली- अरे ये सब तो इसके यहां चलता ही रहता है। पता है न, उमानाथ की मां नैहर से आ गई है।                                  खाली हो के। फूफी, तुम्हारे यहां भी आम भिजवाया होगा न ?
जनककिशोरी- हां, रत्तीबा दो ठो आम लाया था। लौटा दिया।
दमयंती      -    उस भ्रष्ट औरत से तो भगवान बचाए ! इन आंखों के सामने वो न आए, भगवान से यही                                      प्रार्थना है।
सन्नो की मां -वैसे आम लेने में क्या हर्ज है, हां, पकवान-सकवान होता तो बात दूसरी थी।
जनककिशोरी -तूने ले लिया ?
दमयंती - सवाल आम या पकवान का नहीं है। सवाल यह है कि पड़ोस के इस पाप का गांव 
                 के जीवन पर  क्या असर पड़ेगा ? अपराधी को यदि दंड न मिले तो एक दिन भी 
                 संसार टिक सकता है क्या ? उमानाथ की मां अपने मायके जाकर पाक-साफ हो 
                 आई परंतु शुभंकरपुर का नाम इससे कितना कलंकित हुआ है, कुछ पता है ? 
                  मायके में भी ........
सन्नो की मां -तो अब उसका क्या होगा ? इतना बड़ा कलंक लगना क्या मामूली सजा है ?
रामपुर वाली -पूरा तो कहने दो उन्हें।
दमयंती  - अब और क्या होगा ? मर्दों का तो कोई ठिकाना है नहीं। हम अगर न रहें तो संसार 
                  से आचार-विचार ही खत्म हो जाए। उमानाथ की मां व्यभिचारिणी है, पतिता है, 
                  भ्रष्टा है, कुलटा है, छिनाल है। उससे हमें किसी प्रकार का संबंध नहीं रखना चाहिए, 
                  बस। बोलचाल बंद, बात-विचार बंद। प्रत्येक व्यवहार बंद। हां, जयनाथ और रतिनाथ, 
                  दोनों बाप-पूत यदि प्रायश्चित कर  लें तो इस समाज में उनके लिए स्थान हो सकता है, 
                  परंतु उमानाथ की मां को समाज किसी भी हालत में क्षमा नहीं कर सकता।  
रामपुरवाली- बिलकुल ठीक। अपराधी को सजा मिलनी ही चाहिए। 
सन्नो की मां- लेकिन वो भी तो प्रायश्चित करके शुद्ध हो सकती है ?
रामपुरवाली -यह तो कोई पंडित ही बता सकता है। 
जनककिशोरी- इसमें किसी को रियायत थोड़ी हो सकती है ?
दमयंती     -    फिर भी सामाजिक बहिष्कार हर हालत में करना पड़ेगा। 
सन्नो की मां -और अगर इस बात पर गांव में दो गोल हो गए तो ?
दमयंती-   दस गोल हो जाएं, हमारा उमानाथ की मां से कोई संबंध नहीं होगा। इसी में गांव की भलाई है। 
                                       सनसनी।
                  अभी भी मन में शंका है ?
सन्नो की मां -बापूजी का इस बारे में क्या कहना है दीदी ? 
रामपुरवाली- कौन बापूजी ?
दमयंती        - अब तुम इसमें महात्मा गांधी को क्यें लाई ?
सन्नो की मां- वो इसलिए दीदी क्योंकि तुम अक्सर बापूजी की शिक्षा बताया करती हो न। इसीलिए
                        हमने पूछा ?
दमयंती       -    लेकिन इसी बीच क्यों पूछा ? 
रामपुर वाली- तो क्या महातिमा गांधी तक बात पहुंच गई ?
दमयंती   -   सन्नो की मां ! तू कहना क्या चाहती है ? उमानाथ की मां व्यभिचारिणी नहीं है ? 
                    पतिता नहीं   है ? भ्रष्टा नहीं है ?
सन्नो की मां -  दीदी, तुम कहती हो न, कि बापू ने कहा है कि हमको साफ-सफाई से रहना चाहिए।
दमयंती      -    तो ? बात को घुमा मत। तू तो ये बता कि इस चर्चा में बापू का नाम क्यों ले आई ??
सन्नो की मां-    मान लो दीदी, बापू के सामने इस मामले को लाया जाता, और उनसे कहा जाता कि 
                        उमानाथ की मां का फैसला करो, तो वो क्या कहते ?
रामपुर वाली -यही कहते और क्या ? आखिर बापू भी धरम-करम को मानने वाले आदमी हैं।
दमयंती      -   मैंने तो सुना है कि बापू कहते हैं कि पाप से घिना करो, पापी से नहीं।
                                  सनसनी। दम्मो नाराज होकर उठ पड़ती है।
दमयंती  -  बापू क्या कहते, क्या न कहते, ये वो जानें। पर यहां वही होगा जो मैं कह रही हूं। 
                    उमाकांत की मां का बहिष्कार। देवी का त्यौहार आ रहा है। पूजन में उसको साथ 
                   ले जाने की जरूरत नहीं है। न ही उसके यहां प्रसाद जाएगा न ही उसके यहां का प्रसाद
                   हमारे घर में आएगा। सन्नो की मां ! सुन रही हो ? मैं तो प्रतीक्षा कर रही हूं उमानाथ 
                   का। देवी पूजा में तो आना ही चाहिए उसे।
                                           सन्नो की मां को छोड़कर सभी जाते हैं। सन्नो की मां अंदर जाती है। 
                                           दुर्गापूजा का एक दृश्य जिसमें मुहल्ले में देवी मां की मूर्ति के सामने                                                                देवी नृत्य हो रहा है। नृत्य समाप्त होने पर प्रसाद वितरण होता है।                                                                  गौरी आदि कई औरतें हैं। 

गीत            -           कालिकाए एलौं तोरे द्वारए पूजन बेरिया
                              के चढ़ाबे अक्षत.चाननए केये फूल.कलिया
                              सेवक चढ़ाबे अक्षत.चाननए भगत चढ़ाबे फूल कलिया
                             के चढ़ाबे उजरा छागरए के छागर करिया
                             सेवक चढ़ाबे उजरा छागरए भगत चढ़ाबे छागर करिया
                             के चढ़ाबे गेरूए के चढ़ाबे अंचरिया
                              सेवक चढ़ाबे गेरूए भगता चढ़ाबे अंचरिया
                              कल जोरि मिन्ती करै छी हे माता
                               सदा रहब रछपाले हे कालिका

