समीक्षा : पुस्तक - बघेली संस्कृति
और साहित्य
लेखक – गोमती प्रसाद ‘विकल’
समीक्षक – योगेश त्रिपाठी
अवसर - विमर्श-विकल दिनांक 16 अक्तूबर, 2005
मैं आलेख पढ़ने के पहले त्रुटियों के लिए अपना बचाव यह कहकर
करना चाहूंगा कि मैं मूलतः हिंदी साहित्य का विद्यार्थी नहीं रहा हूं। हिंदी में
एम.ए.मैंने उसी तरह से किया है जिस प्रकार से आठ घंटे और बारह सी.एल. की नौकरी में
रहते हुए कोई कर्मचारी कर सकता है। आशा है त्रुटियों पर ध्यान नहीं देंगे।
विमर्श-विकल के इस गरिमामयी आयोजन में आदरणीय
विकल जी की कृतियों पर विचार किया जा रहा है, यह एक अच्छी बात है। इस आयोजन का नाम ‘विकल-सम्मान’ नहीं रखा गया यह और भी अच्छी बात है। कल के अखबार के बारे
में सभी निश्चिंत रहेंगे। इस सिलसिले में मैंने उनकी पुस्तक ‘बघेली संस्कृति और साहित्य’ पर कुछ लिखने का प्रयास किया है, जो मैं आपके सामने रख रहा हूं। इसके बारे में
मैं नहीं कह सकता कि यह अच्छी बात है या नहीं।
विकल जी की किताब ‘बघेली संस्कृति और साहित्य’ को राजभाषा और संस्कृति संचालनालय मध्यप्रदेश शासन ने
प्रकाशित किया है सन् 1999 में। हो सकता है
इसके नये संस्करण भी प्रकाशित हुए हों, मुझे ज्ञात नहीं है।
मैंने यह किताब रीवा के एक बुकस्टाल से खरीदी। एक सौ पचास
रुपये में। दो सौ पचास भी कीमत होती तो भी मैं खरीदता, क्योंकि बघेली जन-जीवन के बारे में मुझे बहुत कुछ जानना है।
बघेली जीवन सिर्फ उतना ही नहीं है जो मेरे आसपास बीता। मैंने पुस्तक खरीदी,
लेकिन मेरे एक भाई ने नहीं खरीदी। वह ले गया और
आज तक नहीं लौटाया। एक बार किसी मौके पर मुझे इसकी जरूरत पड़ी और मैंने कुछ दिनों
के लिए विकल जी से पुस्तक मांगी। मेरे अति यथार्थवादी अभिनय से उन्हें प्रभावित
होना ही था और उन्होंने मुझे अपनी एक लेखकीय प्रति भेंट की। स्नेह उनका, आभार उनका। तब से आज तक यह पुस्तक मेरे काम आ
रही है।
पुस्तक के ऊपर पहली टिप्पणी की कहें तो एक
साहित्यकार बंधु की टिप्पणी सामने रखूंगा कि अच्छा जुगाड़ है। जुगाड़ यानी मेल-जोल,
भाईचारा, दूरभाष-वार्ता लल्लो-चप्पो आदि-आदि। यानी विकल जी का यह
जुगाड़ है जो उनकी पुस्तक सरकारी प्रतिष्ठान से छप गई। कड़वाहट भले हो लेकिन यह एक
कटु सत्य है कि हमारे सरकारी संस्थानों ने अपनी विश्वसनीयता इतनी खो दी है कि
सरकारी शब्द जुड़ते ही लेखक की पूरी सामर्थ्य, लेखक का समूचा यश, और लेखक की सारी योग्यता तीन अक्षरों के इस भारी-भरकम शब्द ‘जुगाड़’ के आगे स्वयंमेव दब जाती हैं। लेकिन ऐसी टिप्पणियों का विकल जी जैसे मानस पर
कोई असर नहीं पड़ता, और न ही पड़ना
चाहिए। यह पुस्तक सरकारी संस्थान से प्रकाशित होने के ही कारण साहित्यिक जगत में
कम चर्चित हुई, ऐसा मेरा मानना
है।
किसी भी भाषा और संस्कृति के विकास में
रचनाधर्मिता का योगदान तो होता ही है, लेकिन उससे भी ज्यादा बड़ा योगदान होता है उस भाषा और संस्कृति के दस्तावेजीकरण
का। पहले-पहल यह योगदान डा. भगवती प्रसाद शुक्ल जी ने दिया था, ‘बघेली भाषा और साहित्य’ पुस्तक देकर, जिसका कि पहला संस्करण सन् 1971 में प्रकाशित
हुआ। इसके पहले एक महत्वपूर्ण योगदान श्री लखन प्रताप सिंह उर्गेश ने दिया था,
जब सन् 1953 में उनकी पुस्तक ‘बाघेली लोकगीत’ प्रकाशित हुई थी।
पुस्तकों के रूप में यही दो कार्य मेरी जानकारी में आए है। पत्र-पत्रिकाओं में
आलेखों के रूप में यद्यपि कई लोगों ने यह वंदनीय कार्य किया है। विकल जी की यह
पुस्तक इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
मेरी दृष्टि में दस्तावेजीकरण का यह कार्य किसी भी भाषा या
बोली के विकास के लिए कविता, उपन्यास, या नाटक रचने से कहीं ज्यादा उपयोगी, कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है। त्योंथर में कोलों
की एक गढ़ी है, कुछ दिनों पहले
मुझे उसके इतिहास के बारे में जानने की इच्छा हुई। कोल जो कभी त्योंथर के राजा थे,
उनका पतन कैसे हुआ, यह जानना मुझे दिलचस्प लगा। मुझे ज्यादा उम्मीद तो नहीं थी,
