छाहुर
बघेली नाट्य
बघेली नाट्य
छाहुर, बघेलखंड का एक विलुप्तप्राय नाट्य(गीत) है, जिसमें एक सुपरिभाषित नाटक के संपूर्ण गुण दिखाई देते हैं। इसकी दूसरी विशेषता है कि इस नाट्य में सामंतवाद के विरुद्ध जनक्रांति को रेखांकित किया गया है। आजादी के इतने वर्षों के बाद भी सामंती मनोवृत्ति हमारे समाज से गई नहीं है। छाहुर युवा है, बहादुर है, साथ ही चतुर है और बुद्धि से काम लेता है। वह राजा को अपने मवेशी देने से इंकार करता है। राजकुमारी बबुली भरी सभा में अपने माता-ंपिता के सामने छाहुर के साथ विवाह करने की घोषणा करती है। छाहुर की गरीब-ंनिरीह विधवा मां स्वाभिमानी है और वह अपने बेटे के माथे पर चोर होने का कलंक नहीं चाहती। ये सभी बिंदु जाहिर करते हैं कि इस नाट्य में विकासशील तत्व मौजूद हैं और यह समय की ध्वनि के अनुकूल है। यही कुछ कारण थे कि मैंने गीत में पिरोई इस कथा के सूत्रों को समेटकर नाट्यरूप देने की कोशिश की।
यह नाटक मूल रूप से बघेली में है, परंतु इसका हिन्दी अनुवाद भी उपलब्ध है। गीत बघेली में ही रहेंगे जिनकी धुन अहिरहाई या बिरहा है।
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