                                   दमयंती अपने घर में पूजा कर रही है। श्लोक आदि पढ़ चुकती है तभी                                                                 उमानाथ झोला लेकर आता है। पैर पड़ता है।
उमानाथ -पाय लागूं दादी।
दमयंती -कौन ? अरे उमानाथ ! कब आया भागलपुर से ? सीधे ही चला आ रहा है क्या ?
उमानाथ   -       तुम दिख गईं तो सोचा पहले तुमसे ही मिल लूं। 
दमयंती   -      बहुत अच्छा किया रे। बहुत अच्छा किया। पानी पिएगा ?
उमानाथ   -       नहीं दादी अब घर जाकर भोजन ही करूंगा। तबीयत तो ठीक रहती है न तुम्हारी ?
दमयंती   -  अरे मेरी तबीयत का क्या पूछता है ? हम तो पके आम हैं, कभी भी टपक सकते हैं। 
                    दीवाली के दिन ही तुम्हारे पिता की श्राद्ध होती है न ?
उमानाथ -     हां दादी। इसीलिए इसी समय आता हूं। पिता का श्राद्ध करूंगा और अगले ही दिन  
                     निकल भी जाऊंगा बहन के यहां। 
दमयंती   -        भाईदूज मनाने। बहुत लायक बेटा है तू। पिता का नाम रौशन कर रहा है।
                                   दमयंती गंभीर हो जाती है।
उमानाथ -   क्या बात है दादी, कोई परेशानी है ?
दमयंती  -      बबुआ, तू तो वहां भागलपुर में रहता है, साल में एक बार आता है। पर यहां तेरे घर 
                      में अच्छी हालत नहीं है।
उमानाथ -       हां, मां अकेली रहती है। चाचा का कोई भरोसा नहीं। समस्या तो है दादी पर मैं भी 
                      क्या करूं।  यहां तो कामधंधा है नहीं। नौकरी करना जरूरी है, और वो बाहर मिलेगी। 
दमयंती  -          यही तो परेशानी है। हे राम ! तू अपनी मां को भी वहीं ले जा।
उमानाथ   -  क्यों ? वहां मैं कहां रखूंगा ? मेरी तनख्वाह इतनी नहीं है कि मैं मां को भी वहां रख सकूं।
दमयंती   - (तैश में) तो फिर तू यहीं रह। नौकरी रहे या न रहे। क्योंकि मान-मर्यादा नौकरी से ज्यादा                                   जरूरी है। 
उमानाथ -   मान-मर्यादा ? मैं समझा नहीं।
दमयंती -  अरे अब कैसे बताऊं तुझे ?
उमानाथ -   बताओ दादी, तुम्हें मेरी कसम।
दमयंती-   अरे रे रे तूने तो कसम धरा दी ! अब तो बताना ही पड़ेगा। बबुआ, तेरी मां ऐसी कुलबोरनी                                 निकलेगी, इस बात का जरा भी पहले पता होता तो कभी मैं तेरे बाप की शादी तरकुलवा में 
                  नहीं होने देती। सोच तो ! नीलमाधव का वह विमल वंश कितना प्रसिद्ध है और एक 
                  विधवा ....... 
उमानाथ  -   क्या हुआ दादी ? आगे बोलो !
दमयंती -  ये बताते हुए मेरी जिह्वा को लकवा क्यों नहीं लग जाता। बेटा, तेरी मां गर्भवती हो गई थी !
उमानाथ  - क्या ?
दमयंती -  एक-दो नहीं, पूरे आठ महीने का गर्भ उसने गिरवाया है मायके में जाकर ! आठ महीने 
                   का पेट किसी से छिपा नहीं रहता ! पूरा गांव, बिरादरी सब थू-थू कर रहे हैं उसके ऊपर ! 
                   फिर भी उस  पापिनी ने शर्म नहीं किया। ऐसे बर्ताव करती है जैसे कुछ हुआ ही न हो। पूरी 
                   बिरादरी में नाक कट गई हमारी। कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहे हम। मैंने कहा था कि 
                    तेरी व्यवस्था मैं यहीं करा देती हूं। लेकिन उसने नहीं माना। चली गई मायके। वहां भी 
                   नाम रोशन कर आई है अपने मां बाप का ! बेटा, तू इस बार अपने बाप का श्राद्ध करेगा न, 
                   देख लेना, कोई नहीं आएगा भोजन  करने। उसके कारण सबने तुम्हारे परिवार का बहिष्कार 
                   कर रखा है ! (दोनों हाथ  उठाकर नाटकीय ढंग से) हे भगवान, नीलमाधव के वंश पर 
                  कालिख लगाकर तूने ठीक नहीं किया ! 
                                              उमानाथ तैश में झोला उठाकर चला जाता है। दमयंती मुड़ती है तो उसे                                                             नहीं पाती।
                          बेचारा !
                                                     कुटिल मुस्कान के साथ अंदर जाती है।  
                                                गौरी का घर : बाहर से गौरी आती है। वह परेशान दिख रही है।
गौरी      -      उमानाथ अभी तक नहीं आया ! अपने बेटे को देखने के लिए तरस रही हूं और ये 
                   दम्मो फूफी के साथ दरबार करने लगा ? हे भगवान ! वो जरूर उसे मेरे खिलाफ 
                   भड़काएंगी। न जाने कौन-सा जहर भर रही होगी मेरे खिलाफ। क्या करूं, कैसे उसको
                  बुलाऊं जल्दी। रत्ती भी नहीं है कि उसे भेजकर बुलवा लूं ! मैं खुद जाऊंगी तो अच्छा नहीं 
                   होगा। हे दुर्गा मां, अब तू ही मेरी रक्षा कर ! उसके मन में मेरे लिए नफरत न पैदा करना! 
                   कहीं ऐसा न हो कि मुझसे मिले बिना ही लौट जाए। 
                                                     दरवाजे पर खट-खट होती है। वह कांप उठती है। जाकर दरवाजा                                                                         खोलती है। आगे-आगे गौरी आती है। पीछे-पीछे उमानाथ।
                  कैसा है तू ? ....... मां के पैर पड़ना भूल गया क्या ? ..... भूखा होगा, खाना बना दूं जल्दी से ?                                 .......... तू कुछ बोलता क्यों नहीं ?
                                                                  उमानाथ जलती निगाहों से मां की ओर देखता है। 
                  क्या बात है बेटा ? तू मुझे ऐसे क्यों देख रहा है ? मैं कब से बाट जोह रही थी कि तू आए। बार-                               बार गली की ओर देखती थी। तू दिखा भी था। फिर कहां चला गया था बेटा?
उमानाथ  -     बंद करो ये ढोंग !
                                                                 झोंटा पकड़ लेता है। लातों की बारिश कर देता है। 
उमानाथ  -  ये सब करने से पहले तू मर क्यों नहीं गई ? तू मां नहीं है, राक्षसी है राक्षसी ! रख ले 
                   अपना  घर ! मैं जाता हूं, तालाब में डूबने और तब तू मौज मारती रहना !
गौरी    -             उमानाथ ! मैं तुझे नहीं जाने दूंगी ! (उसके पैर पकड़ कर घिसट जाती है।) भगवान 
                       के लिए मत जा ! 
उमानाथ  -    छोड़ मुझे कुलटा ! तूने ये सब करने के पहले मेरे बाप को याद नहीं किया ? 
                    मेरी सूरत नहीं दिखी तुझे ? कुल की मर्यादा का खयाल नहीं आया ! मैं कौन-सा मुंह 
                    लेकर दुनिया के  सामने जाऊं ! सब कहते हैं तेरी मां । तूने मुझे मरने के अलावा और 
                    कहीं का नहीं छोड़ा ! गले में घड़ा बांध कर डूब मरूंगा तभी मुझे शांति मिलेगी।
गौरी    -          नहीं भैया। कोने में कुल्हाड़ी रखी है, उठा ला, मुझे खंड-खंड कर डाल ! मैं खुद इसीलिए 
                     नहीं डूब मरी कि तेरे हाथों सद्गति मिलेगी तो मेरे सारे कुकर्म धुल जाएंगे। 
                                        अपने को छुड़ा कर उमानाथ बीच घर में बैठकर फूट-फूट कर रोने लगता है। 
उमानाथ  -  किस मां के गर्भ से मुझे जन्म दिए हो भगवान ! ये सब सुनने से पहले मुझे उठा 
                  क्यों नहीं लिया ? इससे बड़ा दुःख क्या हो सकता है कि बेटे को पता चले कि उसकी मां 
                  दुष्चरित्रा है। संदेह हो जाता है उसे स्वयं की भी पहचान पर। कहा जाता हूं कि मैं वैद्यनाथ 
                  का पुत्र हूं पर ! कौन जानता है ? हो सकता है कि मैं भी किसी पाप की ही पैदाइश होऊं ! 
                  घिन आने लगी मुझे अपने-आप से। नजर नहीं मिला पाऊंगा किसी से अब। गिर गया हूं। 
                   पतन हो गया  मेरा। 
                            गौरी, उमानाथ के सिर पर हाथ रखती है।
                  मत छुओ मुझे ! 
                                      मां भी रोते-रोते उसके पास जाकर बैठ जाती है। देर तक दोनों रोते रहते हैं।                                                         रतिनाथ आता है। दोनों को रोते देखकर सहम जाता है। मां उठती है। 
                  रत्ती ! तूने सबको खाने के लिए बुलौआ दे दिया था न ? कोई आया क्यों नहीं खाने ?
रतिनाथ  - (रुंआसा) मुझे लगता नहीं कि कोई आएगा। 
                           उमानाथ उठता है। रतिनाथ को सीने से लगा लेता है। 
उमानाथ  -  कोई बात नहीं। नहीं आते तो न आएं। हम सब हैं न ! हम भोजन करके श्राद्ध को पूरा करेंगे।                              आखिर मेरे पिता की बरसी है। बचा हुआ खाना बांध देना, मैं कहीं दूर जाकर गरीबों को खिला                             दूंगा, और उधर से ही बहिन के यहां चला जाऊंगा। भूखा है तू ? ....... चलो खाना लगाओ।                                    चाचा कहां गए ?
गौरी       -   पता नहीं।
                                    उठती है अंदर जाती है। शेष भी जाते हैं। गायक कलाकार मंच पर आकर गाते                                                     हैं।