लेकिन मैंने विकल जी की पुस्तक देखी। उसमें
मुझे मिल गया। उन्होंने इसके बारे में लिखा है। और सबसे अच्छी बात यह है कि जिन
स्रोतों से उन्हें यह जानकारी मिली, उन्होंने उन स्रोतों का भी जिक्र किया है।
लेखक ने इस पुस्तक में जो भी सामग्री दी है, लगता है जैसे एक अनभिज्ञ जिज्ञासु की जरूरत के
हिसाब से दी है। अगर हमें खैरमाई देवी के बारे में जानना है तो कम से कम इसमे यह
तुरंत हमें मालूम हो जाएगा कि खैरमाई देवी सीमाओं की रक्षा करने वाली देवी मानी
जाती हैं। अगर हमें नेउरानमय के बारे में जानना है तो विकल जी की इस किताब में मिल
जाएगा। इसी तरह अनेक बघेली त्यौहारों की सूची देते हुए लेख्क ने यह भी बताया है कि
क्यों मनाया जाता है यह त्यौहार और इसके पीछे की कथा क्या है। बघेलखंड के लोकनाट्य
पर भी उन्होंने लिखा है और मेरे लिए छाहुर नाट्य को लिखने और खेलने के पीछे वही
आधार रहा है।
एक चीज मैंने और पाई कि विकल जी में किसी भी विषय पर
विस्तार से लिखने की अद्भुत कला है। संभवतः इसीलिए वे उपन्यास जैसे व्यापक फलक
वाली विधा में सफल हुए। यह पुस्तक मूल रूप से बघेली जन-जीवन का परिचय देने के लिए
एक संकलन है। लेकिन विकल जी की ईमानदारी और कठोर श्रम का मैं जिक्र करूंगा कि
मामुलिया, चौमासा आदि पत्रिकाओं से
टिप्पणियां, वेद-पुराण,
महाभारत, गीता, रामचरित मानस से
संदर्भ तो उन्होंने लिए ही हैं उनका उल्लेख भी किया है। यही नहीं लउआ सगरा के
सीताराम कोल से उन्होंने कोलों के गोत्र पूछे। उर्रहट के गयादीन कोल से सबरी
प्रसंग पर रोचक जानकारी ली। सीधी की मूर्ति देवी से टप्पा पाया, लालगांव के सरजुआ गोंड़ से, गढ़बा के बिहरिया कोल से बघेली कथाएं पाईं। इसी
तरह हनुमना के मोतीलाल सिंह, पुष्पराजगढ़ के
प्रेमलाल, कोतमा के अरविंद लाल जैसे
न जाने कितने लोगों से पूछ-पूछ कर सामग्री जुटाई, और सबका उल्लेख भी किया। उक्तियों की भी भरमार है। नेल्सन,
पाल रेडिन, हरबर्ट रीड, गोल्डन विजर,
डा.वर्कर, ये तो सब विदेशी नाम हो गए, बाबू गुलाबराय, आचार्य चतुरसेन, पं.रामनारायण
वाचस्पति, आचार्य सागर नंदी,
डा.विद्यानिवास मिश्र, डा.श्यामाचरण दुबे, उसके बाद ले लीजिए डा.कमला प्रसाद, डा.सुधाकर तिवारी, डा. चंद्रिका
चंद्र, न जाने कितनों के उल्लेख,
न जाने कितनों के नाम। जहां से भी कोई उपयोगी
चीज मिली विकल जी ने इस पुस्तक में बाकायदे उनका उल्लेख करते हुए यथास्थान जमा दी।
पुस्तक में लोककथा, लोकविश्वास, रीति-रिवाजों का
विस्तार से वर्णन है। लोकगीतों का भावार्थ सहित समावेश है। अभी मैं यह बताने में
असमर्थ हूं कि फला चीज इसमें छूटी हुई है। संक्षेप में कहें तो बघेली भाषा,
संस्कृति, और साहित्य का एक नया परिचयात्मक ग्रंथ है यह जो पूर्व में
प्रकाशित हुई पुस्तकों से प्रभावित नहीं है, बल्कि उनकी पूरक है। बल्कि एक बात इसमें विशेष यह लगी कि
हमें जो जानकारी चाहिए, वह हमें आसानी से
तुरंत मिल जाती है, अगर किताब में है
तो। जानकारियो का यह समायोजन आसान कार्य नहीं था। इसका मूल्यांकन होना चाहिए।
विकल जी के प्रति इस ‘जुगाड़’ की भावना के कारण
उनकी मेहनत का आकलन हम आज भले ही न करना चाहें या न कर पाएं, लेकिन वैश्विक गांव के निर्माण के बाद, जिसका कि इस समय दौर चल रहा है, उसके कई वर्षों बाद, जब गांव-गांव में खुले हुए नर्सरी और कान्वेंट स्कूलों से
निकलकर, अमेरिका का सपना भूल कर,
नई पीढ़ी खेतों में हल जोत रही होगी, तब अगर उसके मन में अपनी मिट्टी, अपनी भाषा, और अपने रीति-रिवाजों को जानने की ललक उठी, तो वह जरूर इस किताब के पन्ने पलटेगी और तब उसे
महसूस होगा उस पसीने की मूल्य, जो विकल जी ने इस
किताब को लिखने में बहाया है। और यकीनन, हम भले उनके इस कार्य के लिए कृतज्ञ न हों पर वह पीढ़ी कृतज्ञ अवश्य होगी।
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योगेश त्रिपाठी
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