गीत     -                  आर गंगा पार जमुनाए बिचे कदम्ब केर गाछ री
                               ताहि चढ़ि.चढ़ि कागा बाजयए कागक बोल अनमोल री
                               देबौ रे कागा सिर के पागाए उड़ि जाउ जहाँ कंत री
                               कागा पांखि दुई हंस लीखबए सोने मढ़ायब दुनू ठोर री
                               सासु हे दुख कहब ककराए बेटा अहांक परेदश री
                               परदेश बालमु धनी अकेलीए रिमझिम बरिसतु आजु री
                               गाइक गोबर चिकनी माटीए रानी निपथु मन्दीर री
                               ताहि चढ़ि कऽ राजा सूतलए रानी बेनियां डोलाय री
                               सुख दुख रानी कहय लगलीए राजा तरसि कय बोल री

                                       वाराणसी की एक गली। लोगों का आना-जाना। आपसे में जय बाबा विश्वनाथ !,                                              भोले ! आदि बोलना, जयनाथ का त्रिपुंडधारी पंडित चक्रधारी के साथ बातचीत                                                   करते हुए प्रवेश। जयनाथ के हाथ में लोटा है और कंधे पर गीली धोती।
जयनाथ -           बड़ा ही विलक्षण और विचित्र स्थान है काशी पंडितजी।
चक्रधारी   -         अच्छा ! वो कैसे महोदय ?
जयनाथ   -        ऐसा लगता है कि मानो हिंदुत्व और भारतीयता के सारे गुण यहां बाबा विश्वनाथ की शरण                                में दुबके पड़े हैं। 
चक्रधारी   -           ह ह ह....  इससे पहले भी काशी आए हो ?
जयनाथ   -           एक बार। गंगा स्नान कर बाबा के दर्शन किए और वापस लौट गया। 
चक्रधारी  -           और इस बार ?
जयनाथ   -          तीन महीने से रुका हूं। नेपाली खपड़ा मुहल्ले के तारा भगवती मंदिर में। 
चक्रधारी -            काशीवासी बनकर ही रुके होगे ?
जयनाथ  -            सही कहा। दूसरों के लिए मना जो है। वास्तव में मंदिर का प्रबंधक मेरा दूर का संबंधी है।
चक्रधारी    -         अच्छा है। अच्छे शब्दों के चुनाव का अभ्यास करते रहो, परंतु एक सुझाव है। युवा हो।                                        तनिक संभलकर रहना। रांड़, सांड़, सीढ़ी, सन्यासी, इनसे बचे तो सेवै काशी।
जयनाथ   -             ह ह ह ह .... जय बाबा विश्वनाथ की !
                                                चक्रधारी जाता है। 
                    विद्या भी विजया की तरह कितनी मादक होती है। काश मैं भी कुछ पढ़ लिया 
                           होता तो इन श्रीमान की तरह त्रिपुंड धारण कर मैं भी पंडित कहलाता।  
                                                                         चूड़ीवाला चूड़ी बेचते हुए आता है।
चूड़ीवाला   -          चूड़ी ले लो ! रंगबिरंगी चूड़ी ले लो ! 
जयनाथ     -         विधवाओं के मुहल्ले में चूड़ियां ! कौतुक हो रहा है।
                                                    चूड़ीवाला सुनकर मुंह बिचकाता है। दो विधवाएं मैथिल भाषा में                                                                        चूड़ी का मोलभाव करने लगती हैं।
विधवा 1    -           न हो बबुआ, चुड़िया कैसे दिये ?
चूड़ीवाला   -            अरे चुड़िया सब एक्कै दाम थोड़ौ बा ? अलग-अलग दाम बा !
विधवा 2    -            अरे तुम तो ये हरे रंग वाली के दाम बतावो।
चूड़ीवाला   -             ये ! ये चार आने में बारा है। चार आने से कम नहीं होगा।
जयनाथ    -            ये तो अपने तरफ की भाषा बोल रही हैं। अ सुनिए !
विधवा 2    -            कहिए।
जयनाथ     -            शुभंकरपुर की एक मुसम्मात हैं, वो क्या यहां रहती हैं ? 
विधवा 2     -            न न, शुभंकरपुर की कोई नहीं रहती यहां।
                                       विधवा 1 ध्यान से देखती है।
विधवा 1    -             आप कहां के रहने वाले हैं ?
जयनाथ    -              शुभंकरपुर के।
विधवा 1    -              अच्छा ! मैं परसौनी की रहने वाली हूं। शुभंकरपुर और परसौनी, दोनों पड़ोसी हैं न।
जयनाथ    -              हां-हां क्यों नहीं। तब तो हम और आप भी पड़ोसी ही हुए। है न ?
विधवा 2   -                हां हां बिल्कुल।
विधवा 1    -               चलिए ऊपर चलिए। हमारी कोठरी को अपनी चरण-धूलि से पवित्र करिए।
जयनाथ    -               आपके यहां ?
                                    जयनाथ सोच में पड़ जाता है।
विधवा 2    -               क्या सोच रहे हैं ? चलिए न !
जयनाथ     -              हां हां चलिए।
                                     तीनों जाते हैं।
चूड़ीवाला    -                 पंडितजी विधवा के घर जा रहे हैं ! कौतुक की बात तो ये भी है ! चूड़ीवाला !
                                     विधवा 1 के साथ जयनाथ प्रवेश करते हैं।
विधवा 1      -               धन्य भाग हमारे जो हमारी माटी के अतिथि पधारे। गांव कितने दिनों से नहीं गए ?
जयनाथ    -                तीन महीने से। 
विधवा 1   -                तीन महीने से ? ओहो ! क्या देख रहे हैं ?
जयनाथ     -              काफी अच्छा मकान है आपका।
विधवा 1   -         मेरे मत्थे नहीं है ! इस मकान का किराया अपने ही जिले के एक श्रीमान देते हैं। हम                                           विधवाओं पर उनकी विशेष कृपा रहती है। लोटा रख दीजिए, और धोती इधर दीजिए।
जयनाथ   -                 क्यों ? 
विधवा 1   -                  फैला देती हूं, जल्दी ही सूख जाएगी। छुड़ा थोड़ी लूंगी ? बैठिए न।
जयनाथ     -        बैठने को बैठ तो जाऊंगा लेकिन तारा मंदिर में ठीक ग्यारह बजे भोजन की घंटी बजती                                     है। 
विधवा 1     -                अभी दस भी न बजे होंगे। तब तक ये सूख जाएगी। 
                                 धोती लेकर वह अंदर जाती है।
जयनाथ     -     विधवाओं के बारे में जैसा मैंने सुना था, उससे यह अलग लगती है। जीवन को उपेक्षा के                                     योग्य नहीं समझती। अच्छी बात है ये। 
                                 हाथ में दोना लेकर आती है।
विधवा 1    -               ये लीजिए। पेड़ा खा लीजिए। अच्छा नहीं लग रहा है यहां ?
जयनाथ   -       क्यों अच्छा नहीं लग रहा है ? तीन महीने से बाहर हूं। अचानक अपने गांव-पड़ोस के                                           आदमी से मुलाकात हो जाना तो सौभाग्य की बात है।
विधवा 1   -                 धन्य भाग हमारे।
                                खा चुके तो पान प्रस्तुत होता है।
जयनाथ    -                 वाह ! मगही पान ! 
                                   पान भरकर।
                          ऐसा है कि धोती मैं बाद में ले जाऊंगा, अभी मुझको जाने दीजिए। 
विधवा 1   -                अब आठ बजे रात से पहले मैं मिलूंगी भी नहीं। 
जयनाथ    -               क्यों ?
विधवा 1   -     एक खत्री बाबू हैं जिनके तीन बच्चे हैं। बेचारे की औरत पिछले साल चल बसी। उनके                                          अबोध बच्चों की देखरेख मैं ही करती हूं। मेरा नाम सुशीला है। 
जयनाथ    -               मेरा नाम जयनाथ।
विधवा 1    -               धोती आपकी थोड़ी देर में पहुंच जाएगी। उसकी चिंता न करें। ठीक है .... प्रणाम !
                                                     सुशीला अंदर जाती है। जयनाथ उसकी मोहक अदा से चमत्कृत होता                                                                हुआ सामने की ओर आता है। 
जयनाथ   -      कौन थी ये ? और किस लोक में ले गई मुझको ? एक महीने प्रयाग और तीन महीने                                           काशी  में रहते हुए नारी से सत्संग नहीं हुआ। संभवतः इसीलिए इसका सामीप्य 
                         मन की गहराई में बैठ गया है। कौन है, कहां की है, पूछने का साहस नहीं हुआ। परंतु 
                         मेरी गीली धोती अभी यहीं है। वह अवश्य एक बहाना बनेगी, हमारे अगले सत्संग 
                         का। भोजन का समय समाप्त होने को है, लेकिन मेरी भूख-प्यास सब मिट गई है !
                                         एक बूढ़ी औरत आती है।
बूढ़ी औरत    -          कुछ बाहर का खा आए क्या ?
जयनाथ       -      बस थोड़ा-सा। चार पेड़े। मैथिल विधवा निवास में .....
बूढ़ी औरत      -        सुशीला नाम है उसका। तुम्हारे ही तरफ की है। बालविधवा हो जाने के बाद जेठानी                                           और  ननद के दुर्व्यवहार से तंग आकर नैहर में रहने लगी। वहां भाभी से 
                              खटपट हुई तो भागकर काशी आ गई। पहले एक घाटिया महराज के पल्ले पड़ी, 
                              और अब एक खत्री दुकानदार के घर की मालकिन बनी हुई है। खूब चुगती है, 
                             खूब छितराती है। भाई और चाचा आते हैं तो खूब माल देकर विदा करती है। 
                             जितना मालूम था बता दिया, आगे तुम जानो।

                                                          बूढ़ी औरत जिधर से आती है, उधर को ही चली जाती है। जयनाथ                                                                     के चेहरे पर मुस्कान उभरती है। 
जयनाथ   -    मुझे भी ऐसी ही कबूतरी चाहिए। खूब चुगने वाली, और खूब छितराने वाली। 
                                                   प्रकाश के रंग में परिवर्तन होता है और वह पीछे की ओर जाता है                                                                     जहां सुशीला उससे मिलती है। दोनों प्रेमालिंगन-बद्ध होते हैं।                                                                             इसके बीच कलाकार एक ओर आकर गीत गाते हैं। 

गीत      -       एहन सन धनवानक नगरी मे बाबा
                            बना देलहुँ भिखारि
                            नहि मांगल कैलासपुरी हमए झाड़ीखंड ओ बाड़ी
                            नहि मांगल विश्वनाथक मंदिरए ने हम महल अटारि
                            बतहबा बना देलौँ भिखारि
                            एक मोन होइए जटा तोड़िए नोचि लितहुँ सभ दाढ़ी
                            बसहा बरद के डोरी धय मारितहुँ पैना चारि
                            बाबा बना देलौँ भिखारि
                             दोसर मोन होइएए अहाँके बिकोटितौँ धऽकऽ मरम पर हाथ
                             से अपने वियाहलौँ अनपूर्णासँए देखलौँ नयना चारि
                             बाबा बना देलौँ भिखारि

                                                    गायक कलाकार जाते हैं। सुशीला और जयनाथ अग्र मंच पर आते हैं। 
सुशीला - अच्छी रही पिक्चर न ?
जयनाथ-  हां।
सुशीला - पहले किसी औरत के साथ गए हो पिक्चर देखने ?
जयनाथ - नहीं। 
सुशीला - क्यों ? पत्नी को भी नहीं दिखाई ?
जयनाथ - पत्नी कई बरस पहले दिवंगत हो चुकी है।
सुशीला - ओह ! तभी तो। ..... कैसा लगा ?
जयनाथ - बताया न, अच्छी लगी पिक्चर।
सुशीला - नहीं-नहीं। मेरे साथ पिक्चर देखना !
जयनाथ - अ...... 
सुशीला - बोलो ! पूरे समय कसमसाते काहे रहे ?
जयनाथ - वो तो बस.....
                                             सुशीला हंसती है। दोनों बैठ जाते हैं। सामने गंगा नदी। सुशीला गंभीर हो                                                           जाती है।
सुशीला  -   जयनाथ बाबू ! सामने देखो ! गंगा नदी बह रही है। कहूं तो बहता पानी ही धार कहलाता है।                               चाहे गंगा हो चाहे नर्मदा। पानी का बहना ही उसकी जिंदगी है। देखो न, सुबह-शाम हजारों                                लोग  न जाने कहां-कहां से आते हैं, और इसकी बहती धार में डुबकी लगाके तर जाते हैं। 
                  मगर तुम जिस जाति और समाज में पैदा हुए हो वह जिंदा नहीं, मुर्दा धार है, वह छाड़न है। 
                  वहां कोई तर नहीं सकता। चाहे जितनी डुबकियां लगा लो। मन तड़पता है लौटने का, फिर 
                  भी नहीं लौट सकती। क्योंकि वह मुर्दा धार मुझे कभी तार नहीं सकती। (संयत होती है।) 
                  फिर भी मुझे मिथिला की उस मिट्टी के लिए बहुत मोह है।
                                     जयनाथ न समझकर भी समझने का उपक्रम करता है।
जयनाथ - अब तो बता दो। उस धनी सज्जन का नाम। जिसके कारण तुम इतनी ऐश्वर्यमयी हो ?
                           सुशीला जयनाथ के स्तर से निराश होती है।
सुशीला  - हुंह ! क्या करोगे जानकर ? जयनाथ बाबू, उस धनी सज्जन का नाम मैं तुम्हें नहीं 
               बताऊंगी। पांच-पांच रखैलें रखकर भी विधवाओं की सूनी कलाइयों को ललचाई निगाहों 
               से देखा करता है। उसका नाम जानकर क्या करोगे ? क्या महत्व है उसके नाम का ? तुम 
               तो बस मुझे देखो ! ताड़ी पीने वालों को देखा होगा न ? मेरा भी वही हाल है। सिगरेट पी 
                सकती हूं तुम्हारे सामने ?
                          सुशीला सिगरेट निकालकर पीने लगती है। जयनाथ हतप्रभ।
जयनाथ - चलो, कोई भी हो, तुम्हारी कलाइयों को तो चूड़ी से भर दिया उसने।
सुशीला  -     हुंह .... मेरे जितने मित्र बनते हैं, उतनी बार मैं चूड़ियां पहनती हूं, और फोड़ती हूं। तुम भी                                    पहना  सकते हो। ..... आओ चलें ! 
                           सुशीला जाती है। जयनाथ अग्रमंच पर आता है। 

जयनाथ  -       बाबा विश्वनाथ की नगरी में पहले तो गंगा नहाता रहा, प्रसाद खाता रहा। पर उसके 
                        बाद  प्रसाद पहले खाने लगा और गंगा बाद में नहाने लगा। लेकिन पानी का बहना 
                        ही तो जिंदगी है। जल्दी ही ऊब गया तो सोचा अब चलूं कोई और घाट देखूं। इसी बीच 
                        एक बार शुभंकरपुर आ गया। ये सोचकर कि देखूं रतिनाथ की चाची का क्या हाल है। 
                       यहां आया तो देखा कि चाची के किस्से के बाद न जाने और कितने किस्से हो गए। 
                        संतोष पा कर गांव में ही रहने  लगा, और वहीं की एक विधवा के प्रेम में पड़ गया, 
                       जिसकी राजदार और तो कोई नहीं, हां, रतिनाथ की चाची अवश्य हो गई थी।   
                         गौरी आती है। गौरी अब जयनाथ के प्रति अन्यमनस्क है।
गौरी   -           शादी कर लो बाबू। एक भले आदमी की जिंदगी गुजारो अब। सेंध लगाने की फिराक में भीतों                              की ओर घूरते रहने वाला चोर चैन से कभी नहीं रहता। 
जयनाथ  -      हा हा हा....। कैसी सलाह दे रही हो तुम ? शादी कर लूं तो संसार मुझे क्या कहेगा ? लड़का                                  सयाना हो रहा है, शादी तो उसकी होनी चाहिए, मेरी थोड़ी ?
गौरी    -       लड़के के खाने-पीने से क्या तुम्हारी भूख-प्यास मिट जाएगी ?
जयनाथ -  तुमने क्या अमृत पी लिया है ?
                         गौरी गंभीर हो जाती है।
गौरी       -          किसी भी युग में स्त्री को अमृत पीने का सुयोग नहीं मिला बाबू। पुरुष को अमृत पिलाकर                                    वह  स्वयं विषपान ही करती आई है। जाने दो, तुम यह सब क्या समझोगे ?
                                                         जयनाथ गौरी को ध्यान से देखता है। 
जयनाथ   -        देखता हूं कि रत्ती के लिए अब तुम्हारे मन में चिंता कम हो गई है। उसे मोतिहारी क्यों                                      जाने  दे रही हो ? 
गौरी    -           अब वो छोटा बालक नहीं रहा। अच्छी पढ़ाई के लिए कहीं जाना चाहता है तो उसे रोकना नहीं                              चाहिए। 
जयनाथ -  यह भी देख रहा हूं कि मेरे लिए भी अब तुम्हारे मन में पहले जैसा अनुराग नहीं रहा?
गौरी    -           तुमने भी तो अपना मार्ग ढूंढ़ लिया है। जयनाथ, सच पूछो तो मेरे लिए तुम एक बीमार बच्चे                              से ही थे, जिसे बहुत बड़ी कीमत देकर पाला है मैंने। 
                                   जयनाथ गहरे मर्म को नहीं समझ पाता।
जयनाथ  -           आजकल ताराचरण बाबू बहुत आते हैं तुम्हारे पास ?
                                    गौरी को आघात महसूस होता है।
गौरी      -        वो आकर मुझे अखबार सुनाते हैं। किसान-सभा के लिए मैं भी चंदा देती हूं। लेकिन कोई                                     फायदा नहीं। गरीबों के स्वराज और धनिकों के स्वराज में आकाश-पाताल का अंतर है। पता                                नहीं ये कब मिटेगा। अब तुम जाओ, अंधेरा होने वाला है।
                                जयनाथ जाता है।  अंधेरा। पुनः प्रकाश।
                                                  दम्मो फूफी की सभा। औरतों के हाथ में चरखा चल रहा है। सन्नो की                                                                मां भी है।
रामपुर वाली    -   राम राम राम ! बड़ा अंधेर है फूफी !
दमयंती         -      क्या हो गया ?
रामपुर वाली - कहां जयदेव एक ज्योतिषी। कितना बड़ा नाम उनका, भला बताओ, अपने लड़के का ब्याह                                 एक  बंगाली की लड़की से किए दे रहे हैं !
जनककिशोरी -      सुना है लड़की का बाप बंगाली तो है, पर वो अपनी बिरादरी का भी नहीं है।
रामपुरवाली    -   हां हां वो क्रिस्तान है क्रिस्तान।
जनककिशोरी  -     ये क्रिस्तान क्या होता है ?
रामपुरवाली  -     अरे वो मंदिर ओंदिर नहीं जाते। वो कहां जाते हैं हां, गिरिजाघर।
दमयंती        -      बहुत पतन हो रहा है हमारे समाज का।
रामपुरवाली  -     वो अंडा खाता है अंडा !
दमयंती      -       हम किसी को ब्याह करने से नहीं रोक सकते।
जनककिशोरी  -    माने तुम ये कहती हो कि ये शादी हो जानी चाहिए ?
दमयंती        -     ये मैंने कब कहा ? मैंने ये कहा कि हम किसी को ब्याह करने से नहीं रोक सकते। लेकिन                                     ब्याह के बाद जो कुछ रसम होती है, उसको तो रोक ही सकते हैं न !
रामपुरवाली -    वो कैसे ?
दमयंती   -   ब्याह करके लड़का जब आएगा, और अगर जयदेव ने उसे अपने घर में घुसने दिया तो                                      जयदेव के अन्न-जल का बहिष्कार ! हममें से जो भी ग्रहण करेगा, वो गोमांस खाएगा। ऐसा                                निर्णय हो चुका है।
रामपुरवाली  -  पर चिंता की बात ये थोड़ी है फूफी।
दमयंती        -    तो क्या है ?
रामपुरवाली -   मिठाई-सिठाई तो जरूर आएगी।
दमयंती      -     तो ?
रामपुरवाली  -  सुना है बंगाली मिठाई बहुत अच्छी होती है।
दमयंती        -     मुंह में पानी आ रहा है ?
रामपुरवाली  -  मेरे नहीं। बच्चों के जरूर आएगा। वो सब जरूर पहुंच जाएंगे। 
दमयंती -    हुआ भ्रष्ट ! सारा गांव इन मिठाइयों के मोह में पड़कर किरिस्तान हो जाएगा। कुछ भी हो,                                  इन बाप-पूत दोनों को अपमानित करना ही पड़ेगा।
रामपुरवाली  -   पर करेंगे कैसे ?
दमयंती      -        सोच रहे हैं। हमीं भर नहीं, गांव के सभी बड़े बुजुर्ग यही सोच रहे हैं। 
                                       सन्नो की मां हंस पड़ती है।
                     किस बात पर हंसी आ गई तुझे ?
सन्नो की मां   -   कुछ नहीं फूफी।
दमयंती        -      कुछ तो।
सन्नो की मां -     यही सोच रही हूं कि जयदेव के बेटे की शादी से एक काम तो हुआ।
रामपुरवाली   -   क्या ?
सन्नो की मां  -    उमानाथ की मां को रिहाई मिल गई !
                                               दमयंती की त्यौरियां चढ़ती हैं। सभी जाती हैं। एक तरफ से भोला पंडित                                                            आता है। 
भोला पंडित-    अरे उमानाथ की मां ! उमानाथ की मां !
                                   अंदर से जयनाथ, रत्ती, और गौरी आते हैं।
                 अरे देख ! उमानाथ ने तुम्हारे लिए मनीआर्डर भेजा है। पूरे छिहत्तर रुपिया आठ आने का।  
गौरी       -            इतने रुपए ? क्यों भेजे उसने ?
भोलापंडित - संदेश में लिखा है - पिता जो जमीन गिरवी रख के चले गए थे, उसे छुड़ाने के लिए। 
जयनाथ      -    लेकिन उसने मनी आर्डर मेरे नाम से क्यों नहीं भेजा ?
भोलापंडित- अपनी-अपनी साख है बाबू। तुम पर भरोसा न रहा होगा।
रतिनाथ      -     चाची ! अब अपनी जमीन छूट जाएगी न !
गौरी            -     हां रत्ती। 
जयनाथ   - चलो कुछ भी हो, उमानाथ ने ये अच्छा काम किया। बाबा विश्वनाथ मेरे भतीजे पर दया-दृष्टि                            बनाए रखें !
भोलापंडित -ऐसा ही होगा !! तुम भी बनाए रखना। 
                              जयनाथ और भोला पंडित चले जाते हैं।
गौरी           -         रत्ती !
रतिनाथ     -       हां चाची।
                              प्रकाश बिंब गौरी पर।
गौरी         -   उमानाथ को चिट्ठी लिख दो। लिखना - स्वस्ति सकल मंगलालय चिरंजीवी श्री 
                   बबुआ उमानाथ को गौरी का शुभ आशीर्वाद पहुंचे। अत्र कुशलं तत्रास्तु। आगे हाल-
                   समाचार यह है  कि तुम्हारे भेजे हुए पैसे से अपना खेत गहन से छूट गया है। बेटा, 
                   दो साल से तुम घर नहीं आए हो। कसूर मेरा ही है, मगर इस तरह सन्यासी बनने से 
                   तुम्हारा काम नहीं चलेगा। मुझे कब तक यों अकेली रखोगे ? देह मेरी दिन-प्रतिदिन 
                   दुर्बल होती जा रही है। तुम ब्याह करते, बहुरिया आती फिर मैं निश्चिंत होकर 
                   काशी-प्रयाग हो आती। इति।
                            दूसरे प्रकाश-बिंब पर उमानाथ आता है।
उमानाथ  -    तुम्हारी चिट्ठी मिली मां। परंतु मैं अभी ब्याह नहीं करूंगा। ब्याह में पैसा लगता है। धीरे-धीरे                               पैसे जमा कर रहा हूं। पांच सौ हो जाएगा तभी ब्याह करूंगा। 
गौरी       -      तूने भी ठीक कहा। ब्याह में इतना तो खर्च लगेगा ही। लेकिन तू फिक्र न कर। मैं तेरी गृहस्थी                            सजा दूंगी। फूल की दो थालियां, दो लोटे और दो गिलास ले ली हूं। अतिथियों को बिठाने के                                लिए दो छोटे-छोटे कंबल भी। 
                         दोनों अपनी-अपनी ओर चले जाते हैं। रतिनाथ आगे आता है।

रतिनाथ  -     उमानाथ भैया ने जब चाची के लिए पैसे भेजे तो मेरी भी इच्छा होने लगी कि मैं 
                      कितनी जल्दी  बड़ा हो जाऊं और बड़े शहर में जाकर नौकरी करूं। और उसके बाद
                      पैसा मैं भी भेजूं।  पर अभी तो मैं पंद्रहवें में ही प्रवेश कर रहा था। कितना समय लगेगा, 
                      मुझे बड़ा होने में। एक दिन क्या हुआ कि मेरे पिता माननीय जयनाथ बाबू उछलते हुए 
                      एक दिन घर आए ....

                      रतिनाथ पीछे बैठ जाता है। बाहर से जयनाथ आता है।
जयनाथ  -         उमानाथ की मां ! उमानाथ की मां !
गौरी       -             क्या है ?
जयनाथ  -   देखो, अब मैं कुछ भी सुनने वाला नहीं हूं। तुम्हें मालूम है न कि बड़हड़वा के पुरोहित की 
                    आठ साल की लड़की के लिए मैं उनसे चार सौ रुपिया वरेच्छा ले चुका हूं ? पूरे एक साल 
                    हो गए हैं। रत्ती का ब्याह बड़हड़वा में ही होगा, अब मैं निश्चय कर चुका हूं। कन्या क्या है 
                    साक्षात गंधर्विणी है! चार सौ रुपए और देंगे। पढ़ने का खर्च ऊपर से। जब चाहोगी, गौना 
                    कराकर बहू ला दूंगा।
गौरी    -        चुप रहो ! महाजन बनने की धुन में यही सोचा करते हो ? इस तरह मैं तुम्हें रत्ती का गला 
                   नहीं काटने दूंगी। तुम्हारे लिए वह खिलौना भले हो, मेरे लिए वह कलेजा है। उसके साथ
                   खिलवाड़  मत करो। अभी वह मोतिहारी पढ़ने जा रहा है। एक रोज दरभंगा जाकर उसके 
                   लिए कपड़ा-जूता खरीदवा दो। आखिर शहर जा रहा है, कुछ अच्छे कपड़े-वपड़े तो होने 
                   चाहिए उसके पास !
                           गौरी बैठ जाती है। जयनाथ आगे आता है।

जयनाथ -    उमाकांत की मां की सलाह पर मैं रत्ती को लेकर दरभंगा गया। जीवन में पहली बार 
                   संतान के प्रति ममता का अनुभव किया। पैर नपवाकर जूता खरीदे, देह नपवाकर दर्जी से 
                   कमीज  सिलवा दी। मुझे लगा कि वह भी काफी खुश हुआ है। और वो दिन आ गया जब वो 
                  पढ़ाई करने के लिए घर से पहली बार बाहर निकला। खाना-पीना करके कुलदेवता को प्रणाम 
                  करके वह अपनी गठरी को लेकर चल दिया।

                                         गठरी लेकर तैयार रतिनाथ और आंचल में अपनी रुलाई को छुपाती                                                                 गौरी। रतिनाथ ने नए जूते हाथ में ले रखे हैं। गौरी रो उठती है। जयनाथ                                                            भी भावुक होता है।

गीत - ना जा रे बबुआ छोड़ के गांव !
घिवही आमा तुझे पुकारे
बांस का जंगल तुझको निहारे
तालाब, बूढ़ा पीपल टोके
मौलसिरी का पेड़ ये रोके
ना जा रे बबुआ छोड़ के गांव ....

                                                  रतिनाथ जाता है। ताराचरण आता है। उसके हाथ में अखबार है।

ताराचरण  -       जब बच्चे अपना घर-द्वार छोड़ के बाहर शहर को जाते हैं। तो घर ही नहीं, पूरा 
                        वातावरण ही भावुक हो उठता है। क्योंकि वह उनके मन की कोमलता की आखिरी 
                        छवि होती है। मैं ताराचरण। यहीं शुभंकरपुर में ही रहता हूं। अखबार रोज पढ़ता हूं। 
                        जिनको रुचि होती है उनको सुनाता भी हूं। देश में महात्मा गांधी का आंदोलन चल 
                        रहा है परंतु मुझे आंदोलन से  नहीं किसानों की समस्या से ज्यादा लगाव है। आपको 
                        बताने की खबर ये है कि शुभंकरपुर के लिए ये सावन मौत का पैगाम लेकर आया। 
                        मलेरिया का ऐसा प्रकोप शायद ही पहले कभी हुआ रहा हो। लोग पटापट मरे। भोला 
                        पंडित उन्नीस दिन तक बुखार में उबलकर स्वर्ग सिधार गए। दम्मो फूफी भी चपेट 
                        में आ गई। डाक्टर-वैद कुछ काम न आया। काम आई सिर्फ उमानाथ की मां। बेचारी 
                        ने जी-जान से सेवा की फिर भी दमयंती नहीं बची। फूफी की सारी जायदाद भतीजे के 
                        हाथ आई। उमानाथ की मां को भी दो दिन तक बुखार आया मगर जल्दी ही ठीक हो 
                        गई। मैंने बड़ी कोशिश की कि हमारे नेता, इस मामले में कुछ  करवाएं मगर उनके लिए 
                        तो इस समय चिंता के विषय ये है कि हिटलर आधे से अधिक  यूरोप को जीत कर आगे
                       क्या करेगा। सबकुछ किसी तरह से चल ही रहा था कि तभी एक दिन जयनाथ झोराझंडी 
                       लेकर शुभंकरपुर से निकल पड़े। 

                              जयनाथ और गौरी आते हैं। गौरी काफी कमजोर और बीमार है।
गौरी       -             कहीं जा रहे हो क्या ?
जयनाथ   -    जाना ही पड़ेगा। भांजे ने बुलाया है। भागलपुर बार-बार पेशी में वो कैसे जाएगा ? 
                      उसकी मदद  तो करनी ही पड़ेगी न ? चिंता मत करो, कृष्णाष्टमी तक लौट आऊंगा। 
                      तुम किसी काम का अंदेशा मत करना !
गौरी         -         समूचा गांव भट्ठी पर चढ़ा हुआ है और तुम ... ? तुम्हें गांव की और हमारी चिंता 
                         नहीं है?
जयनाथ    -       नहीं-नहीं उमानाथ की मां। ऐसा क्यों कहती हो ? जी हमारा यहीं टंगा रहेगा। 
                         यहीं तो सबकुछ है हमारा। बाप-दादों की जायदाद है। ये मत समझना कि इस 
                         मिट्टी से मोह नहीं है मुझको। 
                                 जयनाथ मिट्टी उठाकर माथे पर लगाता है। चला जाता है। 

गीत        -            चंदा जे उगलय झलामली रे दइया
                          उगिकय छपित नहिं होइवै
                         कथि संयम झंपैते चंदवा रे दइया
                         कथियहिं हम झंपैबय आठों अंग
                        बदरी झंपैतय चंदबा रे दइया
                         पटुकहिं झंपैबय आठों अंग।

                                                        गौरी तकली कातने लगती है। ताराचरण आता है।
ताराचरण   -          उमानाथ की मां ! सूत-कताई हो रही है ?
गौरी           -          हां तारा बाबू। कोकटी की रुई खरीद ली थी। दो चादरें और कुर्ते बुनवाने हैं न !
ताराचरण   -           इतना कात लिया ?
गौरी           -    आजकल रात में नींद नहीं आती। तो कातने लगती हूं। कोई तो सहारा होना चाहिए न जीने                                 के लिए।
ताराचरण   -      अपने शरीर का भी ध्यान रखो। समय पर खाना और समय पर सोना जरूरी है। इस बार                                     उमानाथ सौराठ जाएगा न ?
गौरी          -            राम जाने। न जाने कब उसके पांच सौ इकट्ठे होंगे, कब वो ब्याह करेगा !
ताराचरण   -           ये लो ! उमानाथ तो नाम लेते ही आ गया !
                              उमानाथ नव-विवाहित के रूप में आता है।
उमानाथ    -         लो, मैं ब्याह करके आ गया मां।
                              गौरी अवाक देखती रह जाती है।
                -    विश्वास नहीं हो रहा क्या ?
                               गौर से देखती है।
गौरी          -           हुआ हुआ विश्वास ! रुक तो ! 
                                अंदर से पानी लाती है। आवश्यक अनुष्ठान करती है।
ताराचरण   -       तू तो बहुत होशियार हो गया उमानाथ ! कोई और भी था कि अकेले ही गया था सौराठ ?
उमानाथ    -     इतना भी होशियार नहीं हो गया हूं कि अकेले जाऊं। मामा गए थे। सारी बातचीत मिनटों में                                तय हो गई।
गौरी          -      मामा गए थे ? बहुत अच्छा किया बेटा। अब जल्दी से गौना कराके बहू को ले आ। चल आ,                                 अंदर आ !
                                दोनों अंदर जाते हैं। ताराचरण आगे आता है।

ताराचरण  -   बीमार और बूढ़ी औरत को बहू या बेटी मिल जाए, इससे बड़ी बात क्या हो सकती है। 
                     उमानाथ की मां को अरसे बाद कोई खुशी मिली थी। कोई सुख मिला था। उधर रत्ती, 
                     जिसे उसके पिता जयनाथ ने ननिहाल जाने से रोक रखा था, विद्रोह करके ननिहाल 
                     पहुंच गया। बड़ी आवभगत हुई। कई दिनों रुका, मौजमस्ती की। और इधर उमानाथ 
                     फिर से कलकत्ता जाने को तैयार हो गया।  

                                       जाता है। उमानाथ और गौरी आते हैं। 
उमानाथ      -      अब नौकरी में तो जाना ही पड़ेगा न मां। यहां बैठूंगा तो कमाऊंगा क्या ?
गौरी          -           भैया, अगहन में गौना करा लेना ठीक रहेगा न ?
उमानाथ    -         मां, ये तकली, चरखा चलाना बंद करो। 
गौरी         -            अरे इससे थोड़ी-बहुत कमाई......
उमानाथ   -       उमानाथ आवारा है, कलकत्ता में मौज करता है और उसकी मां यहां जुलाहिन हुई 
                        जा रही है, यही दिखाना चाहती हो दुनिया को ? 
गौरी       -              ये क्या बोल रहा है ?
उमानाथ   -          खबरदार, जो अब कभी चरखे को छुआ ! हाथ काट दूंगा !
                                पांव छूकर चला जाता है। गौरी पेट पकड़कर बैठ जाती है।
गौरी     -     हाथ काट दूंगा ! अरे मैं कुतिया से भी गई-बीती हूं क्या रे, जिसे तू बुलाकर दो कौर 
                 खाना देता  है, उसे पुचकारता है ? अरे मां हूं तेरी ! यही सूत कात-कात के तेरी परवरिश 
                 करती आई हूं ! इसी सूत के बल पर मैं तेरे पैसों के लिए राह नहीं तकती ! अब नहीं जिऊंगी, 
                 मर जाऊंगी मैं। इस जिंदगी से तो मरना ही बेहतर है। गौरी, अब तेरी कहानी खत्म हो रही है ! 
                 अब तू मर ही जा ! तेरे सीने में जितनी सुइयां चुभोई जाएं उतना ही अच्छा है ! चुड़ैल है तू ! 
                 तेरा सत्यानाश हो ! कुहर-कुहरकर मरे तू ! तेरे अंग गलकर गिरें !

                                                 गौरी अचेतन होने लगती है। उसे आभास होता है मानो उसकी बहू                                                                   उसके पास आई है और उसके आंसुओं को अपने आंचल से पोंछती है। 
                    कौन है ! कौन है ! कौन है तू ! मेरी बहू है न ! उमानाथ की दुल्हन ! कितनी सुंदर है 
                    हमारी  बहू! मैं तेरा नाम रखूंगी पद्मसुंदरी ! हां, पद्मसुंदरी ! तू इस घर में रहेगी न ! तू मेरा 
                    खयाल  रखेगी न !
                                                             बहू जाती है। वह फिर अवसाद से घिर जाती है।
                नहीं रहेगी वह भी। नहीं रहेगी। तो फिर मैं किसके लिए जिऊं ? अब किसको है मेरी 
                जरूरत ? किसी को नहीं। मैं कुंए में कूद कर अपनी जान क्यों नहीं दे देती ? मैं गले में फांसी 
                का फंदा पहन कर झूल क्यों नहीं जाती ? मैं मर जाऊंगी..... मगर नहीं। एक और अपयश मैं 
               नहीं झेल  सकती। एक बार मैंने गलती की थी। विधवा होकर गर्भवती हुई और आठ मास के 
               गर्भ को  कोख से निकलवाया। और अब कुंए में कूद कर मरूंगी तो उमानाथ कैसे इस पहाड़ 
               जैसे अपयश को बरदाश्त कर पाएगा ? हे प्रभु ! मेरी मृत्यु की राह आसान कर दो ! मैं कसम                               खाती हूं, मैं अपने बचने का एक भी उपाय न करूंगी।  
                                            गौरी बहुत ही अशक्त दिखने लगती है। लड़खड़ाती हुई अंदर जाती है।                                                              ताराचरण आता है।
ताराचरण -   गवाह हूं हर पल का इसलिए मुझी को बताना पड़ेगा। माघ में उमानाथ का गौना 
                   हुआ। इस मौके पर रतिनाथ भी आया। रतिनाथ की चाची जो हर पल मौत का इंतजार कर 
                   रही थी अपने कमजोर हाथों से स्वागत करने लगी अपनी बहू कमलमुखी का। उत्साह में 
                   कहीं कोई कमी नहीं। बेटी प्रतिभामा को भी बुला लिया था। कमलमुखी खेतिहर की बेटी थी। 
                   थोड़ी अक्खड़ भी। बात-बात पर वह चाची की अवज्ञा करती। उमानाथ की भी शह थी उसको। 
                   चाची का दिल टूटने लगा। अपनी गांठ से पंद्रह रुपिया निकालकर बेटी की विदाई की। 
                   मनचाहा पुआ-पकवान नहीं दे सकी। ये उसके दिल की पुकार थी या रतिनाथ को दैवी आदेश, 
                  एक दिन रतिनाथ आ गया।
                                                               रतिनाथ आता है।
रतिनाथ   -         चाची ! चाची !
गौरी       -             अरे तू आ गया ! मेरे लाल ! तेरा ही इंतजार कर रही थी। 
रतिनाथ  - हां चाची, पर तुम कितनी कमजोर हो गई हो ! बीमार हो क्या ? वैद को नहीं दिखाया 
                 क्या  तुमने ?
गौरी         -   अब ठीक हो जाऊंगी। फिकर न कर।
                                         कमलमुखी आती है।
             -     बहू ! ये तेरा देवर है। रत्ती।
                                          रत्ती पांव छूता है।
             -    इसके लिए भी खाना बनाया करना। ये यहीं खाता है।
कमलमुखी - कितने दिन रुकेंगे ?
गौरी           -        जब तक मन पड़ेगा यहीं रहेगा। मेहमान नहीं है। 
                                         कमलमुखी मुंह बनाकर चली जाती है।
               -   तू फिकर न करना रे। मैं हूं न। तेरी मां। एक बात कहूं ?
रतिनाथ     -       बोलो न चाची।
गौरी         -         जब मैं मरूं, मुझे आग तू ही देना। ........... अरे क्या कहा मैंने सुना नहीं ? तू रो रहा है ?
रतिनाथ   -   चाची, ये सब तुम अभी से क्यों बोलती हो ? मैं तुम्हारे लिए तारा बाबा के यहां से ताबीज ले                                 आऊंगा !
गौरी        -           पागल है तू......
रतिनाथ  - चाची तुम्हें ऐसे बीमार, मैंने पहले कभी नहीं देखा। क्या करूं जिससे तुम ठीक हो 
                  जाओ।  क्या ऐसा नहीं हो सकता कि तुम्हारे बदले मैं बीमार हो जाऊं और तुम अच्छी 
                  हो जाओ? मेरी नानी पचहत्तर की उम्र में भी अच्छी है। तुम क्यों अच्छी नहीं रहोगी ? 
                  चाची, मुझे पढ़ाई के लिए शहर फिर से जाना होगा। मगर तुम्हें अकेले छोड़कर कैसे 
                 जाऊं ? बस एक ही रास्ता है। पंद्रह दिन में एक बार जरूर आया करूंगा !
                                     ताराचरण आता है।
                   काका, मेरे न रहने पर चाची का खयाल रखोगे न ?
                                      ताराचरण उसके सिर पर हाथ फेरता है। 
ताराचरण    -          हां रतिनाथ।
                                                              रतिनाथ चाची के पैर छूकर जाता है। 
गौरी         -            आज क्या है अखबार में ताराचरण बाबू ? कोई नई खबर है क्या ?
ताराचरण   -           तुमने रतिनाथ को रोका नहीं ? कुछ दिन और रुक जाता ?
गौरी       -           नहीं। अपने मोह के कारण मैं उसका भविष्य क्यों बरबाद करूं ? आप बताइए, अखबार में                                 नई खबर क्या है ?
ताराचरण  -             नई खबर यही है कि हिटलर ने रूस पर हमला कर दिया है।
गौरी        -      ओह ! कैसा दिमाग है दरिद्दर का ? मुदा बच्चा-बच्चा कट मरेगा तभी रूस दखल होगा। है न                                बाबू ?
ताराचरण -   यही तो अफसोस है कि तुम्हारी बात गलत साबित होगी। रूस हार जाएगा।
गौरी       -     कभी नहीं। मैं पढ़ी-लिखी नहीं हूं मगर इतना समझती हूं कि पच्चीस साल से रूस वालों ने                                अपने यहां जो संसार बसाया है, उसके अंदर जाकर राक्षसों की बड़ी से बड़ी फौज भी मात खा                                जाएगी।
ताराचरण -     देख लेना।
गौरी     -         देख लूंगी। अगर जिंदा रही।
ताराचरण  -    खैर। गांव के किसान भवन की मरम्मत करा दी मैंने। दुःख होता है उमानाथ की मां,                                        शुभंकरपुर जैसे शिक्षित गांव का ऐसा हाल हो गया ! एक भी शिक्षित आदमी यहां 
                    नहीं रहता। शिक्षित होते ही उड़ जाता है शहर की ओर। 
गौरी      -       तुम क्यों नहीं गए ? सुनो ! मुझसे दो रुपये चंदा ले लेना। सड़क बनवा रहे हो न ?
                                   अचानक कमलमुखी आ जाती है।
कमलमुखी  - कोई जरूरत नहीं है चंदा देने की। यहां न माल-मवेशी हैं न गाड़ी-इक्का। सड़क खराब हो गई                                है तो इसकी सजा हम क्यों भोगें ?
                                    कमलमुखी जाती है। 
ताराचरण   -      चलता हूं उमानाथ की मां। अपनी सेहत का खयाल रखना, गांव में हैजा जोरों से पकड़ रहा                                  है।
                                    जाता है। गौरी रहस्यमयी ढंग से मुस्कुराती है।
गौरी          -             कब से इंतजार कर रही हूं। आ जाओ और मुझे अपनी बाहों में ले लो!
                                           मानो मौत को बांह फैलाकर बुला रही हो। लड़खड़ाकर गिरती है। झोला                                                              लिए रतिनाथ आता है। झोला फेंक कर चाची की ओर दौड़ता है।
रतिनाथ     -       चाची ! चाची !
गौरी           -         कौन ? रत्ती ! तू आ गया ? किसने भेजा तुझको ?
रतिनाथ      -     (बदहवास-सा पुकारता है।) भाभी !!!!!
                               अंदर से कमलमुखी आती है। 
रतिनाथ      -     चाची की दवाई कहां है ?
कमलमुखी -  ले आती हूं।
                              अंदर जाकर दवाई लाती है।
रतिनाथ   -          चाची ! लो दवाई खा लो !
गौरी          -          नहीं लूंगी। नहीं लूंगी। 
कमलमुखी  -  हे भगवान क्या करूं मैं ?
                               तलवा सहलाने लगती है।
रतिनाथ      -       चाची ! तुम मुझे छोड़ कर नहीं जा सकती !
गौरी           -          रत्ती ! मेरी पुकार तूने सुन ली थी न ! बुला रही थी तुझे। मेरा वचन तुझे याद है न !
रतिनाथ     -        हां ........
                              हिचकी के साथ प्राणांत होता है।
रतिनाथ      -       चाची !!!!!
                                       दोनों रोते हैं। चार कलाकार सूत्रधार के रूप में आते हैं। मंच के कलाकारों                                                             को पीछे कर खड़े हो जाते हैं। 
कलाकार 1 - ताराचरण और रतिनाथ को मिलाकर कुल पांच लोग अर्थी उठाकर ले गए और दाहसंस्कार कर                           दिया। वचन के मुताबिक आग रतिनाथ ने दिया।  
कलाकार 2- तीसरे दिन फूल चुने और वहां एक चबूतरा बना कर उसमें तुलसी का पौधा रोप दिया। 
                  उमानाथ चौथे दिन आया।
कलाकार 3 - जयनाथ को खबर दी गई फिर भी नहीं आया। 
कलाकार 1 - एक दिन सुबह रतिनाथ अस्थियों को लेकर काशी आया। नाव में बैठकर बीच गंगा में गया                                  और चाची की अस्थियों को कांपते हाथों से प्रवाहित करने लगा ..... 
                                           सभी जाते हैं। रतिनाथ कलश लेकर सामने आता है। वह फूल गंगा                                                                     में प्रवाहित कर रहा है।
रतिनाथ   -   जाओ चाची ! तुम्हारी आत्मा को शांति मिले। तुम क्या थी, कौन थी, मैं नहीं जानता, 
                     पर इतना जरूर है कि मेरे गांव में सच्ची थी तो सिर्फ तुम। साहसी थी तो सिर्फ तुम। 
                     फिर भी मन में एक प्रश्न उठता है, कि एक और साहस तुमने क्यों नहीं किया ? सदा 
                     के लिए तुम्हारे माथे पर कलंक का टीका लगाने वाले का नाम तुमने अपने मुंह से क्यों 
                      नहीं बता दिया चाची, क्यों नहीं बता दिया ?
                             सूत्रधार आता है। रतिनाथ के सिर पर हाथ रखता है।
सूत्रधार -  तो यह थी पूरी कहानी, गौरी, उर्फ उमानाथ की मां, उर्फ रतिनाथ की चाची की। 
                  जो एक  संपन्न परिवार के होते हुए भी कुलीनता के नाम पर एक बीमार महादरिद्र 
                  से ब्याह दी गई। विधवा हुई यानी माथे पर कलंक लगा पति को खा जाने का। देवर ने 
                   गर्भवती कर दिया, माथे पर कलंक लगा पापिनी होने का। फिर भी समाज के साथ 
                  लगातार चलते रहने की कोशिश करती रही। सिर्फ एक सुख की चाह में कि वह एक 
                  दिन अपने स्वाभिमान के साथ, मां, सास और दादी के रूप में प्रतिष्ठित होगी, सम्मानित 
                  होगी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं।फिर भी, उसे ऐसा जरूर लगता रहा, कि इस युद्ध में, इस 
                  संघर्ष में वह अकेली नहीं है। उसके जैसे न जाने कितने हैं! जो उससे दूर हैं, जिनको 
                  वह नहीं जानती। हां, सिर्फ एक को जानती है, जो उससे दूर रहकर भी  सदा उसके साथ 
                  रहा। वह महामानव, जो इस समय पूरे देश को  जगाने के काम में लगा हुआ है। आज 
                  गौरी नहीं है, उसकी राख गंगा की तलछटी में कहीं दब चुकी है। फिर भी वह वहां से 
                  अवश्य पुकार लगा रही होगी। हमें इस गुलामी की जंजीर से बाहर निकालो ! हमें 
                 आजाद हम भी इंसान हैं !   
नेपथ्य गीत - वैष्णव जन तो तेने कहिए, पीर पराई जाणे रे .......
                                           महात्मा गांधी की जयकार करती यात्रा आती है। रतिनाथ को                                                                          लेकर सूत्रधार भी उसमें शामिल हो जाता है। 
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Yogesh Tripathi
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